Monday, June 28, 2010

जिस प्रकार नदी या समुंदर पार करते समय नाविक पर विशवास रखना पड़ता है, उसी प्रकार का विशवास हमे भवसागर से पार होने के लिये सदगुरु पर करना चाहिये I
इस देह में यह सनातन जीवात्मा मेरा ही अंश है और वही इस प्रकृति में स्थित मन और पाँचो इन्द्रियों को आकर्षित करता है । वायु गन्ध के स्थान से गन्ध को जैसे ग्रहण करके ले जाता है, वैसे ही देहादि का स्वामी जीवात्मा भी जिस शरीर का त्याग करता है, उससे इस मन सहित इन्द्रियों को ग्रहण करके फिर जिस शरीर को प्राप्त होता है- उसमें जाता है । (८)
हे नाथ ! हृदयमें आपकी लगन लग जाय। दिल में आप धँस जाओ। आपकी रुपमाधुरी आँखोंमें समा जाय, आपके लिये उत्कट अनुराग हो जाय। बस,बस इतना ही और कुछ नहीं चाहिये।
संसार में माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी के सम्बन्ध की तरह गुरु-शिष्य का सम्बन्ध भी एक सम्बन्ध ही है लेकिन अन्य सब सम्बन्ध बन्धन बढ़ाने वाले हैं जबकि गुरु-शिष्य का सम्बन्ध सम बन्धनों से मुक्ति दिलाता है। यह सम्बन्ध एक ऐसा सम्बन्ध है जो सब बन्धनों से छुड़ाकर अन्त में आप भी हट जाता है और जीव को अपने शिवस्वरूप का अनुभव करा देता है।

Tuesday, June 22, 2010

शरणागत भक्त को भगवान् का नाम स्वाभाविक ही बड़ा मीठा,प्यारा लगता है।अगर कोई पूछे कि तुम श्वास क्यों लेते हो? यह हवाको भीतर-बाहर करनेका क्या धन्धा शुरु कर रखा है? तो यही कहेंगे कि भाई! यह धन्धा नहीं है,इसके बिना हम जी ही नहीं सकते।ऐसे ही शरणागत भक्त भजन के बिना रह नहीं सकता।जिसको सब कुछ अर्पित कर दिया,उसके विस्मरण में परम... व्याकुलता,महान् छटपटाहट होने लगती है।
जिसने हमें सब कुछ दिया है,उसने अपने को गुप्त रखा है,अर्थात् ’मैं देता हूँ’,यह प्रकाशित नहीं किया।इतना ही नहीं.उसने अपनेको इतना छिपाया है किजिसे देता है,उसे वह मिली हुई वस्तु अपनीही मालूम होती है,किसी और की नहीं।भला,जिसमें इतनी आत्मीयता है इतना सौहार्द है,क्या हमने कभी एकबार भी वस्तुओं से विमुख होकर उनकी ओर देखा?जिसकी ओ...र हम एकबार भी नहीं देख सके,वह सर्वदा हमारी ओर देखता है।
जिसने हमें सब कुछ दिया है,उसने अपने को गुप्त रखा है,अर्थात् ’मैं देता हूँ’,यह प्रकाशित नहीं किया।इतना ही नहीं.उसने अपनेको इतना छिपाया है किजिसे देता है,उसे वह मिली हुई वस्तु अपनीही मालूम होती है,किसी और की नहीं।भला,जिसमें इतनी आत्मीयता है इतना सौहार्द है,क्या हमने कभी एकबार भी वस्तुओं से विमुख होकर उनकी ओर देखा?जिसकी ओ...र हम एकबार भी नहीं देख सके,वह सर्वदा हमारी ओर देखता है।
शरणागति एक ही बार होती है और सदा के लिये होती है। एक बार ’हे गुरुदेव ! मैं आपका हूँ’ ऐसा कहने के बाद फिर और क्या कहना शेष रह गया? एक बार अपने-आपको दे दिया तो फिर दुबारा क्या देना शेष रह गया?

Monday, June 21, 2010

मोह के कारण ही तुम सांसारिक भोग-सुखोंको चाहते हो और सांसारिक दु:खोंको भयानक मानकर उनसे भागना चाहते हो।विस्वास करो,जो सुख भगवान् का विस्मरण कराकर भगवान् की ओर अरुचि उत्पन्न कर दे,उसके समान कोई भी हमारा शत्रु नहीं है।और जो दु:ख विषयोंसे हटाकर भगवान् की ओर लगा दे,उसके समान हमारा कोई मित्र नहीं है।
भगवान् हमें गोद में लेने के लिये तैयार खड़े हैं,केवल हमें थोड़ा-सा ऊँचा हाथ करना है अथार्त् भगवान् के सम्मुख होना है।हमें भगवान् की कृपा की तरफ देखना है और ’हे मेरे नाथ! हे मेरे नाथ!!’ कहकर भगवान् को पुकारना है।पुकारनेमात्र से भगवान कल्याण कर देते हैं।
यह नियम है कि जिसके मन की बात पूरी होती है,वह उससे प्रेम करने लगता है जिसने उसके मन की बात पूरी की।अत: आस्तिक को अपनी बात पूरी न होने में विशेष कृपा का अनुभव इस कारण होता है कि अब मेरे प्यारे ने अपने मन की बात की है,अत: वे मुझसे अवश्य प्रेम करेंगे।प्रेमास्पद का प्रेम ही तो प्रेमी का सर्वस्व है।इस दृष्टि से आस्तिक किसी ...भी अवस्था में क्षुब्ध नहीं होता।
जो होता है भगवान् की मर्जी से ही होता है। भगवान् की इच्छा में ही अपनी इच्छा मिला दो - भगवान् इससे प्रसन्न हो जाते हैं। आफत मिट जाती है और आनन्दमय जीवन हो जाता है।

अपने को ही सुधार.....

उदारता पदार्थों की भी होती है और विचारों की भी होती है। किसी ने कुछ कह दिया, अपमान कर दिया तो बात को पकड़ मत रखिये। जो बीत गई सो बीत गई। उससे छुटकारा नहीं पाएँगे तो अपने को ही दुःखी होना पड़ेगा। जगत को सुधारने का ठेका हमने-आपने नहीं लिया है। अपने को ही सुधारने के लिए हमारा आपका जन्म हुआ है। माँ के पेट से जन्म लिया, गुरू के चरणों में गया और पूरा सुधर गया ऐसा नहीं होता। जीवन के अनुभवों से गुजरते-गुजरते आदमी सुधरता है, पारंगत होता है और संसार-सागर से पार हो जाता है। व्यक्ति में अगर कोई दोष न रहे तो उसे अभी निर्विकल्प समाधि लग जाय और वह ब्रह्मलीन हो जाय।

Sunday, June 20, 2010

आत्म-साक्षात्कारी सदगुरुदेव और ईश्वर में तनिक भी भेद नहीं है। दोनों एक, अभिन्न और अद्वैत हैं।गुरुदेव का सान्निध्य साधक के लिए एक सलामत नौका है जो अंधकार के उस पार निर्भयता के किनारे पहुँचाती है। जो साधक अपने साधनापथ में ईमानदारी से और सच्चे हृदय से प्रयत्न करता है और ईश्वर साक्षात्कार के लिए तड़पता है उस योग्य शिष्य पर गुरुदेव की कृपा उतरती है।

जो पतित सूर्य का प्रकाश पाता है, जल जिसकी प्यास बुझाता है, वायु जिसे श्वास लेने देती है, पृथ्वी जिसे आश्रय देती है, आप उसे प्यार नहीं दे सकते?

झूठे झगड़ेको छोड़कर साधनमें लग जाओ-जी-जानसे लग जाओ। मनुष्य-जीवन बहुत थोड़े दिनों का है देर न करो। याद रक्खो-देर में कहीं मानव जीवनका अवसान हो गया तो पीछे बहुत पछताना पड़ेगा।

प्राणिमात्र में परमात्मा को निहारने का अभ्यास करके शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण करना यह शील है। यह महा धन है। स्वर्ग की संपत्ति मिल जाय, स्वर्ग में रहने को मिल जाय लेकिन वहाँ ईर्ष्या है, पुण्यक्षीणता है, भय है। जिसको जीवन में शील होता है उसको ईर्ष्या, पुण्यक्षीणता या भय नहीं होता। शील आभूषणों का भी आभूषण है।
उदारता पदार्थों की भी होती है और विचारों की भी होती है। किसी ने कुछ कह दिया, अपमान कर दिया तो बात को पकड़ मत रखिये। जो बीत गई सो बीत गई। उससे छुटकारा नहीं पाएँगे तो अपने को ही दुःखी होना पड़ेगा। जगत को सुधारने का ठेका हमने-आपने नहीं लिया है। अपने को ही सुधारने के लिए हमारा आपका जन्म हुआ है। माँ के पेट से जन्म लिया, गुरू के चरणों में गया और पूरा सुधर गया ऐसा नहीं होता। जीवन के अनुभवों से गुजरते-गुजरते आदमी सुधरता है, पारंगत होता है और संसार-सागर से पार हो जाता है। व्यक्ति में अगर कोई दोष न रहे तो उसे अभी निर्विकल्प समाधि लग जाय और वह ब्रह्मलीन हो जाय।
निर्दोषता की अभिव्यक्ति तभी सुरक्षित रह सकती है,जब किसी के प्रति वैर-भाव की गन्ध तक न रहे।यह तभी सम्भव है जब किसी के प्रति भी दोषी भाव न रहे,अर्थात् अपने प्रति होने वाली बुराई का कारण भी अपने को ही मान लिया जाय।जिन्हें दोषी मान लिया है,यदि किसी कारण उन्हें निर्दोष माननेमें असमर्थता प्रतीत हो,तो उन्हें अनजान बालककी भाँति क्षमा कर दिया जाय।
अपने से सुखियों को देखकर आप प्रसन्न हो जायं।अपने से दुखियों को देख कर आप करुणित हो जायं।जिस हृदय में करुणा निवास करती है उस हृदयमें भोग की रुचि नहीं रहती।और जिस चित्त में प्रसन्नता निवास करती है,उसमें काम की उत्पति नहीं होती।आप हो जायेंगे भोग की वासना से रहित और काम से रहित।यह भौतिक जीवन की पराकाष्टा हो गई।
आप अपने तन,मन,धन सबकी सार्थकता प्रभु की प्रसन्नता में ही समझेंगे,प्रभुकी प्रसन्नता के लिये उनकी त्याग में तनिक भी संकोच नहीं करेंगे तो प्रभु को विवश होकर आपकी खुशामद करनी होगी। ऎसी बात होने पर भी आपको तो प्रभु की ही प्रसन्नता में प्रसन्न रहना चाहिये, उनसे अपनी खुशामद कराने की इच्छा रखना भी एक प्रकार का स्वर्थ ही है।
हे नाथ ! हे परमेश्वर ! हे देवेन्द्र ! हे दयालु! हे अच्युत ! मैं आपसे एक वर चाहता हूँ, वह यह है की प्रभो! जन्म-जन्मान्तरमें मेरी आपमें सुदृढ़, भक्ति बनी रहे
ज्ञानी गुरू की शरण में रहते हुए उनकी ज्ञानरूपी खटाई को पचाकर अपने अज्ञान के नशे को उतारना, यही मनुष्य-देह की सबसे श्रेष्ठ उपलब्धि है। यही परम कल्याण है। यही परम शांति, परमानंद एवं परम पद की प्राप्ति है।

