Tuesday, October 2, 2012

प्रo : वैराग्य कितने प्रकार का होता है ?
उo : सामान्यतया गुण- भेद से वैराग्य तीन प्रकार के हैं ।
1) जो वैराग्य संसार से ग्लानि और भगवान से प्रेम होने पर होता है, वह सात्त्विक है ।
2) जो प्रसिद्धि या प्रतिष्ठा की दृष्टि से विरक्त होता है, वह राजस है ।
3) जो सबको नीची दृष्टि से देखता है तथा अपनेको बड़ा समझता है वह तामस वैराग्य है ।

Q. What are the types of vairagya?

A. Ordi

narily vairagya is of three types, according to the qualities of nature:
1. The vairagya arising out of aversion to the world and love for the lord is sattvic.
2. The vairagya in search of fame and prestige is rajasic.
3. If one looks down on others, and takes pride in one’s vairagya, the vairagya is tamasic.


--Ishwar Ki Aur
प्रo : त्याग, वैराग्य और उपरति में क्या भेद है?
उo : विषय को सामने न आने देना त्याग है । विषय सामने रहते हुए उसमें प्रेम न होना वैराग्य है। वस्तु सामने रहते हुए भी उसमें न तो भोगबुद्धि हो और न द्वेष हो यह उपरति है ।

Q. What is the difference between tyaga, vairagya and uparati?

A. Avoiding contact with sense objects is tyaga. Not even being attracted towards the object, even when it is before one’s eyes, is vairagya. If the object is before one’s eyes, but still there is neither a desire to enjoy nor any aversion thereto, it is uparati.

--Ishwar Ki Aur
अग्नि में राग द्वेष नहीं है । उसके पास जो जाता है उसकी ठंड दूर होती है, अन्य की नहीं । इसी प्रकार जो ईश्वर के शरण जाता है उसका बन्धन कटता है, अन्य का नहीं। जिसके चित्त में राग द्वेष है, उसमें ईश्वर की विशेषता अभिव्यक्त नहीं होती ।

Fire is free from attachment and hatred. One, who goes near it, gets its warmth, others don’t. If the mind is afflicted with attachment and hatred, God does not manifest Himself therein.

--Ishwar Ki Aur
संसार की सब चीजें बदल रहीं हैं, भूतकाल की ओर भाग रहीं है और आप उन्हें वर्त्तमान में टिकाये रखना चाहते हैं? यही जीवन के दु:खों की मूल ग्रंथि है । आप चेतन होने पर भी जड़ वस्तु को छोड़ने से इन्कार करते हैं? दृष्टा होने पर भी दृश्य में उलझे हुए हैं?

All things of the world are changing, are running towards the past; and you want; and you want to keep them ever present. This is the root cause of all your troubles. Even in spite of yourself being sentient, you refuse to let go the non-sentient world. You are actually the beholder, but unfortunately, you consider yourself to be part of the scene.

--Ishwar ki Aur
आत्मा नित्य होने से वह घट की तरह या कीट भ्रमर की तरह उत्पन्न नहीं होता । नदी को सागर प्राप्त होती है ऐसे आत्मा प्राप्त नहीं होती, क्योंकि वह सर्वगत है । दूध में विकार होकर दही बनता है वैसे आत्मा में विकार नहीं होता, क्योंकि वह स्थाणु है । सुवर्ण की शुद्धि की तरह आत्मा कोई संस्कार की अपेक्षा नहीं करता क्योंकि वह अचल है । उत्पत्ति, प्राप्ति, विकृति और संस्कृति ये चारों धर्म कर्म के हैं ।

The Atman

is eternal and as such it does not come into being like an earthen pot or an insect. Atman is not reached, as sea is reached by the rivers, because it is omnipresent. Atman is not produced by transmutation, as curd coagulates from milk, because it is unalterable. Atman does not require any refinement like gold, as it is motionless. Birth, attainment, transmutation and refinement – all belong to realm of ‘Karma’, not to the atman.