Tuesday, June 15, 2010

परमात्मा मिलना उतना कठिन नहीं है जितना कि पावन सत्संग का मिलना कठिन है। यदि सत्संग के द्वारा परमात्मा की महिमा का पता न हो तो सम्भव है कि परमात्मा मिल जाय फिर भी उनकी पहचान न हो, उनके वास्तविक आनन्द से वंचिर रह जाओ। सच पूछो तो परमात्मा मिला हुआ ही है। उससे बिछुड़ना असम्भव है। फिर भी पावन सत्संग के अभाव में उस मिले हुए मालिक को कहीं दूर समझ रहे हो।
मेंहदी हरी दिखती है लेकिन उसमें लाली छुपी है। ऐसे यह देह नश्वर है लेकिन उसमें शाश्वत चेतना छपी है। उस चेतना का जो दीदार कर लेता है उसने सब कुछ कर लिया। उसका जो अनादर कर देता है, मानो उसने अपने जीवन का अनादर कर लिया। अपने आपका वह दुश्मन हो गया।
संसार में माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी के सम्बन्ध की तरह गुरु-शिष्य का सम्बन्ध भी एक सम्बन्ध ही है लेकिन अन्य सब सम्बन्ध बन्धन बढ़ाने वाले हैं जबकि गुरु-शिष्य का सम्बन्ध सम बन्धनों से मुक्ति दिलाता है। यह सम्बन्ध एक ऐसा सम्बन्ध है जो सब बन्धनों से छुड़ाकर अन्त में आप भी हट जाता है और जीव को अपने शिवस्वरूप का अनुभव करा देता है।
गुरुकृपा, ईश्वरकृपा और शास्त्रकृपा तो अमाप है। किसी के ऊपर कम ज्यादा नहीं है। कृपा हजम करने वाले की योग्यता कम ज्यादा है। योग्यता लाने का पुरुषार्थ करना है, ईश्वर पाने का नहीं।
भगवान्‌ का भक्त होने का तात्पर्य है-’मैं भगवान्‌ का ही हूँ’ इस प्रकार अपनी अहंताको बदल देना।भगवान्‌ में मन लगाने का तात्पर्य है-भगवान्‌ को अपना मानना।भगवान्‌ का पूजन करने का तात्पर्य-सब कार्य पूजाभावसे करना।भगवान्‌ को नमस्कार करने का तात्पर्य है-अपने-आपको भगवान्‌ के समर्पित करना।
जब तक 'तू' और 'तेरा' जिन्दे रहेंगे तब तक परमात्मा तेरे लिये मरा हुआ है। 'तू' और 'तेरा' जब मरेंगे तब परमात्मा तेरे जीवन में सम्पूर्ण कलाओं के साथ जन्म लेंगे। यही आखिरी मंजिल है। विश्व भर में भटकने के बाद विश्रांति के लिए अपने घर ही लौटना पड़ता है। उसी प्रकार जीवन की सब भटकान के बाद इसी सत्य में जागना पड़ेगा, तभी निर्मल, शाश्वत सुख उपलब्ध होगा।
भगवान् परम आश्रय हैं,चाहे सारा संसार तुम्हें भूल जाय,चाहे घर-परिवारके सभी तुमसे मुख मोड़ लें,चाहे तुम सर्वथा निराश्रय हो जाओ,एक बार हृदयसे उनके परम आश्रयत्वपर विश्वास करके मन-ही-मन उनका स्मरण करो। देखोगे,तुम्हें कितना शीघ्र और कितना मधुर और निश्चित आश्रय मिलता है।
किसी दूसरेके दु:ख को अपना दु:ख बना लो और उसके दु:ख को हरण करनेके लिये अपने आपको मिटा दो।इससे तुम मिटोगे नहीं।जहाँ अपने आपको मिटाने जाओगे वहीं तुमको बनानेवाला एक ऐसा आयोजन बन जायगा जो सदाके लिये तुमको बना देगा और ऊँचा बना देगा।
ये विरक्त हैं,ये त्यागी हैं,ये विद्वान हैं,इनको भगवान्‌ मिलेंगे हमारेको नहीं-यह धारणा बिलकुल गलत है।अगर आप भगवान्‌ के लिये व्याकुल हो जाओ,उनके बिना न रह सको,तो बड़े-बड़े पण्डित और बड़े-बड़े विरक्त तो रोते रहेंगे,पहले आपको भगवान्‌ मिलेंगे।
इच्छाएँ हमारी बेवकूफी से पैदा होती हैं और आवश्यकताँ सृष्टिकर्त्ता के संकल्प से पैदा होती हैं। शरीर बना कि उसकी आवश्यकताएँ खड़ी हुईं। सृष्टिकर्त्ता का संकल्प है कि तुम मनुष्य जन्म पाकर मुक्त हो जाओ। अगर तुम अपने को सृष्टिकर्त्ता के संकल्प से जोड़ दो तो तुम्हारी मुक्ति आसानी से हो जाएगी। तुम अपनी नई इच्छाएँ बनाकर चिन्ता करके अपने को कोसते हो तो तुम कर्म के भागी बन जाते हो।
चाहे जितने दार्शनिक ग्रन्थ पढ़ लो, समस्त विश्व का प्रवास करके व्याख्यान दो, हजारों वर्षों तक हिमालय की गुफा में रहो, वर्षों तक प्राणायाम करो, जीवनपर्यन्त शीर्षासन करो, फिर भी गुरुदेव की कृपा के बिना मोक्ष नहीं मिल सकता। गुरुदेव के चरणकमलों का आश्रय लेने से जो आनन्द का अनुभव होता है उसकी तुलना में त्रिलोकी का सुख कुछ भी नहीं है।
ज्ञान होने पर नयापन कुछ नही दीखता अथार्थ फल अज्ञान था ,अब ज्ञान हो गया -ऐसा नही दीखता ज्ञान होने पर ऐसा अनुभव होता है की ज्ञान तो सदा से ही था ,केवल उधर मेरे दृष्ठि नही थी यदि पहले अज्ञान था ,अब ज्ञान हो गया -ऐसा माने तो ज्ञान में सदिपना आ जायेगा ,जबकि ज्ञान सादी नही अनादी है जो सादी होता है ,वह सान्त होता है और जो अनादी होता है वो अनंत होता है हरिओम
ऐसे स्वप्न जैसे जीवन में लोग बेकार का तनाव खिंचाव करके अपनी शक्ति बरबाद कर देते हैं। जब दुःख आ जाय तो याद रखोः वह खबर देता है कि संसार का यही हाल है। जब सुख आ जाय तब समझना कि टिकने वाला नहीं। यह पक्का समझ लिया तो सुख जाते समय दुःख नहीं देगा।
दूसरे कर्म तो कर्ता अपने तरफ से करता है, तब फल होता है भगवान का नाम कर्ता के बल से नहीं भगवान के बल से उद्धार करता है इसलिए नाम जपते बड़ा बड़ा सत्संग करने वाले, बड़े बड़े सिद्ध पुरुष भी भगवान का नाम लेते और लवाते है नाम जपत मंगल दिश दसही मरते समय भी भगवान का नाम ले और ॐ ॐकरे तो "प्राण कालेपी "- मरते समय भी कोई मेरा नाम लेता है तो उसकी दुर्गति से रक्षा होती हैं
वे लोग अपने हृदय में गोविन्द से भी बढ़कर स्थान अपने गुरू को देते थे। गोविन्द ने जीव करके पैदा किया लेकिन गुरू ने जीव में से ब्रह्म करके सदा के लिए मुक्त कर दिया। माँ-बाप देह में जन्म देते हैं लेकिन गुरू उस देह में रहे हुए विदेही का साक्षात्कार कराके परब्रह्म परमात्मा में प्रतिष्ठित कराते हैं, अपने आत्मा की जागृति कराते हैं।
हम जो सत्कार्य करते हैं उससे हमें कुछ मिले – यह जरूरी नहीं है। किसी भी सत्कार्य का उद्देश्य हमारी आदतों को अच्छी बनाना है। हमारी आदते अच्छी बनें, स्वभाव शुद्ध, मधुर हो और उद्देश्य शुद्ध आत्मसुख पाने का हो। जीवन निर्मल बने इस उद्देश्य से ही सत्कार्य करने चाहिए।
इच्छाएँ हमारी बेवकूफी से पैदा होती हैं और आवश्यकताँ सृष्टिकर्त्ता के संकल्प से पैदा होती हैं। शरीर बना कि उसकी आवश्यकताएँ खड़ी हुईं। सृष्टिकर्त्ता का संकल्प है कि तुम मनुष्य जन्म पाकर मुक्त हो जाओ। अगर तुम अपने को सृष्टिकर्त्ता के संकल्प से जोड़ दो तो तुम्हारी मुक्ति आसानी से हो जाएगी। तुम अपनी नई इच्छाएँ बनाकर चिन्ता ...करके अपने को कोसते हो तो तुम कर्म के भागी बन जाते हो।See More
हे आत्मारामी ब्रह्मवेत्ता गुरू ! हमारा हृदय खुला है। आप और आपका ज्ञान हमारे हृदय में प्रविष्ट हो। आपका हम आवाहन करते हैं, आपको बुलाते हैं, आपके ज्ञान को हम निमंत्रण देते हैं। हमारे हृदय में जिज्ञासा, ज्ञान और शान्ति का प्रागट्य हो। आपकी कृपा का सिञ्चन हो। हमारा हृदय उत्सक है। आप जैसे ब्रह्मवेत्ता के वचन हमारे हृदय में टिके।
ऐसा कोई भगवान का प्यारा साधक है ही नहीं जिसके जीवन में विघ्न-बाधाएँ नहीं हैं। .....और जिसके जीवन में विघ्न-बाधाएँ नहीं है तो वह साधक किस बात का ? विघ्न-बाधाएँ होना तुम्हारे साधकपने की निशानी है, संसार से निराले मार्ग पर जाने वालों की निशानी है।
भूतकाल जो गुजर गया उसके लिये उदास मत हो। भविष्य की चिन्ता मत करो। जो बीत गया उसे भुला दो। जो आता है उसे हँसते हुए गुजारो। जो आयेगा उसके लिए विमोहित न हो। आज के दिन मजे में रहो। आज का दिन ईश्वर के लिए। आज खुश रहो। आज निर्भय रहो। यह पक्का कर दो। 'आज रोकड़ा.... काले उधार।' इसी प्रकार आज निर्भय....। आज नहीं डरते। कल तो आयेगी नहीं। जब कल नहीं आयेगी तो परसों कहाँ से आयेगी ? जब आयेगी तो आज होकर ही आयेगी।
जो धन से सुख चाहते हैं, वैभव से सुख चाहते है, वे लोग साधना परिश्रम करके, साधना और परिश्रम के बल पर रहते हैं लेकिन जो भगवान के बल पर भी भगवान को पाना चाहते हैं, भगवान की कृपा से ही भगवान को पाना चाहते हैं, ऐसे भक्त अनन्य भक्त हैं।
करने की, मानने की और जानने की शक्ति को अगर रूचि के अनुसार लगाते हैं तो करने का अंत नहीं होगा, मानने का अंत नहीं होगा, जानने का अंत नहीं होगा। इन तीनों योग्यताओं को आप अगर यथायोग्य जगह पर लगा देंगे तो आपका जीवन सफल हो जायगा।
'उत्तम-से-उत्तम भूषण क्या है ? शील। उत्तम तीर्थ क्या है ? अपना निर्मल मन ही परम तीर्थ है। इस जगत में त्यागने योग्य क्या है ? कनक और कान्ता (सुवर्ण और स्त्री)। हमेशा सुनने योग्य क्या है ? सदगुरू और वेद के वचन।'
अगर शीलरूपी भूषण हमारे पास नहीं है तो बाहर के वस्त्रालंकार, कोट-पैन्ट-टाई आदि सब फाँसी जैसे काम करते हैं। चित्त में आत्म-प्रसाद है, भीतर प्रसन्नता है तो वह शील से, सदगुणों से। परहित के लिए किया हुआ थोड़ा सा संकल्प, परोपकारार्थ किया हुआ थोड़ा-सा काम हृदय में शान्ति, आनन्द और साहस ले आता है।
गुरुदेव का सान्निध्य साधक के लिए एक सलामत नौका है जो अंधकार के उस पार निर्भयता के किनारे पहुँचाती है। जो साधक अपने साधनापथ में ईमानदारी से और सच्चे हृदय से प्रयत्न करता है और ईश्वर साक्षात्कार के लिए तड़पता है उस योग्य शिष्य पर गुरुदेव की कृपा उतरती है।आजकल शिष्य ऐश-आराम का जीवन जीते हुए और गुरु की आज्ञा का पालन किये बिना उनकी कृपा की आकांक्षा रखते है
जिस बालक को माँ ने अपना माना है,वह छोरा दौड़कर गोद में चढ़ जाय तो माँ हँसेगी और जानकर ऊँ-ऊँ-ऊँ करके रोता है तो माँ हँसती है कि देखोठगाई करता है मेरे से।छोरे की वह कौन-सी क्रिया है,जिससे माँ को प्रसन्नता नहीं होती है।ऐसे ही हम भगवान् के बनकर जो भी करें,हमारी हर क्रिया भगवान् का भजन हो जायेगी।कुछ भी काम करो भगवान् खुश होत...... रहते हैं।यह मेरा बालक खेल रहा है।कैसी मस्ती है
भयंकर से भयंकर परिस्थिति आ जाय,तब भी कह दो-"आओ मेरे प्यारे!आओ,आओ,आओ।तुम कोई और नहीं हो।मैं तुम्हें जानता हूँ।तुमने मेरे लिये आवश्यक समझा होगा कि मैं दु:ख के वेश में आऊँ,इसलिये तुम दु:ख के वेश में आये हो।स्वागतम्!वैलकम्! आओ आओ चले आओ!" आप देखेंगे कि वह प्रतिकूलता आपके लिये इतनी उपयोगी सिद्ध होगी कि जिस पर अनेकों अनुकूलत...ायें निछावर की जा सकती है।
जिस प्रकार वस्त्र शरीर से भिन्न हैं, वैसे ही आत्मा शरीर से भिन्न हैं, आकाश की तरह सबमें व्यापक हैं। शरीर को जो इन्द्रियाँ मिली हुई हैं, उनके द्वारा शुभ कर्म करने चाहिए। सदैव शुभ देखना, सुनना एवं बोलना चाहिए।
जोअस्तित्व है उस अस्तित्व का ज्ञान नहीं है इससे हमारा भय जगहें बदल लेता है लेकिन निर्मूल नहीं होता। संसारी लोग सिखा सिखा कर क्या सिखायेंगे ? वे अज्ञानी संसार का बन्धन ही पक्का करायेंगे। जिस फ्रेम में दादा जकड़े गये, पिता जकड़े गये, उसी फ्रेम में पुत्र को भी फिट करेंगे। बन्धन से छुड़ा तो ...नहीं सकेंगे।आत्मतत्त्व नहीं जानने के कारण ही हमको सुख-दुःख की चोट लगती है।See More
शरीर को मैं कहकर बड़े-बड़े महाराजे भी भिखारियों की नाँई संसार से चले गये, परंतु जिसने अपने आत्मा के मैं को धारण कर लिया वह सारे ब्रह्माण्डों का सम्राट बन गया। उसने अक्षय राज्य, निष्कंटक राज्य पा लिया।
जैसे सोना जब खान के अन्दर था तब भी सोना था, अब उसमें से आभूषण बने तो भी वह सोना ही है और जब आभूषण नष्ट हो जायेंगे तब भी वह सोना ही रहेगा, वैसे ही केवल आनंदस्वरूप परब्रह्म ही सत्य है।चाहे शरीर रहे अथवा न रहे, जगत रहे अथवा न रहे, परंतु आत्मतत्त्व तो सदा एक-का-एक, ज्यों का त्यों है।
ओ तूफान ! उठ ! जोर-शोर से आँधी और पानी की वर्षा कर दे ओ आनन्द के महासागर ! पृथ्वी और आकाश को तोड़ दे ओ मानव ! गहरे से गहरा गोता लगा जिससे विचार एवं चिन्ताएँ छिन्न-भिन्न हो जायें आओ, अपने हृदय से द्वैत की भावना को चुन-चुनकर बाहर निकाल दें, जिससे आनन्द का महासागर प्रत्यक्ष लहराने लगे - जीवन रसायन
जीवन में ऐसे कर्म किये जायें कि एक यज्ञ बन जाय। दिन में ऐसे कर्म करो कि रात को आराम से नींद आये। आठ मास में ऐसे कर्म करो कि वर्षा के चार मास निश्चिन्तता से जी सकें। जीवन में ऐसे कर्म करो कि जीवन की शाम होने से पहले जीवनदाता से मुलाकात हो जाय।
जिसके स्पर्शमात्र से बिच्छू के काटने जैसी पीड़ा होती है, ऐसे पौधे कोगुरुजी के बैठने की जगह से मैंने दूर किया तो गुरुजी ने मुझे अच्छी तरहसे फटकारा। फटकार में करुणा तो थी ही, साथ-ही-साथ ज्ञान भी था। मुझे अभी...तक वह याद है।
भजन के द्वारा हम भगवान्‌ को खरीद लेंगे-ऐसा भाव मत रखना।भगवान्‌ तो अपनी कृपा से ही पधारते हैं।
हे नाथ! आप मिलें चाहे उम्रभर न मिलें, दर्शन दें चाहे न दें, पर हम तो आपके ही हैं ।

जो पतित सूर्य का प्रकाश पाता है, जल जिसकी प्यास बुझाता है, वायु जिसे श्वास लेने देती है, पृथ्वी जिसे आश्रय देती है, आप उसे प्यार नहीं दे सकते

जहाँ भगवान् के भक्तजन हों, वह जगह पवित्र हो जाती है, वहाँ की वायु पवित्र हो जाती है
यदि रोग को भी ईश्वर का दिया मानो तो प्रारब्ध-भोग भी हो जाता है और कष्ट तप का फल देता है इससे ईश्वर-कृपा की प्राप्ति होती है व्याकुल मत हो 'कैप्सूल' और 'इन्जेक्शन' आधीन मत हो
झूठे झगड़ेको छोड़कर साधनमें लग जाओ-जी-जानसे लग जाओ। मनुष्य-जीवन बहुत थोड़े दिनों का है देर न करो। याद रक्खो-देर में कहीं मानव जीवनका अवसान हो गया तो पीछे बहुत पछताना पड़ेगा।

Wednesday, May 19, 2010

जागो.... उठो.... अपने भीतर सोये हुए निश्चयबल को जगाओ। सर्वदेश, सर्वकाल में सर्वोत्तम आत्मबल को अर्जित करो। आत्मा में अथाह सामर्थ्य है। अपने को दीन-हीन मान बैठे तो विश्व में ऐसी कोई सत्ता नहीं जो तुम्हें ऊपर उठा सके। अपने आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो गये तो त्रिलोकी में ऐसी कोई हस्ती नहीं जो तुम्हें दबा सके।
जैसे स्वप्न में मिली हुई सजा जागृत अवस्था में नहीं रहती, दूध में से घी निकलने के बाद वह दूध में नहीं मिलता अपितु पृथक ही रहता है, लकड़ी जल जाने के बाद वह अग्निरूप हो जाती है और लकड़ी का कहीं नामोनिशान नहीं रहता है, उसी प्रकार संसारस्वप्न में से जो जीव जाग जाता है उसे फिर संसार स्वप्न की कैद में, माता के गर्भ में आने का दुर्भाग्य नहीं होता
hajaaro manushyo me koyi viralaa ishwar ke raaste chalataa hai .. hajaaro ishwar ke raaste chalane waalo me se koyi virale sidhdi paate hai aur wahaa hi ruk jaate…. aise hajaaro me koyi viralaa saty sankalp se aage badhataa hai..us me se koyi viralaa bramhgyaani banataa hai ..
शरीर के तो करोडो करोडो बार जन्म हुए, मृत्यु हुयी… केवल ये ना-समझी है की , ‘मैं ’ दुखी हूँ.. ‘मैं ’ बच्चा हूँ.. ‘मैं ’ फलानी जाती का हूँ.. ये सभी व्यवहार की रमणा है..अपना व्यवहार चलाने के लिए बाहर से चले लेकिन अन्दर से जाने की “सोऽहं.. सोऽहं” मैं वो ही हूँ!..सत -चित-आनंद स्वरुप!….जो पहेले था, बाद में भी रहेगा वो ही मैं अब भी हूँ…
जो मनुष्य संसारसे दु:खी होकर ऐसा सोचता है को कोई तो अपना होता,जो मुझे अपनी शरणमें लेकर,अपने गले लगाकर मेरे दु:ख,सन्ताप,पाप,अभाव,भय नीरसता आदिको हर लेता,उसको भगवान्‌ अपनी भक्ति प्रदान करते हैं।परन्तु जो मनुष्य केवल संसार के दु:खोंसे मुक्त होना चाहता है,उसको भगवान्‌ मुक्ति प्रदान करते हैं।

Monday, May 17, 2010

लक्ष्य जितना ऊँचा होता है उतने ही संकल्प शुद्ध होते हैं। ऊँचा लक्ष्य है मोक्ष,परमात्मा-प्राप्ति, , अनन्त ब्रह्माण्डनायकईश्वर से मिलना। ऊँचा लक्ष्य तुच्छ संकल्पों को दूर कर देता है। ऊँचा संकल्प जितना दृढ़ होगा उतना ही तुच्छ संकल्पों को हटाने में सफलता मिलेगी।, उतना ही ऊँचा जीवन, ऊँची समझ, ऊँचा स्वास्थ्य, ऊँचा सुख, ऊँची शांति और ऊँचे में ऊँचे परमात्मा की प्राप्ति सुलभ होगी।
आप जो भी कार्य करो यज्ञार्थ भावना से करो, ईश्वर से नाता जोड़ने के लिए करो, दूसरों का कल्याण करने की भावना से करो, अपनी वासनाएँ निवृत्त करके जीवन को निर्मल बनाने के हेतु से करो सबमें मेरा ही नारायण स्वरूप विलास कर रहा है'- ऐसी मंगल भावना से व्यवहार होता है वह परम मांगल्य के द्वार खोल देता है।
नम्रतापूर्वक पूज्यश्री सदगुरू के पदारविन्द के पास जाओ। सदगुरू के जीवनदायी चरणों में साष्टांग प्रणाम करो। सदगुरू के चरणकमल की शरण में जाओ। सदगुरू केपावन चरणों की पूजा करो। सदगुरू के पावन चरणों का ध्यान करो। । सदगुरू के यशःकारीचरणों की सेवा में जीवन अर्पण करो।
ऐसा कोई लोक नहीं जिसका विनाश न हो। ऐसा कोई शरीर नहीं जो मरता न हो। ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसका रूपान्तर न हो। यह अकाट्य सिद्धान्त है।अपनी बुद्धि की योग्यता बढ़ाकर, अपनी क्षमता बढ़ाकर यहीं अपनी अमरता का साक्षात्कार कर लो।तुम निर्भीक हो, निर्द्वन्द्व हो। निश्चिन्त जीवन जीने की कला पाकर जीते जी मुक्त बनो।

Friday, May 14, 2010

Apni karni se tum guru ko pass ya door anubhav karte ho. Wo na kisi ko door karte hain, na hi pass laate hain. Tumhari shradha hi tumhe aisa ehsaas karati hai - Ashram SMS
हे नाथ ! हे मेरे नाथ! । छोटा बालक रोता है तो माँ आ ही जाती है । बालक घरका कुछ काम नहीं करता, पर जब वह रोने लगता है, तब माँको सब काम छोडकर बालकको उठाना पडता है । बालकका एकमात्र बल रोना ही है—‘बालानां रोदनं बलम्’ । रोनेमें बड़ी ताकत है । सच्चे ह्रदयसे व्याकुल होकर यह बालक आपको पुकार रहा है, आपके लिए रो रहा है ! आपको आकर उठाना ही पड़ेगा
अगर भगवान् हमारे पापोंसे अटक जायँ तो हमारे पाप भगवान् से प्रबल हुए ! अगर पाप प्रबल (बलवान्) हैं तो भगवान् मिलकर भी क्या निहाल करेंगे ? जो पापोंसे अटक जाय, उसके मिलनेसे क्या लाभ ? परन्तु भगवान् इतने निर्बल नहीं हैं, जो पापोंसे अटक जायँ । उनके समान बलवान् कोई है नहीं, हुआ नहीं, होगा नहीं, हो सकता ही नहीं । आपकी जोरदार इच्छा हो जाय तो आप कैसे ही हों, भगवान् तो मिलेंगे, मिलेंगे, मिलेंगे !
किसीकी भूल न ढूंढो; भूल दिखे तो उसे भूल जाओ, उसके अच्छे हेतु, परिश्रम और लगनकी ह्रदयसे कद्र करो; उसके कार्यमें गुणोको ढूंढों भलाई की खोज करो तुम गुणवान और भले आदमी बन जाओ
भगवान्‌ की व्याकुलता तभी होती है,जब कि वह भक्त संसारके समस्त पदर्थोंसे परमात्मा को बड़ा समझता है;इस लोक और परलोकके समस्त भोगोंको अत्यन्त तुच्छ और नगण्य समझकर केवल एक परम प्यारे परमात्मा के लिये अपने जीवन,धन,ऐश्वर्य,मान,लो्कलज्जा,लोकधर्म और वेदधर्म सबको समर्पण कर चुकता है।
Gurudev ke aage roz RONA chahiye, ki gurudev aap itna satsang ke dwara GYAN de rahe hai, phir bhi hamara vivek, vairagya kyo jagrut nahi hota. Kyo sansar se preeti ho rahi hai, parmatma se preeti kyo nahi hoti, aise din kab aayenge ki ham ye drishyaman jagat swapne jaisa lagega. - Hari Om
माँका ॠण सबसे बड़ा होता है।परन्तु पुत्र भगवान्‌ का भक्त हो जाय तो माँका ऋण नहीं रहता और माँ का कल्याण भी हो जाता है! इसलिये बहनों!माताओ! अपने बालकोंको भगवान्‌ में लगाओ,उनको भक्त बनाओ!आपकी गोदीमें भक्त आये,भगवान्‌ का भजन करनेवाला आये ऐसा बेटा हो।ऐसा बालक होना बिलकुल आपके हाथकी बात है।बालक का पहला गुरु माँ है।माँ का स्वभाव पुत्रपर ज्यादा आता है।
आया जहाँ से सैर करने, हे मुसाफिर ! तू यहाँ। था सैर करके लौट जाना, युक्त तुझको फिर वहाँ। तू सैर करना भूलकर, निज घर बनाकर टिक गया। कर याद अपने देश की, परदेश में क्यों रुक गया।। फँसकर अविद्या जाल में, आनन्द अपना खो दिया। नहाकर जगत मल सिन्धु में, रंग रूप सुन्दर धो दिया। निःशोक है तू सर्वदा, क्यों मोह वश पागल भया। तज दे मुसाफिर ! नींद, जग, अब भी न तेरा कुछ गया।।

Friday, May 7, 2010

jis ka koyi janm nahi hota , jis ka koyi mrutyu nahi hota , vo hum hai…janm humhara nahi hota, sharir ka hota hai..raag dwesh hum ko nahi hota , man me hota hai…bimari hum ko nahi hoti, sharir ko hoti hai..
khana khavoge to pet bharega , koshish karoge to manjil pavoge vese hi souoge to nind me javoge aur didi sona to duniya ke liye hai aap atma nindra me javo , yog nindra me javo aur pa lo apne prabhu ko unki kripa ko
satsang sunte sunte uski masti me kho jana aur dub jana us parmatma me jo nirntar hai , hamesha hai , sadha hai , kabhi dur huwa nahi , kabhi paraya huwa nahi , kabhi alag huwa nahi , jo hamesha hamare pass hai , hamare sath hai , hamare under hai
yah sharir jal jaye uske pahele teri jyot jag jaye , yah tan chut jaye iske pahele sansari akarshan chut jaye , pani ka anjalikoi muje de uske pahele meri ankho se bahete ashru bindu teje pighala de mere data ab to isi daya kar do mere data muje me muj ko dikha do , tuj me mujko basa lo
yah sharir jal jaye uske pahele teri jyot jag jaye , yah tan chut jaye iske pahele sansari akarshan chut jaye , pani ka anjalikoi muje de uske pahele meri ankho se bahete ashru bindu teje pighala de mere data ab to isi daya kar do mere data muje me muj ko dikha do , tuj me mujko basa lo
Bhagwan santi ke mahasagar hain, anand ke mahastrot, ve apne hisse ki shanti, anand,madhurya ka humen anubhav karva rahe hain phir bhi hum unhen door mante hain - Ashram SMS
जिसके पास गुरूकृपा रूपी धन है वह सम्राटों का सम्राट है। जो गुरूदेव की छत्रछाया के नीचे आ गये हैं, उनके जीवन चमक उठते हैं। गुरूदेव ऐसे साथी हैं जो शिष्य के आत्मज्ञान के पथ पर आनेवाली तमाम बाधाओं को काट-छाँटकर उसे ऐसे पद पर पहुँचा देते हैं जहाँ पहुँचकर फिर वह विचलित नहीं होता।
किसी के ह्रदय में व्यर्थ का आघात न करना। अपने व्यवहार से कभी भी किसी के मन को व्यथा न पहुंचाना। गुलाब के समान काँटों से क्षत विक्षत होकर भी सभी को सुगंध का दान देना। किसी की प्रशंसा स्तुति से पिघलना मत एवंकिसी के द्वारा की गई आलोचना से उबलना मत ,आलोचना, आत्मसंशोधन तथा उन्नति में सहायता पहुँचाती है एवं विवेक बुद्धि को जाग्रत रखती है।
हे नाथ ! हम आपके विवेक का दूर उपयोग करके पतनकी तरफ जा रहे हैं और उसमें अपनी बुद्धिमानी मान रहे हैं! हे नाथ! पतित्तोंका उद्धार करना आपका सहज स्वभाव है आपके इस स्वभावको देखकर हमारे मनमें विशेष उत्साह होता है की हम पतित हैं और आप पतितपावन हैं, फिर हमारा उधार होनेमें क्या संदेह है?
‘अब हमें परमात्माकी प्राप्ति ही करनी है, हमें इस मार्गपर ही चलना है’—ऐसा अटल निश्चय हो जाय । लोग निंदा करें या स्तुति करें, धन आ जाय या चला जाय, शरीर ठीक रहे या बीमार हो जाय, हम जीते रहें या मर जायँ, पर हम इस निश्चय पर अडिग रहेंगे । इस तरह ‘मैं’-पनमें यह भाव कर लिया जाय कि ‘मैं तो केवल पारमार्थिक साधक हूँ’ तो फिर साधन अपने-आप होगा ।
सत्य का अधिकारी कौन है? जिसको प्रसन्नता देने के लिए संसार असमर्थ है, अर्थात जिसको भोग में रोग, हर्ष में शोक, संयोग में वियोग, सुख में दुःख, घर में वन, जीवन में मृत्यु का अनुभव होता है, वही सत्य का अधिकारी है
"जीवन की सम्पूर्णता है आनन्द और आनन्द परमात्मा का ही एक रूप या एक नामहै, जिसे सच्चिदानन्द कहा जाता है। हमारा जन्म परमात्मा से मिलने के लिए हीहुआ है और इसी उद्देश्य को लेकर हम दुनिया में आए है। वस्तुतः जीवन एक अवसर है परमात्मा से मिलने के लिए।"
भगवान शिव ने जब विष पीया तो उसको गले मैं रखा और इस दुनिया को कह दिया की दुनिया की कड़वाहट को पी जाना , पर कड़वाहट को पीकर गले तक ही रखना ,गले से नीचे नहीं उतरनेदेना .दिल तक नहीं पहुँचने देना .दुनिया की बातें दिल को लगाने के लिए नहीं है !अगर दिल पर लगाकर बैठ गए तो खुद का जीना मुश्किल हों जाएगा !और अगर कड़वाहट को मुख से बाहर उगल दिया तो दूसरों के लिए परशानी खाडी हों जाएगी

Sunday, May 2, 2010

यह दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है....

यह दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ,
कोई दिन में तारे दिखाए तो क्या है ,
यह महलो यह तख्तो यह ताजो की दुनिया,
यह दोलत के भूखे रिवाजो की दुनिया ,
हकीकत के दुश्मन समाजो की दुनिया,
यह दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ,
हर एक जिस्म के साथ ही मौत चलती ,
यह बढती जवानी अभी देख उड़लती ,
जहा है ख़ुशी वही आहे निकलती ,
यह दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ,
हर एक दिल है घायल हर एक रूह प्यासी ,
निगाहों में उलझन है भीतर उदासी ,
हर एक जोश के साथ है बदहवासी ,
यह दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ,
यहाँ तो खिलौना है इंसान की हस्ती ,
यह बस्ती है मुर्दा परस्तो की बस्ती,
यहाँ पर तो जीवन से है मौत सस्ती ,
यह दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ,
यहाँ सब भटकते है बदकार बनकर,
यहाँ जिस्म सजते है बाजार बनकर ,
यहाँ प्यार होता है व्यापर बनकर,
यह दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ,
यह दुनिया जहा आदमी कुछ नहीं है ,
वफ़ा कुछ नहीं दोस्ती कुछ नहीं है ,
यहाँ सत्य की कदर भी कुछ नहीं है ,
यह दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ,
समझ है तो दुनिया के पीछे न भागो ,
जो भी मद हो छोडो अपने में जागो ,
कुछ अपना न मानो
जो व्यक्ति ध्यान करने लगता है , धन कि तरफ जाने कि उसकी दौड़ अपने आप् कम हो जाती है क्योंकि अब बड़ा धन उपलब्ध होने लगा , छोटी दौड़ छूटने लगी जब हीरे मिलते हो तो कंकड़ पत्थर कौन इकट्ठे करता है ? तुम छोटे से मत लड़ो तुम बड़े को जगाओ छुद्र से लड़े कि भटक जाओगे विराट से जुडो छोटा अपने आप् विराट में लीन हो जाएगा और विराट में लीन होकर छोटा भी विराट हो जाता है...
‘हे प्रभु ! हे दया के सागर ! तेरे द्वार पर आये हैं । तेरे पास कोई कमी नहीं । तू हमें बल दे, तू हमें हिम्मत दे कि तेरे मार्ग पर कदम रखे हैं तो पँहुचकर ही रहें । हे मेरे प्रभु ! देह की ममता को तोड़कर तेरे साथ अपने दिल को जोड़ लें

हे नाथ! दूसरा कौन है जो आपके सदृश दीनों को छाती से लगा ले?जिसको सारा संसार घृणाकी दृष्टिसे देखता है,घर के लोग त्याग देते हैं,कोई भी मुँह से बोलनेवाला नहीं होता,उसके आप होते हैं,उसको तुरंत गोदमें लेकर मस्तक सूँघने लगते हैं,हृदय से लगाकर अभय कर देते हैं।ऐसा कौन पतित है जो आपको पुकारनेपर भी आपकी दयादृष्टिसे वञ्चित रहा है? हे अभयदाता!मैं तो हर तरहसे आपकी शरण हूँ,आपका हूँ,मुझे अपनाइये प्रभु!
आया जहाँ से सैर करने, हे मुसाफिर ! तू यहाँ। था सैर करके लौट जाना, युक्त तुझको फिर वहाँ। तू सैर करना भूलकर, निज घर बनाकर टिक गया। कर याद अपने देश की, परदेश में क्यों रुक गया।। फँसकर अविद्या जाल में, आनन्द अपना खो दिया। नहाकर जगत मल सिन्धु में, रंग रूप सुन्दर धो दिया। निःशोक है तू सर्वदा, क्यों मोह वश पागल भया। तज दे मुसाफिर ! नींद, जग, अब भी न तेरा कुछ गया।।

जहाँ भी गुरुवर चरण धरे वो धरती नसीबों वाली है...

श्रद्धा भाव से गुरु प्रेम में भक्त जो मारे गोता है ,
बिन मांगे सब कुछ वो पता ,उसका मंगल होता है,
गुरु ज्ञान के सूरज से फिर रात न रहती काली है,
जहाँ भी गुरुवर चरण धरे वो धरती नसीबों वाली है,
हम तो जाते भूल उन्हें पर वो तो पास ही रहते हैं,
उनका ह्रदय कोमल निर्मल सदा वो हित ही करते हैं,
हम सबका जीवन एक बगिया , वो बगिया के माली हैं,
जहाँ भी गुरुवर चरण धरे वो धरती नसीबों वाली है,
गुरु शिष्य का रिश्ता जग में सबसे प्यारा होता है ,
पवन हो जाता है वो जो गुरु की याद में रोता है,
गुरु आज्ञा मानी तो समझो अपनी बिगड़ी बना ली है,
जहाँ भी गुरुवर चरण धरे वो धरती नसीबों वाली है …
इनके चरणों में सुख सच्चा , सरे तीर्थ धाम यही ,
गुरु जो देते उससे ऊँचा होता है कोई नाम नहीं,
सार्थक है बस उसका जीवन , जिसने भक्ति पा ली है,
जहाँ भी गुरुवर चरण धरे वो धरती नसीबों वाली है …
निगुरे निंदक महा पापी निर्दोष पे डिश लगते है ,
फिर भी कैसा संत ह्रदय वो सब कुछ सहते जाते हैं,
कर्मों की गति गहन है निंदक मद में फुले जाते हैं ,
ऐसे महापापी तो सीधे नरक कुंड में जाते हैं...

अनमोल वचन...

1) जगत कि ओर देखने वाला अहंकर से भरता है, प्रभु कि ओर देखने वाला प्रेम से पूर्ण होता है
2) अहंकर सदा लेकर प्रसन्न होता है, प्रेम सदा देकर संतुष्ट होता है
3) अहंकर को अकड़ने का अभ्यास है, प्रेम सदा झुक कर रहता है
4) अहंकर जिस पर बरसता है उसे तोड़ देता है, प्रेम जिस पर बरसता है उसे जोड़ देता है
5) अहंकर सबको ताप देता है, प्रेम मीठे जल सी तृप्ति देता है
6) अहंकर संग्रह (collection) में लगा रहता है, प्रेम बाँट बाँट (distribution) कर बढता है
7) अहंकर सबसे आगे रहना चाहता है, प्रेम सबके पीछे रहने में प्रसन्न है
8) अहंकर बहुत कुछ पाकर भी भिखारी है, प्रेम आकिंचन रहकर भी पूर्ण-धनी है
वास्तवमें तो एक भगवान् या आत्मा के अतिरिक्त अन्य किसी की सत्ता ही नहीं, इस सत्य को प्राप्त करके कृतकृत्य हो जाओ। निश्चय मानो, तुम जड अनित्य नहीं सच्चिदानन्द आत्मा हो।
संसार के सुख पाने की इच्छा दोष ले आती है और आत्मसुख पाने की इच्छा सदगुण ले आती है। ऐसा कोई दुर्गुण नहीं जो संसार के भोग की इच्छा से पैदा न हो। व्यक्ति बुद्धिमान हो, लेकिन भोग की इच्छा उसमें दुर्गुण ले आयेगी। चाहे कितना भी बुद्धू हो, लेकिन ईश्वर प्राप्ति की इच्छा उसमें सदगुण ले आएगी।

utho pyare....

कई रात्रियाँ तुमने सो-सोकर गुजार दीं और दिन में स्वाद ले लेकर तुम समाप्त होने को जा रहे हो। शरीर को स्वाद दिलाते-दिलाते तुम्हारी यह उम्र, यह शरीर बुढ़ापे की खाई में गिरने को जा रहा है। शरीर को सुलाते-सुलाते तुम्हारी वृद्धावस्था आ रही है। अंत में तो.... तुम लम्बे पैर करके सो जाओगे। जगाने वाले चिल्लायेंगे फिर भी तुम नहीं सुन पाओगे। डॉक्टर और हकीम तुम्हें छुड़ाना चाहेंगे रोग और मौत से, लेकिन नहीं छुड़ा पायेंगे। ऐसा दिन न चाहने पर भी आयेगा। जब तुम्हें स्मशान में लकड़ियों पर सोना पड़ेगा और अग्नि शरीर को स्वाहा कर देगी। एक दिन तो कब्र में सड़ने गलने को यह शरीर गाड़ना ही है। शरीर कब्र में जाए उसके पहले ही इसके अहंकार को कब्र में भेज दो..... शरीर चिता में जल जाये इसके पहले ही इसे ज्ञान की अग्नि में पकने दो।
इस संसार रूपी अरण्य में कदम-कदम पर काँटे बिखरे पड़े हैं। अपने पावन दृष्टिकोण से तू उन काँटो और केंकड़ों से आकीर्ण मार्ग को अपना साधन बना लेना। विघ्न मुसीबत आये तब तू वैराग्य जगा लेना। सुख व अनुकूलता में अपना सेवाभाव बढ़ा लेना। बीच-बीच में अपने आत्म-स्वरूप में गोता लगाते रहना, आत्म-विश्रान्ति पाते रहना।
जो बिना सीखे हो, वही सच्चा ’ज्ञान’ है अर्थात् स्वभावत: आ जाय । जो बिना हेतु के हो, वही सच्चा ’प्रेम’ है । और जो बिना किये हो, वही सच्चा ’त्याग’ है, क्योंकि सच्चा त्याग करना नहीं पड़ता, हो जाता है

sukh dukh ....

sukh dukh ko apanaa maanate to chhote hote… apane ko nity maanate to nity ke bal se hi to a-nity dikhataa hai… dukh aayaa to socho ki mai dukh ko jaanataa hun, dukh mere ko nahi jaanataa… sukh aayaa…sukh chalaa gayaa… mai to nahi gayaa, mai to rahaa naa… bachapan chalaa gayaa tum gaye kyaa? mai kaali bhut jaisi hun, raat ko dikhe hi nahi… kaali bhut jaisi bhi hai lekin gayi kyaa? …lekin bhut jaise dikhate ye bhi man ki kalpanaa hi hai..jaise hai taise hai lekin ‘jis paramaatm sattaa se dikhate vo dekhane waali sattaa ‘mai’ hun’ aisaa jaane to janm karm divy ho gayaa…! chintaa ke bhaav me chintaa-may janm hotaa… dukh ke bhaav me aaye to dukh-may janm hotaa…

apane shaant swabhaav me sthit baithe to badaa ras aataa hai… bramhgyaani ke aatmaa ke sukh ke aage indra kaa sukh bhi kuchh nahi…indr jis chij ko chaahe, vo aage aa jaaye .. ye sukh ki paraakaasthaa hai.. lekin aatm sukh ke aage ye sukh paane ki kalaa sau vi kalaa hai.. indr jo chij chaahegaa vo bhogane ke liye sukh paane ke liye sharir ki shakti kharchegaa.. aatmshakti waalaa shakti kharchegaa hi nahi, vo to aise hi sukh me hai..!

koyi ichhaa nahi.. sukh swarup aatmaa chamcham laheraa rahaa hai…khud bhi sukh me aur jahaa najar daale un ko bhi sukh dilaaye…!!.. ye nirdosh sukh hai..ye antarang sukh hai…!!!
हो जा अजर ! हो जा अमर !!जो मोक्ष है तू चाहता, विष सम विषय तज तात रे।आर्जव क्षमा संतोष शम दम, पी सुधा दिन रात रे।।संसार जलती आग है, इस आग से झट भाग कर।आ शांत शीतल देश में, हो जा अजर ! हो जा अमर !!
भूल से उत्पन्न हुई असावधानी और असावधानी से उत्पन्न एवं पोषित दोषों को मिटाने में अपने को असमर्थ स्वीकार करना और नित्य प्राप्त,स्वत: सिद्ध निर्दोषता से निराश होना मानव-जीवन का घोर अनादर है।यह नियम है कि जो अपना आदर नहीं करता,उसका कोई आदर नहीं करता।अपने आदर का अर्थ दूसरों का अनादर नहीं है,अपितु दूसरों के अनादर से तो अपना... ही अनादर होने लगता है;क्योंकि जो किसी को भी दोषी मानता है,वह स्वयं निर्दोष नहीं हो सकता।See More

Sunday, April 25, 2010

जिस किसी कामको करो,उसको सुचारुरुपसे करो,जिससे आपके मनमें सन्तोष हो और दूसरे भी कहें कि बहुत अच्छा काम करता है।लिखना हो,पढ़ना हो,बिक्री करना हो,खरीदारी करना हो आदि-आदि संसारका जो कुछ काम करना हो,उसको बड़े सुचारुरुपसे करो।माता-बहनें रसोई बनायें तो अच्छी तरह से बनायें।सामग्री भले ही कैसी हो,पर चीज बढ़िया बनायें।सबको कैसे संतोष हो-ऐसा भाव रखकर सब काम करें।

Whatever work you do, do it satisfactorily, whereby you feel contented in your mind, and others also feel that he is doing a fine job. Whether it be writing, reading, selling, buying, etc., whatever work there is in this life, do it well and with great joy. Mothers-sisters, when you cook, do it well. Whatever may be the available supplies, but make great things. Do all work with the sentiments, that how can I make everyone satisfied

किसी गरीबके सामने गर्वभरी वाणी बोलना,उसके साथ रुखा और कठोर व्यवहार करना भगवान् का अपराध है;क्योंकि उस गरीबके रुपमें भगवान् ही तुम्हारे सामने प्रकट हैं।अतएव सभीके साथ नम्र होकर मधुर वाणी बोलो;अपनी विनय-विनम्र पीयूषवर्षिणी वाणी तथा व्यवहारके द्वारा सर्वत्र शीतल मधुर-सुधाकी धारा बहा दो और यह सब करो केवल भगवान् की सेवा के लिये।तुम्हारी सेवासे भगवान् बड़े प्रसन्न होंगे और उनकी प्रसन्नता तुम्हारे जीवनको परम सफ़ल बना देगी।

In front of someone poor, to speak with arrogance, to speak and relate with them roughly and with harshness is a slander on God. God Himself has appeared in front of you in the form of the poor person. Therefore speak with humility and with a sweet and pleasant voice. And relating with others in a courteous-mild, nectar-filled voice, let the cool, sweet-ambrosia flow and do all of this to serve God. God will be very pleased by your service and his happiness will make your life an eternal success.

कष्टमें हमें भगवान् याद आते हैं।हमलोग संसारके तुच्छ,नाशवान् भोगोंके पीछे भगवान् को भूले रहते हैं।इसलिये बीच-बीचमें कष्ट देकर भगवान् हमें चेतावानी देते रहते हैं कि मुझे भूलो मत,नहीं तो बड़ी दुर्दशा होगी,यह मनुष्यशरीर भोगोंके लिये नहीं मिला है,मुझे प्राप्त करने के लिये ही मिला है-इसलिये इसे व्यर्थ कामोंमें न गँवाओ।

In difficulties, we remember God. We forget God in the midst of running after worldly sense enjoyments that are temporary and worthless. Therefore inbetween by giving us some difficulties, God is alerting us to not forget Him. Without that our state would be terrible. This human body has not been received for sense enjoyments. It has been received only to realize Me - therefore do not waste it away on useless activities.

साधन से न तो निराश होना चाहिए और न ही हार स्वीकार करनी चाहिए।जो साधक साधन करने से निराश नहीं होता और हार स्वीकार नहीं करता,वह अवश्य सिद्धि पाता है।असफ़लता का कारण एकमात्र साधन से निराश होना और हार स्वीकार करना है,जो साधक की अपनी ही असावधानी है।

One must not feel dejected by their spiritual disciplines nor accept a defeat. an aspirant that is not feeling a sense of hopelessness and does not accept defeat, he will definitely attain perfection. The reason for lack of success is due to disappointment with one's spiritual discipline and due to accepting defeat, which is an aspirant's own lack of caution and alertness!

हे नाथ!तुम्हारे सिवा हम-सरीखे पामर गरीब दीनों को कौन आश्रय देगा?अपनी ही ओर देखकर ही अब तो हमें खींचकर चारु चरणोंमें डाल दो।प्रभो! हमें मोक्ष नहीं चाहिये,तुम्हारा कोई धाम नहीं चाहिये,स्वर्ग या मर्त्यलोकमें कोई नाम नहीं चाहिये।हमें तो बस,तुम अपनी चरणरजमें बेसुध होनेवाले पागल बना दो।तुम्हारा नाम लेते ही नेत्रोंसे आनन्दके आँसुओंकी धारा बहने लगे,गद्गद् होकर वाणी रुक जाये और समस्त शरीर रोमाञ्चित हो जाये।

Thursday, April 22, 2010

भगवान् के प्रेमका मूर्तिमान् विग्रह बने हुए भक्तको सारा संसार परम प्रेममय और परम आनन्दमय प्रतीत होने लगता है।वह जिस मार्गसे जाता है उसी मार्गमें श्रद्धा,प्रेम,भक्ति,आनन्द,समता और शान्तिका प्रवाह बहने लगता है।ऐसे भक्तको अपने ऊपर धारणकर धरणी धन्य और सनाथ होती है,पितरगण प्रमुदित हो जाते हैं और देवता नाचने लगते हैं।
यह नियम है कि जिसके मन की बात पूरी होती है,वह उससे प्रेम करने लगता है जिसने उसके मन की बात पूरी की।अत: आस्तिक को अपनी बात पूरी न होने में विशेष कृपा का अनुभव इस कारण होता है कि अब मेरे प्यारे ने अपने मन की बात की है,अत: वे मुझसे अवश्य प्रेम करेंगे।प्रेमास्पद का प्रेम ही तो प्रेमी का सर्वस्व है।इस दृष्टि से आस्तिक किसी भी अवस्था में क्षुब्ध नहीं होता।
तुम्हारे द्वारा किसी प्राणीकी कभी कॊई सेवा हो जाय तो यह अभिमान न करो कि मैंने उसका उपकार किया है।यह निश्चित समझो कि उसको तुम्हारे द्वरा बनी हुई सेवासे जो सुख मिला है,वह निश्चय ही उसके किसी शुभ कर्म का फल है;तुम तो उसमें केवल निमित बने हो।ईश्वरका धन्यवाद करो,जिसने तुम्हें किसी को सुख पहुँचानेमें निमित बनाया और उस प्राणीका उपकार मानो,जिसने तुम्हारी सेवा स्वीकार की।
किसी भक्त ने कहा है-’हे नरकासुरका अन्त करनेवाले प्रभो! आप चाहे मेरा स्वर्गमें निवास कर दें,चाहे पृथ्वीपर निवास कर दें और चाहे नरकोंमें निवास कर दें।इसके लिये मैं मना नहीं करता।मेरी तो एक ही माँग है कि शरदऋतुके कमलकी शोभाको हरनेवाले आपके जो चरण हैं,उनको मृत्यु-अवस्थामें भी भूलूँ नही।आपके चरण मेरेको सदा याद रहें।’
हमारेपर भगवान् की कृपानिरन्तर होरही है परहम उधर देखतेही नहीं!हमउस कृपाकी अवज्ञा करते हैं,निरादर करते हैं,फिरभी भगवान् अपना कृपालु स्वभाव नहीं छोड़ते,कृपा करतेही रहते हैं।बालक माँकाकोई कम निरादर नहीं करता।कहीं पेशाब कर देता है,कहीं थूकदेता है पर माँ सब कुछ सहलेती है।हमभी उल्टे चलनेमें बालककी तरह तेज हैं,पर कृपा करनेमें भगवान् भी माँसे कम तेजनहीं हैं!इसलिये हमें उनकी कॄपाका भरोसा रखना चाहिये।
हे नाथ! हमें आपके चरित्र अच्छे लगें,आपकी लीला अच्छी लगे,आपके गुण अच्छे लगे,तो यह आपके कृपा ही है,हमारा कोई बल नहीं है।आज जो हम आपका नाम ले रहे हैं,आपकी चर्चा सुन रहे हैं,आपमें लगे हुए हैं,यह केवल आपकी ही कृपा है।काम,क्रोध,लोभ,मोह,मद जैसे कितने-कितने अवगुण भरे हुए हैं और कैसा कलियुग का समय है! ऐसे समयमें आपके तरफ वृति होती है तो यह केवल आपकी कृपा है।
हमारे अधिकार तभी सुरक्षित रह सकते हैं,जब हमारे साथी कर्तव्य-परायण हों;और हमारे साथियों के अधिकार तभी सुरक्षित होंगे,जब हम कर्तव्यनिष्ठ हों। हमारे कर्तव्यनिष्ठा ही हमारे साथियों में कर्तव्य परायणता उत्पन्न करेगी;क्योंकि, जिसके अधिकार सुरक्षित हो जाते हैं,उसके हृदय में हमारे प्रति प्रीति स्वत: उत्पन्न हो जाती है,जो उसे कर्तव्य-परायण होने के लिए विवश कर देती है।
आत्मबल में श्रद्धा उत्पन्न होते ही कायर शूरवीर हो जाते हैं, प्रमादी एवं आलसी उद्यमी हो जाते हैं, मूर्ख विद्वान हो जाते हैं, रोगी निरोग हो जाते हैं, दरिद्र धनवान हो जाते हैं, निर्बल बलवान हो जाते हैं और जीव शिवस्वरूप हो जाते हैं।
यदि प्राणी व्यथित हृदय से उन्हें पुकारे तो उसे सबकुछ मिल सकता है।इस दृष्टि से अपने को निर्दोष बनाने में प्रार्थना का मुख्य स्थान है।वह प्रार्थना सजीव तभी होती है,जब की हुई भूल को न दुहरा कर प्रायश्चितपूर्वक प्रार्थना की जाय।

Tuesday, April 20, 2010

जब प्राण तन से निकले...

इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकले...
गोवोंद नाम लेकर तब प्राण तन से निकले...
श्री गंगा जी का तट हो या युमना का बंसी वाट हो....
मेरा सावरा निकट हो जब प्राण तन से निकले...
इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकले...
पीताम्बरी कासी हो, छबी मन मै ये बसी हो...
होठो पे कुछ हसी हो, जब प्राण तन से निकले...
गोवोंद नाम लेकर तब प्राण तन से निकले...
जब कंठ प्राण आये, कोइयी रोग न सताये...
यम दरस न दिखाये, जब प्राण तनसे निकले...
गोवोंद नाम लेकर तब प्राण तनसे निकले...
उसवक्त जल्दी आना, नहीं स्याम भूल जाना...
राधे को साथ लाना, जब प्राण तन से निकले...
गोवोंद नाम लेकर तब प्राण तन से निकले...
एक भक्त की है अर्जी खुद गरज की है जर्गी ...
आगे तुम्हारी मर्जी, जब प्राण तन से निकले...
गोवोंद नाम लेकर तब प्राण तन से निकले...
इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकले...

Monday, April 19, 2010

अन्त:करणमें यदि प्रसन्नता न मालूम हो तो न हो,केवल सच्ची कल्पना ही कर लो कि अन्त:करण प्रसन्नता से भरा हुआ है तो वह संकल्प ही सत्य हो जायेगा। भगवान् की दयासे वह संकल्प सत्य हो जाता है,इसमें कोई संदेह नहीं।
संतोंके दर्शन,स्पर्श,उपदेश-श्रवण और चरणधूलिके सिर चढ़ानेकी बात तो दूर रही,जो कभी अपने मनसे संतोंका चिन्तन भी कर लेता है,वही शुद्धान्त:करण होकर भगव्तप्राप्ति का अधिकारी बन जाता है।
दोष को देखना है,अपने में उसकी स्थापना नहीं करना है,अपितु दोष देखने के पश्चात् तुरन्त निर्दोषता की स्थापना कर अचिन्त हो जाना है और दोष को पुन: न दोहराने का दृढ़ संकल्प करना है। उसके पश्चात् कोई कहे कि तुम दोषी हो,तो प्रसन्नचित्त होकर कह दो कि अब नहीं हूँ,पहले था।अर्थात भूतकाल के दोषों को वर्तमान में मत देखो।
दोष को देखना है,अपने में उसकी स्थापना नहीं करना है,अपितु दोष देखने के पश्चात् तुरन्त निर्दोषता की स्थापना कर अचिन्त हो जाना है और दोष को पुन: न दोहराने का दृढ़ संकल्प करना है। उसके पश्चात् कोई कहे कि तुम दोषी हो,तो प्रसन्नचित्त होकर कह दो कि अब नहीं हूँ,पहले था।अर्थात भूतकाल के दोषों को वर्तमान में मत देखो।

Sunday, April 18, 2010

सन्त संदेश--प्राण प्यारे के प्रिय साधको! सभी साधक साध्य के होकर रहें,उन्हीं की महिमा को अपनाकर सभी के लिये उपयोगी हो जाएँ,यह माँग जीवन की माँग है।अनुपयोगी वही रहता है जिसे अपने लिये किसी से कुछ चाहिए।अपना करके सृष्टि में कुछ नहीं है।’अपने’ अपने में अवश्य हैं।अपने में अपनी प्रियता स्वत: होती है,की नहीं जाती।केवल प्रेमास्पद के अस्तित्व और महत्व को अपनाना है।अकिंचन-शरणानन्द
जैसे घुटनोंके बलपर चलनेवाला छोटा बालक कोई वस्तु उठाकर अपने पिताजीको देता है तो उसके पिताजी बहुत प्रसन्न हो जाते हैं और कहते हैं कि बेटा! तू इतना बड़ा हो जा अर्थात् मेरेसे भी बड़ा हो जा।क्या बालकके देनेसे पिताजीको कोई विशेष चीज मिल गयी?नहीं।केवल बालकके देनेके भावसे ही पिताजी राजी हो गये।ऐसे ही भगवान् को किसी वस्तुकी कमी नहीं है,फिर भी भक्तके देनेके भावसे वे प्रसन्न हो जाते हैं।
हे प्रभो! थोड़ी-सी योग्यताआते ही हमेंअभिमान होजाता है! योग्यतातो थोड़ी होती है,पर मान लेते हैंकि हमतो बहुत बड़े होगये,बड़े भक्त बन गये,बड़े त्यागी,बन गये!भीतरमें यह अभिमानभरा है नाथ! आपकी ऐसीबात सुनी हैकि आप अभिमानसे द्वेश करते हो और दैन्यसे प्रेम करते हो।अगर आपको अभिमान सुहाता नहीं हैतो फिरउसको मिटादो,दूर करदो।बालककीचड़से सना होऔर गोदीमें जाना चाहता होतो माँही उसको धोयेगी और कौनधोयेगा?
मोह के कारण ही तुम सांसारिक भोग-सुखोंको चाहते हो और सांसारिक दु:खोंको भयानक मानकर उनसे भागना चाहते हो।विस्वास करो,जो सुख भगवान् का विस्मरण कराकर भगवान् की ओर अरुचि उत्पन्न कर दे,उसके समान कोई भी हमारा शत्रु नहीं है।और जो दु:ख विषयोंसे हटाकर भगवान् की ओर लगा दे,उसके समान हमारा कोई मित्र नहीं है।
भगवान् सर्वज्ञ हैं।अपना सच्चा हित किसमें है यह वही जानते हैं,अतएव उनपर खूब विश्वास करके किसी बात की चिन्ता न रखे।जैसे गूँगा मिश्री खाकर आनन्दमें मुग्ध हो जाता है,वैसे ही भगवान् की दयाका विचार करके उसीमें निमग्न हो जाना चाहिये और किसी बातका विचार नहीं करना चाहिये।भगवान् के राजीमें राजी रहे।फिर भगवान् चाहे खड्डेमें क्यों न डाल दें।उसमें कोई आपति नहीं। उसीमें प्रसन्न रहे।

Saturday, April 17, 2010

सभी बुरे विचार एवं दुर्गुण भगवान् के मार्गपर चलना प्रारम्भ कर देनेपर अपने-आप छूट जायेंगे।धन कमानेका उद्देश्य रखनेवाला एक पैसेके नाशको भी सह नहीं सकता।वैसे ही जो भगवान् को उद्देश्य बनाकर चलेगा,उसे भगवान् की प्राप्तिकी विरोधी बातें अच्छी ही नहीं लगेंगीं।मामूली दुर्गण भी उसे बहुत खलेंगे और उन्हें वह निकाल फेंकेगा।
जिस समय मन या हृदय एकदम पिघल जाता है,उस समय हृदयमें धारण किये गये भाव स्थायी रुपसे सुस्थिर हो जाते हैं।इसलिये भगवान् के प्रति प्रेम और श्रद्धा अपने हृदयमें स्थापित करके-रोम-रोम-में परिपूर्ण करके करुणाभावसे समय-समयपर भगवान् के लिये रोना चाहिये,व्याकुल होना चाहिये।इसके लिये लगन होना चाहिये।
प्रेममें मगन होकर भगवान् का भजन लगनसे करे और भगवान् के आगे करुणाभावसे रोता रहे-’हे नाथ! हे हरि! हे गोविन्द! हे वासुदेव! हे नारायण! मुझे तो केवल आपका ही सहारा है,मेरा आपके बिना और कोई आधार नहीं है।प्रभु! मेरेमें न ज्ञान है,न भक्ति है,न वैराग्य है,और न प्रेम ही है।मेरेमें कुछ भी तो नहीं है!मैं तो केवल आपकी शरण हूँ,वह भी केवल वचनमात्रसे!आप ही दया करके मुझे सब प्रकारसे अपनी शरणमें लें।
वे तो परम भाग्यशाली हैं कि जिन्हें ऐसा भास होता है कि भाई,मैंने ममता तोड़ी नहीं,फिर न जाने कैसे टूट गई! मैंने तो आत्मीयता जोड़ी नहीं,फिर न जाने कैसे जुड़ गई।दोषों की निवृति का भास न हो और गुणों की अभिव्यक्ति का भास न हो,तब समझना चाहिए कि निर्दोषता से एकता हो गई।
आप कह सकते हो कि बड़ा परिवार है,रोटी-कपड़ेकी भी तंगी है,काम चलता नहीं फिर इच्छा किये बिना कैसे रहे?तो इच्छा करनेसे वस्तुएँ थोड़े ही मिलेंगी।वस्तुएँ तो काम करनेसे मिलेंगी।इसलिये वस्तुओंकी इच्छा न करके काम करने की इच्छा करो।निकम्मे,निरर्थक मत रहो।यह जो संग्रह करनेकी इच्छा है,इसका त्याग कर दो तो जो आपके भाग्यमें लिखा नहीं है,वह आपके पास आ जायेगा।
दूसरोंको सुख पहुँचाना,उनके दु:खको अपना दु:ख बनाकर अपना सुख उन्हें दे देना-इस प्रकारका क्षणभरका मनोरथ भी महान् पुण्यरुप है!दूसरेके दु:खको सर्वथा अपना बना लेना तो अत्यन्त ही महत्वकी बात है,उसके दु:खका जरा-सा हिस्सा बँटाना भी बहुत बड़ा सौभाग्य है।इसीमें मानवताका विकास है।सत्पुरुषोंको अपने दु:खकी परवा ही नहीं होती।वे तो दूसरोंके दु:खसे ही दु:खी होते हैं।
अगर आपको निकम्मा ईश्वर प्यारा लगता हो,वह निष्ठुर भी हो,निकम्मा भी हो,हमें न भी चाहता हो,तब भी अगर आप उसे अपना कह सकें,तो स्मृति जगेगी।आज मालूम है,क्या है?एक सज्जन बीमार हुए।उनकी स्त्री ने कहीं सुन लिया कि भगवान् सबकी रक्षा करते हैं।बस.खूब पूजा हुई,पति अच्छे हो गये।दोबारा बीमार हुए,खूब पूजा हुई,मर गए।ठाकुरजी को उठाकर फेंक दिया।
हमको तो नाथ!दयाकर अपना वह प्रेम दो जिससे अश्रु-पूर्ण-लोचन और गद्गदकण्ठ होकर निरन्तर तुम्हारा नाम-गुणगान करते रहें;वह शक्ति दो,जिससे जन्म-जन्मान्तरमें कभी तुम्हारे चरणकमलोंकी विस्मृति एक क्षणके लिये स्वप्नमें भी न हो,तुम्हारा नाम लेते हुए आन्नदसे मरें और तुम्हारी इच्छासे जिस योनिमें जन्में तुम्हारी ही छ्त्र छायामें रहें।
महात्माओंका तो कहना ही क्या है,उनकी आज्ञा पालन करनेवाले मनुष्य भी परमपदको प्राप्त हो जाते हैं। भगवान् स्वयं भी कहते हैं कि जो किसी प्रकारका साधन नहीं जानता हो,वह भी महान् पुरुषोंके पास जाकर उनके कहे अनुसार चलनेसे मुक्त हो जाता है।

Thursday, April 15, 2010

Firstly, worldly sense pleasures are not received according to our wish / desire, and what we get is also incomplete, and even on getting it, it quickly comes to an end. However, on having exclusive desire for God, He is surely attained.
यदि कहें कि किस बातको लेकर खुश रहें तो इसका उत्तर यह है कि भगवान् की दयाको देख-देखकर।देखो,भगवान् की तुमपर कितनी दया है। अपार दया समझकर इतना आनन्द होना चाहिये कि वह हृदयमें समावे नहीं।हर समय आनन्दमें मुग्ध रहें।बार-बार प्रसन्न होवें।अहा प्रभुकी कितनी दया है।यही सबसे बढ़कर साधन है और यही भक्ति है एवं इसीका नाम शरण है।
भगवान् का नाम मीठा लगे,प्यारा लगे। प्यारा न लगे तो भगवान् से कहो कि ’हे नाथ! मुझे आपका नाम प्यारा लगे,हे प्रभु! मैं आपको भूलूँ नहीं।’मिनट-मिनटमें ,आधे-आधे मिनटमें कहते रहो कि ’हे नाथ! आपको भूलूँ नहीं।

सभीको प्रेमभरी मधुरता और सहानुभूतिभरी आँखोंसे देखो। याद रखो- सुखी जीवनके लिये प्रेम ही असली खुराक है। संसार इसीकी भूखसे मर रहा है! अतएव प्रेम वितरण करो- अपने हॄदयके प्रेमको हृदयमें ही मत छिपा रखो। उसे उदारताके साथ बाँटो। जगत्का बहुत-सा दु:ख दूर हो जायगा।

एक अच्छे गृहस्थ सेठ थे।एक साधु उनके घर गये तो पूछा-यह मोटर किसका है?सेठ बोला-ठाकुरजीकी!ये किसके बच्चे खेल रहे है?ठाकुरजीकी!ये लोग कौन हैं?ठाकुरजीके! पूरा मकान देखते-देखते ऊपर गये तो वहाँ मन्दिर था।यह मन्दिर किसका है?ठाकुरजीका!ये सोने-चाँदीके बर्तन किसके हैं?ठाकुरजीके!ये वस्त्र किसके हैं?ठाकुरजीके।साधुने ठाकुरजीकी तरफ संकेत करके पूछा-ये किसके हैं?सेठ बोला-ये तो मेरे हैं!
"आप जानते हैं रस किसे कहते हैं? जिससे कभी तृप्ति न हो,जिसको कभी निवृति और जिसकी कभी तृप्ति न हो।वह रस प्रियता में, प्रियता आत्मीयता में,आत्मीयता विश्वास में और विश्वास श्रद्धा में और श्रद्धा आस्था में निहित है।इस दृष्टि से हम सब अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार अपनी-अपनी परिस्थिति के अनुसार किसीमें आस्था करें,पर वह एक हो।एकमें आस्था होने से प्रभुमें आस्था हो जाती है।

Wednesday, April 14, 2010

निर्दोषता की अभिव्यक्ति तभी सुरक्षित रह सकती है,जब किसी के प्रति वैर-भाव की गन्ध तक न रहे।यह तभी सम्भव है जब किसी के प्रति भी दोषी भाव न रहे,अर्थात् अपने प्रति होने वाली बुराई का कारण भी अपने को ही मान लिया जाय।जिन्हें दोषी मान लिया है,यदि किसी कारण उन्हें निर्दोष माननेमें असमर्थता प्रतीत हो,तो उन्हें अनजान बालककी भाँति क्षमा कर दिया जाय।
अपनेमें योग्यता प्रत्यक्ष दीखती है,इसलिये अभिमानसे बचना बहुत कठिन होता है।मनुष्यको प्रत्यक्ष दीखता है कि मैं अधिक पढ़ा-लिखा हूँ,मैं गीता जाननेवाला हूँ,मैं कीर्तन करनेवाला हूँ,इसलिये वह फँस जाता है।अगर यह दीखने लग जाय कि यह सब केवल भगवान् की कृपासे हो रहा है तो निहाल हो जाय! ऐसा चेत भी भगवान् की कृपा से ही होता है।जिनको चेत न हो उनपर दया आनी चाहिये।वे भी चेतेंगे,पर देरी से!
भगवान् का मत वही भक्त का मत।भगवान् के भावोंका प्रचार करना ही भक्त का मत होता है।उसके सामने उसे कोई चीज प्रिय नहीं होती।यह एकदम निष्कामभाव है कि भगवान् के भावोंको कर्तव्य समझकर अपनेमें ग्रहण करना और दुनियामें प्रचार करना।
यदि निर्भरताकी कमीके कारण कभी ऐसा जान पड़े कि हमारे हृदयमें कोई कुविचार प्रवेश करना चाहता है तो हमें कातर स्वर से ’हे नाथ! हे नाथ!’ पुकारना चाहिये।प्रभुका आश्रय लेनेसे चिन्ता,भय,शोक एवं सब प्रकारके दुर्गुण-दुराचार मूलसहित नष्ट हो जाते हैं तथा सद्गुण,सदाचार एवं शान्ति आदिका स्वत: ही विकास होता है।
संसारके भोग पहले तो इच्छानुसार प्राप्त नहीं होते,प्राप्त भी अधूरे ही होते हैं और प्राप्त होकर निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं;परंतु अनन्य इच्छा करनेपर भगवान् निश्चय ही प्राप्त होते हैं।

Tuesday, April 13, 2010

जो भगवान् का भक्त बनना चाहता है,उसे सबसे पहले अपना हृदय शुद्ध करना चाहिये और नित्य एकान्तमें भगवान्से यह कातर प्रार्थना करना चाहिये कि हे भगवन्!ऎसी कृपा करो जिससे मेरे हॄदयमें तुम्हें हर घड़ी हाजिर देखकर तनिक भी पापवासना भी उठने और ठहरने न पावे।तदन्तर उस निर्मल हृदय-देशमें तुम अपना स्थिर आसन जमा लो और मैं पल-पलमें तुम्हें निरख-निरखकर निरतशय आनन्दमें मग्न होता रहूँ।
पिघले हुए चपड़ेमें जैसा भी रंग डाल दिया जाय,वह वैसा ही रंग वाला बन जाता है।इसी तरह किसीका हृदय जब पिघल जाता है तब बहुत ही अच्छा रंग चढ़ता है।जिन पुरुषोंका हृदय भगवान् के विरह की व्याकुलता में पिघला है,उनके चरित्र को करुणाभाव या प्रेमभाव से याद करे।ऐसा करने से हृदय एकदम पिघल जाता है।यदि आदमी का हृदय व्याकुल हो जाय तो उसका जीवन बहुत ही बदल जाय।
जैसे छोटा बच्चा केवल माँका ही दूध पीता है,जल-अन्न आदि कुछ नहीं लेता;अगर वह रोगी हो जाय तो माँको दवा लेनी पड़ती है।इस प्रकार केवल परमात्मतत्वको जाननेकी उत्कण्ठावाले साधक सन्त-महात्माओंकी कृपा के आश्रित रहते हैं,अपना कुछ भी अभिमान नहीं रखते।सन्त-महात्मा जो कुछ कहें-उसीके अनुसार जीवन बनाना है,ऐसा जिनका भाव हो जाता है,उन साधकोंके उद्धारके लिये सन्तोंको उद्योग करना पड़ता है।
हम लोग अपराध करनेसे नहीं हारते हैं और जब उसके परिणाममें डूबने लगते हैं तब अपना ही विकार अपनेको आगे नहीं बढ़ने देता है।लेकिन उबारनेवाले कभी नहीं थकते।कोई बात नहीं।प्यार करनेवाले माता-पिता हमारे मौजूद हैं।उन्हींके बच्चे तो हम हैं।सजाके,सँवारके,सुन्दर बनाके उन्होंने दुनियामें भेजा,कीचडमें हम गिर गये।कपड़े गन्दे हो गए।तो भी वे करुणामयी माँ,हम गिरे-पड़े,रोते हुए बच्चेको उठानेमें कभी पीछे नहीं हटते।
’हे नाथ! मेरे कर्मोंका आप कितना खयाल रखते हैं कि मैंने न जाने किस-किस जन्ममें,किस-किस परिस्थितिमें परवश होकर क्या-क्या कर्म किये हैं,उन सम्पूर्ण कर्मोंसे सर्वथा रहित करनेके लिये आप कितना विचित्र विधान करते हैं! मैं तो आपके विधानको किञ्चिन्मात्र भी समझ नहीं सकता।इसलिये हे नाथ! मैं उसमें अपनी बुद्धि क्यों लगाऊँ?मेरेको तो केवल आपकी तरफ ही देखना है।

Monday, April 12, 2010

अगर आप कहें कि हम अपने असत् को अपने प्रिय जनों के सामने रखेंगे तो हमारा आदर नहीं रहेगा।अगर आपको इतना ध्यान है कि हमारा आदर बना रहे,तो उस असत् को निकाल दो।प्रश्न ही नहीं आयेगा।लेकिन अपने जाने हुए असत् का त्याग भी न कर सको,प्रकट भी न कर सको,और आदर भी चाहो।तो सच मानो,धीरे-धीरे जो आप अनादर से बचना चाहते हो,यह बहुत बड़े अनादर की तैयारी है।
हम जानकर उद्दोगपूर्वक छिप-छिपकर पाप करते हैं।पापजन्य रुपये-पैसे,सुख-आराम मिलनेपर खुशी मनाते हैं कि हम निहाल हो गये!मौज हो गयी!इनके दोषों की तरफ हमारी दोषदृष्टि जाती ही नहीं,जिससे हम फँस जाते हैं,चौरासी लाख योनियों में जाते हैं,दु:ख भोगते हैं,कराहते हैं,चिल्लाते हैं,पुकारते हैं।फिर भी उधर ही जाने का मन करता है!क्या करें... नाथ!आप ही हमें अपनी तरफ खींच लें।
भगवान् के समान कोई सर्वसमर्थ नहीं है और कोई परम दयालु नहीं है।ऐसे भगवान् के रहते हुए भी आप दु:ख पा रहे हैं,आपकी मुक्ति नहीं हो रही है तो क्या गुरु आपको मुक्त कर देगा?क्या गुरु भगवान् से भी अधिक सर्वशक्तिमान् और दयालु है?कोरी ठगाई के सिवाय कुछ नहीं होगा!जबतक आपके भीतर अपने कल्याण की लालसा जाग्रत नहीं होगी,तबतक भगवान् भी... आपका कल्याण नहीं कर सकते,फिर गुरु कैसे कर देगा?
समस्त जगत्को भगवान् की प्रजा समझकर प्रेम करे तथा इससे बढ़कर सबको अपनी आत्मा समझकर प्रेम करे और इससे भी बढ़कर सबको भगवत्स्वरुप समझकर प्रेम करना चाहिये।

Sunday, April 11, 2010

प्रेमकी इति नहीं है।प्रथम भगवान् में प्रेम बढ़ता है तो अश्रुपात होता है,वाणी गद्गद् हो जाती है।जब आगे बढ़ जाता है,तब प्रेम में बेहोश हो जाता है। और आगे बढ़े तो होश आ जाता है फिर भगवान् मिल जाते हैं।
जैसे बच्चा माँसे दूर चला जाय तो माँ को उसकी बहुत याद आती है।माताओं की ऐसी बात सुनी हैं।दीपावली,अक्षय तृतीया आदि त्यौहार आते हैं तो माताएँ कहती हैं कि क्या बनायें? लड़का तो घर पर है नहीं,अच्छी चीज बनाकर किसको खिलायें?ऐसे ही भगवान् के लड़के हमलोग चले गये विदेशमें!अब भगवान् कहते हैं कि क्या करुँ?क्या दूँ?लड़का तो घरपर ही नह...ीं है!वह तो धन-सम्पति की तरफ लगा है,खेल-कूद में लगा है!
तुम यदि अपनेको भगवान् के प्रति सौंप देते हो,अपनी इच्छाओंको भगवान्की इच्छामें मिला देते हो एवं अपने ज्ञान और बलको भगवान् के ज्ञान और बल का अंश मान लेते हो तो निश्चय समझो-फिर तुम भगवान् की मङ्गलमयी इच्छासे मङ्गलमय बनकर केवल अपना ही कल्याण नहीं करोगे;तुम्हारा प्रत्येक विचार,तुम्हारा प्रत्येक निश्चय और तुम्हारी प्रत्येक क्...रिया अखिल जगत् का मङ्गल करनेवाली होगी।
अपने से सुखियों को देखकर आप प्रसन्न हो जायं।अपने से दुखियों को देख कर आप करुणित हो जायं।जिस हृदय में करुणा निवास करती है उस हृदयमें भोग की रुचि नहीं रहती।और जिस चित्त में प्रसन्नता निवास करती है,उसमें काम की उत्पति नहीं होती।आप हो जायेंगे भोग की वासना से रहित और काम से रहित।यह भौतिक जीवन की पराकाष्टा हो गई।
प्रेमकी इति नहीं है।प्रथम भगवान् में प्रेम बढ़ता है तो अश्रुपात होता है,वाणी गद्गद् हो जाती है।जब आगे बढ़ जाता है,तब प्रेम में बेहोश हो जाता है। और आगे बढ़े तो होश आ जाता है फिर भगवान् मिल जाते हैं।
यदि अभिमान न छूटॆ तो इसके लिये आर्तभावपूर्वक भगवान् से ही प्रार्थना करनी चाहिये कि ’हे नाथ! मैं अभिमान छोड़ना चाहता हूँ,पर मेरे से छूटता नहीं,क्या करुँ!’ तो वे छुड़ा देंगे।जो काम हमारे लिये कठिन-से-कठिन है,वह भगवान् के लिये सुगम-से-सुगम है।अत: अपनेमें कोई दोष दीखे तो भगवान् को ही पुकारना चाहिये,अपने दोष को महत्व न देकर श...रणागतिको ही महत्व देना चाहिये।
जो भजन,ध्यान आदि साधन करके मुक्ति पाते हैं वे परिश्रम करके पेट भरनेवालों के समान हैं। और जो भगवान् के देने पर भी मुक्तिको ग्रहण न करके सबका कल्याण होने के लिये भगवान् के गुण,प्रेम,तत्व,रहस्य और प्रभावयुक्त भगवान् के सिद्दान्तका संसारमें प्रचार करते हैं,वे सबको खिलाकर भोजन करनेवालों के समान हैं।
जो भजन,ध्यान आदि साधन करके मुक्ति पाते हैं वे परिश्रम करके पेट भरनेवालों के समान हैं। और जो भगवान् के देने पर भी मुक्तिको ग्रहण न करके सबका कल्याण होने के लिये भगवान् के गुण,प्रेम,तत्व,रहस्य और प्रभावयुक्त भगवान् के सिद्दान्तका संसारमें प्रचार करते हैं,वे सबको खिलाकर भोजन करनेवालों के समान हैं।
विश्वास करो-तुम कितना ही अपराध करो,कितना ही धोखा दो,कितना ही उसका तिरस्कार और अपमान करो; भगवान् के सहज प्यार में कभी कोई अन्तर नहीं पड़ता।तुम्हीं जबतक मुख मोड़े रहोगे,उनके स्नेह-सुधा-सागर में अवगाहन का सौभाग्य नहीं पा सकोगे।पर याद रखो-जिस क्षण तुमने उनकी ओर मुख मोड़ा,तुम देखोगे कि तुम्हारे किसी अपराधका,किसी धोखेका और तुम्हारे द्वरा किये हुए किसी तिरस्कार का उन्हें स्मरण ही नहीं।

Wednesday, April 7, 2010

हमको भगवान् अवश्य मिलेंगे,ऐसा अपने मन में विश्वास करना चाहिये और ऐसा निश्चित विश्वास होने के साथ ही धीरता,वीरता,निर्भयता आदि गुण आ जाते हैं और उसका साधन उसी समय तेज होने लग जाता है।
इस तरह निश्चित कर ले कि यह दैवी सम्पदा के जो गुण हैं उत्तम गुण और आचरणों का समूह है, इनका धारण करना क्या कठिन है, ये तो बहुत उत्तम बात है।इससे मनुष्य वंचित कैसे रह सकता है,जब भगवान् की दया है तो दुर्गुण और दुराचार अपने पास आ ही कैसे सकते हैं?
भगवान् के प्रेममें ऐसा हो कि भगवान् का वियोग बर्दाश्त नहीं कर सके और भगवान् के बिना एक क्षण भी उसके प्राण रह नहीं सके
बालक जबतक जीता है, चाहे बड़ा हो जाये, माँ रक्षा करती ही है इश्वररुपी माँ मरनेवाली नहीं है, इसलिए हमें चिन्ता नहीं करनी चाहिए
प्रेम का विषय बड़ा अद्भूत है प्रेमकी बाते ऐसी हैं जहाँ हम - लोगोंकी पहुँच नहीं वे बातें लिखनेवाला लिख नहीं सकता अगर वह प्रेम प्राप्त हो जाय तब तो लिखना-पढ़ना सब बन्द हो जाता है वह अपने आपको सम्हाल ही नहीं सकता
क्षमाप्राथी वही हो सकता है,जो की हुई भूल को किसी भी प्रलोभन तथा भय से दुहराता नहीं है अपितु पूर्ण निर्दोषता ही जिसे अभीष्ट है,अथवा जो अपना सर्वस्व देकर निर्दोष रहना चाहता है।निर्दोषता को सुरक्षित करने के लिये जिसे बड़ी-से-बड़ी कठिनाई सहने में प्रसन्नता होती है,वही सच्चा क्षमाप्राथी है।
बार-बार उठे-वह कौन सा क्षण होगा! वह कौनसा काल होगा! जब मैं अपने सत्यको जानूँगा अथवा अपने सत्य में निवास करुँगा। इस प्रकार की जो लालसा है,वह धीरे-धीरे असत् की कामनाओं की जड़ काट देगी।
शरणागति का साधन क्या है? शरणागत होने वाले महानुभाव को यह भली प्रकार जान लेना चाहिए कि - १. किसको शरणागत होना चाहिए २. किसके शरणागत होना चाहिए और ३. किसलिए शरणागत होना चाहिए ?
सुख और आनन्द में क्या भेद है? सुख से दुःख दब जाता है और आनन्द से मिट जाता है दबा हुआ दुःख फिर उत्पन्न होता है किन्तु मिट जाने पर फिर उत्पन्न नहीं होता
प्रेम, प्रेम-पात्र करते हैं, प्रेमी नहीं, क्योंकि प्रेम वह कर सकता है, जिसको अपने लिए कुछ भी आवश्यकता न हो प्रेमी को प्रेम-पात्र की आवश्यकता होती है, अतः प्रेमी बेचारा प्रेम नहीं कर पाता
हर स्थिति में हर जगहप्रभु की सहज कृपा पर विश्वाश करने वाले भक्त को प्रत्येक परिस्थिति में उनकी अनुकम्पा का अनुभव होता हैं. स्थितिया बदलती रहते हैं परन्तु उसे अटल विश्वास रहता हैं की प्रभु सदेव उसका कल्याण ही करते हैं , इसलिए वहा सर्वदा प्रमुदित रहता हैं.
अपनी इच्छा को त्याग करके यह कह दो कि ’भगवन्! मैं अपने आपको तुम्हारी चाह पर छोड़ता हूँ।तुम जो चाहो सो करो।मेरी चाह अगर तुम्हारी चाह के विपरीत हो तो उसे कभी पूरी न करना।तुम्हारी चाह ही पूरी हो’।
हमारे दु:ख से यदि प्रेमास्पद सुखी होता हो,तो वह दु:ख हमारे लिये सुख है- यह प्रेमीका हार्दिक भाव होता है।ऐसे दु:ख को,ऐसी विपति को वह परम सुख,परम सम्पति मानता है।मानता ही नहीं,सर्वथा ऐसा ही अनुभव करता है।
सच्चे भक्तों का एकमात्र बल भगवानका भरोसा ही है वे पूर्ण निर्भरताके साथ भगवान् के होकर अपना जीवन केवल भगवानके चिन्तनमे ही लगाया करते हैं
"दूसरेके द्वारा तुम्हारा कभी कोई अनिष्ट हो जाय तो उसके लिए दुःख न करो; उससे अपने किये हुआ बुरे कर्मका फल समझो, यह विचार कभी मनमें मत आने दो कि " अमुकने मेरा अनिष्ट कर दिया है," यह निश्चय समझो कि ईश्वरके दरबारमें अन्याय नहीं होता... वह पूर्वक्रुक्त कर्मोका फल है
अगर हम शरीर की ममता सर्वथा छोड़ दें तो शरीर प्राय: बीमार नहीं होगा।मन की ममता छोड़ दें तो मन में बुराई नहीं रहेगी।बुद्धि की ममता छोड़ दें तो बुद्धि में बुराई नहीं रहेगी।ऐसे ही मैं-पन के साथ जो ममता(अपनापन) है,उसका त्याग कर दें तो कोई बुराई नहीं रहेगी।(
आप अपनी करनी की तरफ मत देखो, अपने पापोंकी तरफ मत देखो, केवल भगवान् की तरफ देखो जैसे विदुरानी भगवान् को छिलका देती हैं तो भगवान् छिलका ही खाते हैं छिलका खानेमें भगवान् को जो आनन्द आता है, वैसा आनंद गिरी खाने में नहीं आता कारण कि विदुरानी के मनमें यह भाव है कि भगवान् मेरे हैं
मनुष्य के सामने दो ही बातें हैं - या तो वह अपनी सभी कामनाएँ पूरी कर ले अथवा उनका त्याग कर दे ! वह कामनाओंको पूरी तो कर सकता ही नहीं, फिर उनको छोड़नेमें किस बातका भय! जो हम कर सकते हैं, उसको तो करते नहीं और जो हम नहीं कर सकते, उसको करना चाहते हैं - इसी प्रमाद से दुःख पा रहे हैं !
शरणागत भक्त को भगवान् का नाम स्वाभाविक ही बड़ा मीठा,प्यारा लगता है।अगर कोई पूछे कि तुम श्वास क्यों लेते हो? यह हवाको भीतर-बाहर करनेका क्या धन्धा शुरु कर रखा है? तो यही कहेंगे कि भाई! यह धन्धा नहीं है,इसके बिना हम जी ही नहीं सकते।ऐसे ही शरणागत भक्त भजन के बिना रह नहीं सकता।जिसको सब कुछ अर्पित कर दिया,उसके विस्मरण में परम व्याकुलता,महान् छटपटाहट होने लगती है।
जिस समय सुख का प्रलोभन नहीं होगा,सुख का भोग नहीं होगा,उसी समय जिसे आप दु:ख मानते हैं या अनुभव करते हैं नहीं रहेगा,अपितु वहाँ दु:खहारी होंगे। वे कहेंगे-तुम मेरे हो! तुम कहोगे-नहीं, तुम मेरे हो। वे कहेंगे-तुम प्यारे हो। तुम कहोगे-नहीं,तुम प्यारे हो। यही अगाध अनन्त रस है और इसी में मानव जीवन कि पूर्णता है।
दयामय परमात्माकी सब जीवों पर इतनी दया है कि सम्पूर्ण रुप से तो उस दया को मनुष्य समझ ही नहीं सकता। वह अपनी समझ के अनुसार अपने ऊपर जितनी अधिक-से-अधिक दया समझता है,वह भी नितान्त अल्प ही होती है। मनुष्य ईश्वर की दया का यथार्थ कल्पना भी नहीं कर सकता।
बैल किसान की बात मानता है। घोड़ा घुड़सवार की बात मानता है। कुत्ता या गधा भी अपने मालिक की बात मानता है। परंतु जो मनुष्य किन्हीं ब्रह्मवेत्ता को अपने सदगुरु के रूप में तो मानता है लेकिन उनकी बात नहीं मानता वह तो इन प्राणियों से भी गया-बीता है।
एकता जब आती हे , जब सब अपनी अपनी अकड छोड कर झुकना जान जाएं , नहीं तो विघटन रहता हे ! घमंड भरी आंखें, गलत गवही देने वाली जीभ , दुख देने वाले हाथ ,गलत रासते पर चलने वाले पैर भगवान को पसंद नहीं हें !
कभी भी अपना समय बेकार की मेगजीन पढ्ने में, बेकार की टीवी सीरीयल देखने में, बेकार की बातों में न गँवाया जायें। समय मिल गया तो माला से या मन से जप शुरु कर दिया जाय। जप हो गया तो सत्संग की कोई पुस्तक पढी जाय। वो भी पढ ली तो शान्त बैठे और श्वास बाहर-भीतर जाये उस पर जप किया जाये,
अगर हम शरीर की ममता सर्वथा छोड़ दें तो शरीर प्राय: बीमार नहीं होगा।मन की ममता छोड़ दें तो मन में बुराई नहीं रहेगी।बुद्धि की ममता छोड़ दें तो बुद्धि में बुराई नहीं रहेगी।ऐसे ही मैं-पन के साथ जो ममता(अपनापन) है,उसका त्याग कर दें तो कोई बुराई नहीं रहेगी।
नाम से मुझे बहुत लाभ हुआ। कई बार मुझे गिरने से बचाया, लोभ से बचाया। अनुभव तो क्या बतायें। जप करके अनुभव कर लें। नाम से सब कामनाओं की सिद्धि हो सकती है। भगवन्नाम और कृपा -- ये दो चीज जैसी परमार्थ में सहायक होती हैं और मेरे हुई हैं वैसी दूसरी नहीं। नाम सब कुछ करने में समर्थ है।
प्रश्न-संसारका सुख लेना कैसे मिटे?.....आप अपना पूरा बल लगायें।फिर भी न मिटे तो ’हे नाथ! हे नाथ!’ कहकर भगवान् को पुकारें।एक तो सांसारिक सुखासक्ति को मिटानेकी चाहना नहीं है और एक हम उसको मिटाते नहीं हैं ये दो बाधाएँ है।ये दोनों बाधाएँ हट जायँ,फिर भी सुखासक्ति न मिटे तो उस समय आप स्वत: परमात्मा को पुका...र उठोगे। सज्जनों उस प्रभुके आगे रो पड़ो तो सब काम हो जायेगा।

Guru Giyan

sadguru tumhare gyan ne jina sikha diya,
hamko tumhare pyar ne insa banadiya.

rahte hai jalve aapke nazro mai hargadhi,
masti ka jam aapne aisa piladiya.

sadguru tumhare gyan ne jina sikha diya,
hamko tumhare pyar ne insa banadiya.

bhula huvatha rasta bhatka huvatha mai,
rehma teri ne mujko kabil bana diya.

sadguru tumhare gyan ne jina sikha diya,
hamko tumhare pyar ne insa banadiya

jisne kiseko aajtak sajda nahi kiya,
vo sarbhi maine aapke dar pe jukadiya

jisdin se mujko aapne apna banaliya
dono jaha ko das ne sab se bhula diya

sadguru tumhare gyan ne jina sikha diya
hamko tumhare pyar ne insa banadiya

Thursday, April 1, 2010

Jaise sadhana me age badhoge to kabhi vyarth ki ninda hogi us se bhaybhit na hue to bemap prashansha milegi usme bhi ab uljhe to parmatma Sakshaktar ho jayega
संसार में हर वस्तु का मूल्य चुकाना होता हे ! बिना ताप किये कष्ट सहे आप अधिकार, पद, प्रतिष्ठा, सत्ता, सम्पति, शक्ति प्राप्त नहीं कर सकते, अत: आपको तपस्वी होना चाहिए आलसी, आराम पसंद नहीं! जीवन के समस्त सुख आपके कठोर पर्रिश्रम के नीचे दबे पड़े हैं, इसे हमेशा याद रखिए!
श्रीकृष्ण बँसी ऐसी बजाते कि जो दूध के लिए विरह में छटपटाने वाले बछड़े माँ आने पर दूध पीने लगते वे श्रीकृष्ण की बँसी सुनकर दूध पीना भूल जाते और बँसी का सुख पाकर तन्मय हो जाते। श्रीकृष्ण अपनी बँसी में अपने ऐसे प्राण फूँकते, प्रेम फूँकते कि सुनने वालों के चित्त चुरा लेते।
'नाम के समान न ज्ञान है, न व्रत है, न ध्यान है, न फल है, न दान है, न शम है, न पुण्य है और न कोई आश्रय है। नाम ही परम मुक्ति है, नाम ही परम गति है, नाम ही परम शांति है, नाम ही परम निष्ठा है, नाम ही परम भक्ति है, नाम ही परम बुद्धि है, नाम ही परम प्रीति है, नाम ही परम स्मृति है।'
भगवन्नाम की बड़ी भारी महिमा है।बार-बार भगवन्नाम-जप करने से एक प्रकार का भगवदीय रस, भगवदीय आनंद और भगवदीय अमृत प्रकट होने लगता है। जप से उत्पन्न भगवदीय आभा आपके पाँचों शरीरों (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय) को तो शुद्ध रखती ही है, साथ ही आपकी अंतरात्मा को भी तृप्त करती है।

आसक्ति मिटाने के ७ उपाय

दिसम्बर २००८ पूनम दर्शन दिल्ली में आयोजित पूनम दर्शन सत्संग में स्वामी सुरेशानन्द जी ने आसक्ति मिटाने के ७ उपाय बताये जो कि इस प्रकार है

आसक्ति मिटाने के ७ सरल उपाय हैं

१- दृढ निश्चय कर लिया जाये कि जो गुरुजी कहेंगे वो मुझे करना ही है बस।

२- वासना पूर्ति के मार्ग में चलने वालों का हम संग नही करेंगे। चाहे कोई भी क्युं न हो, वासना पूर्ति के मार्ग में जो जा रहे है उनकी दोस्ती नही करेंगे ।

3- कभी भी हम लोग ऐसा विचार नही करेंगे कि वासना पूर्ति करने वाले लोग सुखी है। बडे बंगले में रहते है , बडी कार में घूमते हैं, खाक सुखी है सुखी वो है भगवान कृष्ण ने गीता में बताया हैं काम के वेग को और क्रोध के वेग को सहन करते की शक्ति रखता है दम रखता है भगवान कहता है कि बो मेरे मत में सुखी है, "सहयोगी सहसुखी नरः" आप गीता में पढिये ५वे अध्याय में, भगवान नें यह नही कहा है कि काम विकार नही आयेगा क्रोध विकार आयेगा ही नही, लोभ कभी आयेगा ही नही, भगवान ने कहा कि काम का वेग क्रोध का वेग, इस वेग में जो बह नही जाता उसको सहन करने का दम अपने पास रखता है, भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि वो मेरे मत में सुखी है और मेरे मत में वो योगी है।

४- अपने भोजन में पवित्रता सदैव रखी जाये। लहसुन प्याज निश्चित ही तमो गुण बढाने वाली चीजें है परन्तु कोई बुजुर्ग है किसी को शारीरिक कोई तकलीफ़ है, खाँसी की तकलीफ़ है या श्वास की बिमारी है वो अगर आदमी थोडा लहसुन, प्याज खा ले तो उसको कोई पाप नही लगेगा, घुटने का दर्द रहता है किसी को, वात प्रकोप रहता है न वायु का तो शरीर में दर्द रहता है घुटनों में कमर में तो किसी को ऐसा दर्द हो घुटनों आदि में तो वह औषधवश लहसुन खा सकता है, अंगेजी दवाई खाये इससे तो अच्छा है की वो थोडी सी हरी लहसुन खा ले, इसका मतलब से नही कि जो जवान है वो लोग सोचे कि हम भी लहसुन प्याज खाये हा शारीरिक तकलीफ़ है तो ठीक है। लोग बडे कमाल के है शरीर का नाश हो ऐसी चीज नही खाते है लेकिन बुद्धि नाश हो जाये ऐसी चीज पैसे देकर खाते हैं। इसलिये भगवत गीता के ६ठे अध्याय से १७वे श्लोक में और १७वें अध्याय से ८वे, ९वे, और १०वे श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने आहार सम्बन्धी बहुत बढिया बातें बताई है।

५- अपने जीवन में स्थान की पवित्रता रखी जाये, ऐसी जगह में न जाये जहाँ जाने से रजोगुण बढे और तमो गुण बढे। ऐसी जगह जाने में आग्रह रखें जहाँ जाने से सत्व गुण बढें, भक्ति बढें, भगवान के नाम में रुचि बढें।

६- कभी भी अपना समय बेकार की मेगजीन पढ्ने में, बेकार की टीवी सीरीयल देखने में, बेकार की बातों में न गँवाया जायें। समय मिल गया तो माला से या मन से जप शुरु कर दिया जाय। जप हो गया तो सत्संग की कोई पुस्तक पढी जाय। वो भी पढ ली तो शान्त बैठे और श्वास बाहर-भीतर जाये उस पर जप किया जाये,

७- भगवान कपिल बताते है माता देवहूति को कि माँ आसक्ति निश्चित रूप से दुखः देने वाली है परन्तु वही आसक्ति अगर भगवान और भगवत्प्राप्त गुरु में होती है तो वो तारने वाली होती हैं।
प्रभात के समय साधकों को जो प्रेरणा होती है, वह शुभ होती है। तुम जब कभी व्यावहारिक परेशानियों में उलझ जाओ तो विक्षिप्त चित्त से कोई निर्णय मत लो। प्रातः काल जल्दी उठो। स्नानादि के पश्चात् पवित्र स्थान पर पूर्वाभिमुख होकर बैठो। फिर भगवान या गुरुदेव से, जिनमें आपकी श्रद्धा हो, निष्कपट भाव से प्रार्थना करोः 'प्रभु ! मुझे सन्मार्ग दिखाओ। मुझे सद्प्रेरणा दो। मेरी बुद्धि तो निर्णय लेने में असमर्थ है।'

Wednesday, March 31, 2010

निर्भर भक्ति में कुछ नहीं करना पड़ता।बस,केवल निर्भरता को अपने जीवन में उतारना पड़ता है।इस भक्ति में हमारे सामने आदर्श है शिशु।छोटा बच्चा माँ की मार से बचने के लिये भी माँ की ही गोद में घुसता है।जो इस प्रकार निर्भर है भगवान् पर,वही वास्तविक निर्भर है।
अहंकार तथा अपने स्वार्थ का त्याग करके दूसरेका हित कैसे हो?दूसरे का कल्याण कैसे हो?दूसरे को सुख कैसे मिले? अपने तनसे,मनसे,वचनसे,बुद्धिसे,पदसे किसी तरह ही दूसरों को सुख कैसे हो? ऐसा भाव रहेगा तो आप ऐसे निर्मल हो जायँगे कि आपके दर्शनों में भी दूसरे लोग निर्मल हो जायँगे।
एक भाई ने मुझसे कहा कि आप मुझे परम आस्तिक क्यों कहते हैं? मैं तो परम आस्तिक नहीं हूँ।मैंने कहा-मैं इसीलिये कहता हूँ कि आप आस्तिक हो जायेंगे।यह कोई कल्पना नहीं है,यह वास्तविकता है।जिसको आप जैसा समझेंगे,जैसा सोचेंगे,जैसा मानेंगे,वैसा वह हो जायेगा।हम किसी को बुरा न समझें।तब किसी के बुरे होने में हमारा हाथ नहीं रहेगा।
गुणों का वर्णन तो करना चाहिये,किंतु किसी के दोष का वर्णन नहीं करना चाहिये।हम किसी के गुणॊं का वर्णन करें तो उसका हमारे में प्रेम बढ़ेगा,हमारा उसके साथ प्रेम बढ़ेगा किंतु गुणों का वर्णन सच्चा करना चहिये झूठा नहीं।झूठे गुणगान से कोई असर और लाभ नहीं होता

Tuesday, March 30, 2010

विश्वास करो,तुमपर भगवान् की बड़ी कृपा है;तभी तो तुम्हें मनुष्य का देह मिला है।यह और भी विशेष कृपा समझो जो तुम्हें भजन करने की बुद्धि प्राप्त हुई और भजन के लिये सुअवसर मिला।इस सुअवसर को हाथ से मत जाने दो,नहीं तो पछ्तावोगे।
अपने को सत्यवादी मान लेने पर ही सत्य बोलने की प्रवृति होती है और सत्य बोलने की प्रवृति से "मैं सत्यवादी हूँ"-इस भाव की दृढ़ता हो जाती है।
जो पमेश्वर महापामर दीन-दुखी अनाथको याचना करने पर उसके दुर्गुण और दुराचारों की ओर खयाल न करके बच्चे को माता की भाँति गले लगा लेता है,ऎसे उस परम दयालु सच्चे हितैषी परम पुरुष की इस दया के तत्व को जाननेवाला पुरुष उसकी प्राप्ति से वंचित कैसे रह सकता है?
गुरुदेव सक्सात शिव रूप है पल-दो पल भी यदि कोई उनके सन्मुख हो जाये तो उन्केउपर ऐसी ध्रस्ती करते की उसे यही प्रतीत होता है की यही पल मेरे जीवन का सबसे कीमती पल है गुरुदेव को देख कर भ्रम्ह दर्शन की प्यास मिट जाती है उनको देखते हे सहज रूप में ऐसा प्रतीत होता है जैसे ढ्रपर, त्राता अथवा सतयुग के किसी रूषी को हम देख रहे हैं

Monday, March 29, 2010

जिस बालक को माँ ने अपना माना है,वह छोरा दौड़कर गोद में चढ़ जाय तो माँ हँसेगी और जानकर ऊँ-ऊँ-ऊँ करके रोता है तो माँ हँसती है कि देखो ठगाई करता है मेरे से।छोरे की वह कौन-सी क्रिया है,जिससे माँ को प्रसन्नता नहीं होती है।ऐसे ही हम भगवान् के बनकर जो भी करें,हमारी हर क्रिया भगवान् का भजन हो जायेगी।कुछ भी काम करो भगवान् खुश होते रहते हैं।यह मेरा बालक खेल रहा है।कैसी मस्ती है!(
प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी के शरणापन्न रहता है। अन्तर केवल इतना है कि आस्तिक एक के और नास्तिक अनेक के। आस्तिक आवश्यक्ता की पूर्ति करता है और नास्तिक इच्छाओं की। आवश्यक्ता एक और इच्छाएँ अनेक होती है। आवश्यक्ता की पूर्ति होने पर पुनः उत्पत्ति नहीं होती। इच्छाकर्ता तो बेचारा प्रवृत्ति द्वारा केवल शक्तिहीनता ही प्राप्त करता है
भले होने का सहज,सुगम,सुलभ उपाय क्या है?वह यह है कि हम अपनी वर्तमान निर्दोषता में अविचल आस्था करें।यह ऐसा दार्शनिक उपाय है,वैज्ञानिक उपाय है,अनुभव-सिद्ध उपाय है कि हम वैसे ही भले हो जाते हैं,जैसे कि बुराई की उत्पति से पूर्व थे।
मितभाषी बनना अथार्त् गम्भीरता के साथ विचारकर यथासाध्य बहुत कम बोलना चाहिये,क्योंकि अधिक शब्दों का प्रयोग करने से विशेष विचार के लिये समय न मिलने के कारण भूल से असत्य शब्दका प्रयोग हो सकता है।
भक्त प्रारम्भसे ही भग्वत्कृपा की डोरी से बँधे हुए चलते हैं।अतएव जहाँ पैर फिसला कि भगवान् ने डोरी खैंची।इससे भक्त कभी गिरते नहीं।
विवाद छोड़कर विचार करो। प्रमाद छोड़कर भजन करो। याद रक्खो - भगवान्का भजन ऐसा कुशल पथप्रदर्शक है जो तुम्हें सदा यथार्थ मार्ग दिखलाता रहेगा। तुम कभी मार्ग भूल नहीं सकोगे।
यदि तुम किसी भय से पीड़ित हो तो आर्तभाव से भगवान् को पुकारो, उनसे रक्षा के लिये प्रार्थना करो। वे तुम्हारी प्रार्थना को अवश्य सुनेंगे और तुम्हें भयसे मुक्त कर देंगे। हे नाथ - हे मेरे नाथ!
यदि तुम अपने लक्ष्य को - भगवान् को कभी न भूलते हुए सदा निर्लेप तथा सावधान रहकर भगवान् की ओर चलते रहोगे तो यह मानव-शरीर तुम्हें निश्चय ही वहाँ पहुँचाने में समर्थ होगा।

झूठे झगड़ेको छोड़कर साधनमें लग जाओ-जी-जानसे लग जाओ। मनुष्य-जीवन बहुत थोड़े दिनों का है, देर न करो। याद रक्खो-देर में कहीं मानव जीवनका अवसान हो गया तो पीछे बहुत पछताना पड़ेगा।

भक्ति से मेरे यथार्थ स्वरूप को तत्त्व से तुम जान सकोगे औरे उसे जानते ही तुम उसी क्षण मुझमें प्रवेश कर जाओगे। मैं और तुम दोनों एक ही हो जायँगे।

यदि तुम्हें जीवन के चरम तथा परम लक्ष्य श्रीभगवान् के धाम पहुँचना है, भगवान् को प्राप्त करना है तो इस बात को कभी न भूल कर सावधानी तथा शीघ्रता के साथ आगे बढ़ते जाओ।
वृक्ष के समान सहनशील हों।पत्थर मारनेवाले को फल दें,काटकर जला देनेवालेकी रोटी पका दें।चीरकर काट देनेवालेका दरवाजा,चौखट,छ्त बन जायँ।बिना किसी भेदके सबको छाया दें,जात-पात का भेद कुछ न मानें।
भयंकर से भयंकर परिस्थिति आ जाय,तब भी कह दो-"आओ मेरे प्यारे!आओ,आओ,आओ।तुम कोई और नहीं हो।मैं तुम्हें जानता हूँ।तुमने मेरे लिये आवश्यक समझा होगा कि मैं दु:ख के वेश में आऊँ,इसलिये तुम दु:ख के वेश में आये हो।स्वागतम्!वैलकम्! आओ आओ चले आओ!" आप देखेंगे कि वह प्रतिकूलता आपके लिये इतनी उपयोगी सिद्ध होगी कि जिस पर अनेकों अनुकूलतायें निछावर की जा सकती है।

Sunday, March 28, 2010

Hai Prabhu

mara prabhu mane sachi disha batacjo ,sachu margdharshan dejo , he sukh sawarup , shaniti shawarup maray haiya ma sukh rupe , shanti rupe saday vasjso , he karuna nidan , he krishna kaniya , bansi bajaiya , madur lala , mara vahaluda mara riday ma saday nivas karjo , mari kadji lejo , mane eklo , atulo kadapi na mukjo mara nath , hu tamari sharane , tara vina na koi maro nath , bas taro j ek sath mane mara pritam , mara dev , mara hridaya na nath Om narayan narayan narayan

he shanti data , giyan devta ,mara ishtadevta , kay cho tame , mara dil ma cho kem chupaya cho aji sudhi , mane man mandir na dharshan karavo mara nath , mane potana ma dubado mara nath

Atlu madi jay to sukhi thavu , aa kurshi suchi phohich javu to sukhi tavu , kya suthi aa badhu karta rahishu nath , kaya sudhi sansar na janam maran na chakro ma padta rahishu , kya suthi ame sansari vato ma atvata rahishu , bas have to evo di dekhad ke tara ma dubhi jayai , bas kya sudhi duniyavi maja pachad ame dodta rahishu , kem ishavariyi maja ma man nathi dubtu , cigarete , pana , masala and kahava piva ma maja shodhiye chiye kem diyan ma maja nathi avati, kem simran and satsang ma maja nathi aavati bas he gurudev , he nath ave to asli maja dekhadi to duniyavi mana bhuli jayeaye

Pram bharelu haiyu lai ne tare dware aaveyo chu jo tu mujne tarchode to duneya ma mare javu kya? na janu hu pooj tari na janu bhakti ne rit, gandi ghale vane ma hu gato guruji tara geet chacker banine charne tara rahva ne hu aaveyo chu jo tu mujne tarchode to duneya ma mare javu kya?

he mara nath , me mara valuda , janmo thi batki rahaya chiye , taro abhar che mara nath te amne manushaya jo jiwan apyo , have bas aa janam ma aame tane medvi laveye , tara ma dubhi ne tara charano me priti karine tane pami laviye , bas mara prabhu dar rose tane yaad kariye , sansar na sambhado ne kya sudhi sachivishu , bas tara sathe sambhand pako thai jaye to sansar na sambado to dodta pachad aavshe , savare uthu to tari yad aave , divas bar tane yad karta nikade and ratre suvu to bas tara khoda ma suvu , eve daya kara mara prabhu mara nath bas tara sivay kashu yad na rahe mari ankho bas tara didar kare , mari sans bas tara mate chale , mari hriday ma bas tari yad rahe , maru sharir bas tari seva ma ja jaye , jaldi mara nath mane evo di dekhad mara vahaluda
Guru saman nahi koi Hitkari , Guru sam nahi koi dayalu , Guru hi brahma , Guru hi Vishnu , Guru hi Devo Ke dev , Guru Hi Mata , Guru hi Pita , Guru hi samare sab kuch , Guru hi par utaranahar , Guru seva se badkar nahi koi seva , Guru Simran se nahi badkar koi simaran , Guru Puja se badkar nahi koi puja , Sadhak ka yah bhav hi Uski Mukati ka Marg hai ,
Holy ke rang Gurudev ke sang, Saneh , Pyar aur Samarpan ke rango se jiwan mahekta rahe , Guru Giyan aur Guru seva se jiwan anandit rahe , Guru kripa aur Guru prem se Man rang jaye , Shardha aur Vishavash ke rang jiwan ko maheka de aur Gurudev ke bataye huwe raste chalkar apni jiwan bagiya ko rango se bhar de yahi prathna Hari om
Holy ke rang Gurudev ke sang, Saneh , Pyar aur Samarpan ke rango se jiwan mahekta rahe , Guru Giyan aur Guru seva se jiwan anandit rahe , Guru kripa aur Guru prem se Man rang jaye , Shardha aur Vishavash ke rang jiwan ko maheka de aur Gurudev ke bataye huwe raste chalkar apni jiwan bagiya ko rango se bhar de yahi prathna Hari om
Bapu mene aapko apna Nasib Samja hai , Apne se bahot karib samaja hai , Bapu mene tumhe pakar sari duniya ko garib samja hai Tera hi dawara , tera sahara , teri hi arzu , teri hi zutsju , to bhin nahi aur koi sahara Bapu , rang jaye hamara sara jiwan tere rango me bapu
प्रेम अथार्त भगवान्।प्रेम का अर्थ है भगवान् का सुख,प्रेम का अर्थ है सम्पूर्ण समर्पण- यह जहाँ लहरा है वहाँ प्रेम के नाम पर प्रेम का चोंगा पहनकर भगवान् आते हैं।और जहाँ यह नहीं है वहाँ प्रेम का नाम रखकर डकैत आते हैं-काम,क्रोधदि।
जो प्रेमी भक्त भगवान् को छोटी-सी-छोटी आज्ञा का पालन करने के लिये अपने सर्वस्व को निछावर करने को तैयार रहते हैं, भगवान् उनके ऋणी हो जाते हैं।
अगर आपको इसमें सन्तोष है कि हमारी बुराई सारा संसार जान ले तो मैं भरी सभा में कहता हूँ कि आप लोग जितना मुझको बुरा समझते हैं उससे मैं अधिक बुरा हूँ और जितना आप लोग अच्छा समझते हैं,उससे मैं कम अच्छा हूँ। अब देखिये,इसमें मेरा क्या बिगड़ गया? बताओ जरा! क्या मैं उस जीवन को पसन्द करुँगा,जो आपकी उदारता पर टिका हो? नहीं-नहीं कोई विचारशील मानव उस जीवन को पसन्द नहीं करेगा।
लोगों में हमारे अवगुण प्रकट नहीं होते, तभी हमारा काम चलता है। हमारे मन में जो बुरी बातें आती हैं,उनको अगर लोग जान लें तो एक दिन में कितनी बार मार पड़े! परन्तु लोगों को उनका पता नहीं लगता! भगवान् तो सब जानते हैं,पर जानते हुए भी हमारा त्याग नहीं करते,प्रत्युत आँख मीच लेते हैं कि बालक है,कोई बात नहीं! इस कारण हमारा काम चलता है,नहीं तो बड़ी मुश्किल हो जाय!
जीवन में आप जो कुछ करते हो उसका प्रभाव आपके अंतःकरण पर पड़ता है। कोई भी कर्म करते समय उसके प्रभाव को, अपने जीवन पर होने वाले उसके परिणाम को सूक्ष्मता से निहारना चाहिए । ऐसी सावधानी से हम अपने मन की कुचाल को नियंत्रित कर सकेंगे, इन्द्रियों के स्वछन्द आवेगों को निरुद्ध कर सकेंगे, बुद्धि को सत्यस्वरूप आत्मा-परमात्मा में प्रतिष्ठित कर सकेंगे ।

Saturday, March 27, 2010

आर्त भाव से भगवान को प्रार्थना करे…


हे दिन बंधो ! …मेरे जो कर्म दिव्य बने है तो आप की कृपा है; लेकिन नीच कर्मो से बचाने की आप ही कृपा करो.. हे दिव्य प्रभु, नित्य देव तुम ही मेरे अंतरात्मा, अन्तर्यामी हो.. समर्थ हो.. दयालु हो..मुझ पर कृपा करे….’ ऐसे भगवान को पुकारते पुकारते श्वासों-श्वास में भगवन नाम की गिनती करे…तो आप के कर्म दिव्य होने लगेंगे …. मन की दुष्टता, बुध्दी का रागद्वेष, कर्म का बंधन मिटाकर परमात्मा का रस पाने में साधक सफल होने लगता है…..
सत्संग के द्वारा ये समझ बढाए की शरीर की बिमारी मुझ में नहीं है, शरीर में बिमारी है, ये जानेगा..मुझ में बिमारी ऐसा मानेगा तो बिमारी तुम को ओर दबोचेगी… दुःख मुझ में नहीं, मन में दुःख आया.. टेंशन है तो मन में है, तनाव है तो मन में है; मुझ में नहीं….ऐसा जो जानता उस का जन्म और कर्म दिव्य होते..जो सामान्य मनुष्य जगत को सच्चा मानता तो उस की आत्मा की दिव्यता के ऊपर अ-ज्ञान का पर्दा पडा है…

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय..ना हम वसामि वैकुंठे योगिनाम ह्रुदएंवयी

मद भक्ता यत्र गायंत्री तत प्रतिष्ठामी नारदा

किसी का बुरा ना करो..किसी का बुरा ना सोचो… जनमने मरने के बाद भी मैं रहेता हूँ ऐसा सोचो .. आप के कर्म में अ-शुध्दी ना हो…आप के भाव में अ-शुध्दी नहीं हो.. आप की बुध्दी में ब्रम्हज्ञानी का ज्ञान हो… आप का जन्म दिव्य हो जाएगा….भगवान बोलते मैं ऐसे योगियों के ह्रदय में जरुर मिलता हूँ जिन के ह्रदय में दिव्यता मधुरता और प्रसन्नता होती…वहा मेरी पूर्ण पूजा होती है..

हरी सम जग कछु वस्तु नहीं प्रेम सम पंथ सदगुरू सम सज्जन नहीं गीता सम नहीं ग्रन्थ ll

एक घडी आधी घडी आधी में पुनि आध तुलसी संगत साधू की हरे कोटि अपराध ll

४० दिन तक रोज १० मिनट भगवान को एक टक देखे तो ४ चंचलता दूर हो जायेगी(वाणी की, हाथो की, नेत्रों की और पैरो की चंचलता दूर होगी) …हरी….. ओम्म्म्म्म्म्म्म् इस प्रकार भगवान के नाम का लंबा उच्चारण करे तो ज्ञान तंतु पुष्ट होंगे भगवत सत्ता का संचार आप के ७२ करोड़ ७२ लाख १० हजार २०१ नाड़ियों में होगा..

किसी के घर में मृत्यु हुयी तो उन्हें मंगलमय जीवन मृत्यु ये पुस्तक पढ़ाना.. मृतक की याद में रोते तो आँख-नाक से जो गन्दगी निकलती वो उन को पिलाया जाता जो मृतको के लिए रोते है..

ऐसा शास्त्रों में लिखा है..diव्य प्रेरणा प्रकाश और जीवन विकास ये पुस्तके जरुर पढ़े..

हरी ओम्म्म्म्म्म्म्ॐ

तम नमामि हरिम परमॐ
तम नमामि हरिम परमॐ
तम नमामि हरिम परम
काम करते समय यह भाव रखना चाहिये कि यह काम भगवान् का है और उन्हीं के आज्ञानुसार मैं इसे सिर्फ़ उन्हीं की प्रसन्नता के लिये कर रहा हूँ।प्रभु मेरे पास खड़े हुए मेरे काम को देख रहे हैं-ऎसा समझकर सदा प्रसन्न रहना चाहिये।
जो किसी को बुरा समझता है,वह उससे ज्यादा बुरा है,जो बुरा करता है।बुराई करने वाले के जीवन में कभी भी सजगता आ सकती है और वह पश्चाताप करके बुराई को छोड़ सकता है;किन्तु जो दूसरे को बुरा समझता है,उसके जीवन में तो मिथ्या अभिमान की ही उत्पति और पुस्टि होती रहती है।
यह बात तो मानना ही चाहिये कि भगवान् ग्रहण करके छोड़ते नहीं,पर यदि भजन में,सेवा में शिथिलता रहती है तो भगवान् से यह प्राथना अवश्य करनी चाहिये कि प्रभो! ये हमारे दिन जो कटते हैं,वे आपकी विस्मृति में ही कट जाते हैं,आपका निरन्तर स्मरण नहीं होता और न स्मरण न होने क दु:ख ही होता है। भगवन् हमारी यह दैन्यपूर्ण स्थिति दूर हो जाय।

Friday, March 26, 2010

sanso me tumhara nam rahe , mere man me prem ki jyot jale , vinti sada karte hi rahe , gurudev tumhare charano me , es sar par tumhara hath rahe , Jiwan Bhar tera sath rahe , Yah shardha hamari badti rahe Gurudev tumhare charano me , tere sumrin me ham magan rahe tere nam ki hame lagan rahe , yah shish sada zukata hi rahe Gurudev tumhare charno me
Hamare dil me base Gurudev , hamari pyar ki murat tum ho , tume milke ko dil bechen hota , tume dekhe to chain padta , to bina na koi aur sahara , bas he dinanath , he prabhu me moula , mere auliya bas apni kripa me banaye rakhana , apni nigaho se kabhi dur mat karna , apne karuna se kabhi dur mat karna
kuch nahi hai jiwan tumhare bina , tumhara sath Guruvar kabhi na chute ,banda jo prem ka rishta kabhi bhi hamse tute na mere Gurudev , bas tera hi sahara hai Gurudeva Karunay bhav se ki huwe prathna jarur kabhul hoti hai , jab bhi dukh sataye ,pareshani aaye bas Gurudev ko araj karo sache dil se,agar phislu me to tumhi bachana bhakti ki jyot dil me jagana tere rang me rang jaye jiwan yah Mere moula mere GurudevaSee More
जरा जरा-सी बात में डर रहे हैं? जरा जरा-सी बात में सिकुड़ रहे हैं? हो होकर क्या होगा? जो भी हो गया वह देख लिया। जो हो रहा है वह देख रहे हैं। जो होगा वह भी देखा जायेगा। मूँछ पर ताव देते हुए.... भगवान को प्यार करते हुए तुम आगे बढ़ते जाओ। निर्भय..... निर्भय.... निर्भय.... निर्भय..... निर्भय.....।
सांसारिक जीवन मे व्यस्त रहकर भी अगर कही से संतो की कथाएँ कानो तक पहुंच जाए तो उनकी प्रकृति ऐसी है की सुनने वाले को बिना किसी प्रकार का श्रम किए लाभ ही लाभ होता है
इन प्राणी, पदार्थ, परिस्थितियों की आस्था, आशा, आकांक्षा छोड़कर प्रभु की ओर देखो। फिर सारी प्रभु-इच्छित अनुकूलता अपने-आप ही आकर तुम्हारे चरण चूमेगी।
अगर तुम दुसरों के लिये बोलते हो, दुसरों के लिये सुनते हो, दुसरों के लिये सोचते हो, दूसरों के लिये काम करते हो, तो तुम्हारी भौतिक उन्नति होती चली जायगी। कोई बाधा नहीं डाल सकता। अगर तुम केवल अपने लिये सोचते हो तो दरिद्रता कभी नहीं जायगी
" जो हमारे बहुत करीब है उसे हम छू नही सकते शायद इसे 'मजबूरी' कहते है, जो हमे चाहता है उसे हम पा नही सकते शायद उसे 'नसीब' कहते है........!" इसी 'मजबूरी' और 'नसीब' के बीच एक रिश्ता पनपता है शायद इसे "मोहब्बत" कहते है.......
अगर मन इन्द्रियों के साथ चलेगा तो समझो परमात्मा रूठे है ..तो निचे जाएगा… मन को ऊपर उठाना है तो सत्संग किया, नियम का आदर है तो उंचा उठेगा..मन बुध्दी के अनुसार चलेगा.. अगर बुध्दी ज्ञान स्वरुप है तो सही निर्णय देगी…जिस के प्रिय भगवान नहीं, जिस के लिए भगवत प्राप्ति मुख्य नही, उस का संग ऐसे ठुकराओ जैसे करोडो वैरी सामने बैठे है यद्यपि वो परम स्नेही हो..