--Ishwar ki Aur
वेदान्त शास्त्र यह नहीं कहता कि ‘अपने आपको जानो ।’ अपने आपको सभी जानते हैं । कोई अपने को निर्धन जानकर धनी होने का प्रयत्न करता है, कोई अपनेको रोगी जानकर निरोग होने को इच्छुक है । कोई अपनेको नाटा जानकर लम्बा होने के लिए कसरत करता है तो कोई अपनेको काला जानकर गोरा होने के लिए भिन्न भिन्न नुस्खे आजमाता है । नहीं, वेदान्त यह नहीं कहता । वह तो कहता है : ‘अपने आपको ब्रह्म जानो ।’ जीवन में अनर्थ का मूल सा
मान्य अज्ञान नहीं अपितु अपनी आत्मा के ब्रह्मत्व का अज्ञान है । देह और सांसारिक व्यवहार के ज्ञान अज्ञान से कोई खास लाभ हानि नहीं है परंतु अपने ब्रह्मत्व के अज्ञान से घोर हानि है और उसके ज्ञान से परम लाभ है ।

Vedanta does not say, ‘Know yourself.’ Everyone knows oneself. Someone knows oneself to be poor and tries to be rich. Another one knows oneself to be sick and wants to be healthy. Someone knows oneself to be short and exercises to grow taller. Someone knows oneself to be dark complexioned and tries various remedies to become fair.

No, Vedanta does not say that. Vedanta says: ‘know yourself to be God.’ The root cause of misfortune in life is not general ignorance, but ignorance about the all important fact of one being God oneself. There is not much of gain or loss from the knowledge or ignorance of the body or the worldly affairs; but there is enormous loss from the ignorance of one’s inherent Divinity, and its knowledge is equally rewarding.

--Ishwar Ki Aur
आध्यात्मिक उन्नति हेतुः चलते फिरते, दैनिक कार्य करते हुए भगवन्नाम का जप, सब में भगवन्नाम, हर दो कार्यों के बीच थोड़ा शांत होना, सबकी भलाई में अपना भला मानना, मन के विचारों पर निगरानी रखना, आदरपूर्वक सत्संग व स्वाध्याय करना आदि शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति के उपाय हैं।

For Spiritual Advancement: Mental repetition of the divine name throughout one’s routine activities, beholding God in all, momentary repose in between two consecutive activities, to see one’s own good in the good of others, to keep a watch over one’s thoughts, reverentially taking recourse to satsang and study of the scriptures, etc. are quick means to spiritual advancement.

---Divya Prerna Prakash
मानव आते हुए भी रोता है और जाते हुए भी रोता है । जो वक्त रोने का नहीं तब भी रोता है । केवल एक पूर्ण सद्गुरु में ही ऐसा सामर्थ्य है जो इस जन्म मरण के मूल कारण अज्ञान को काटकर मनुष्य को रोने से बचा सकते हैं। केवल गुरु ही आवागमन के चक्कर से, काल की महान ठोकरों से बचाकर शिष्य को संसार के दु:खों से ऊपर उठा देते हैं। शिष्य के चिल्लाने पर भी वे ध्यान नहीं देते । गुरु के बराबर हितैषी संसार में कोई भी नहीं
हो सकता।

Man is born crying and cries while dying. He cries even at inopportune times. It is only the accomplished Sadguru, who can save man from his troubles by destroying his ignorance, the root cause of the cycle of birth and death, and from severe blows of fate, and thus lifts the disciple beyond the misery of the world. Guru does not even pay heed to the foolish protests of the disciples. There can be no well-wisher so great as the Guru.

--Ishwar Ki Aur
निरीक्षण करो कि किन किन कारणों से उन्नति नहीं हो रही है । उन्हें दूर करो । बार बार उन्हीं दोषों की पुनरावृत्ति करना उचित नहीं। अगर देखभाल नहीं करोगे तो उम्र यूँ ही बीत जायेगी परंतु बननेवाली बात नहीं बनेगी। जितना चलना चाहिए उतना चलना होगा, जितना चल सकते हो उतना नहीं। आशिक नींद में ग्रस्त नहीं होते। व्याकुल ह्रदय से तड़पते हुए प्रतिक्षा करते हैं। सदा जागृत रहते हैं। सदा ही सावधान रहा करते हैं।


Find out the reasons for your slow progress. Eliminate them. It is not desirable to repeat the same mistakes again and again. If you are not vigilant, your life will be whiled away in trivial pursuits and you will never be able to accomplish your goal
You have to make efforts right to the extent required, not to the extent of your capabilities. The aspirants are not afflicted by sleep. They wait restlessly. They are always vigilant, always alert.

--Ishwar ki Aur
आत्म प्राप्ति के राही के लिए महापुरुषों की सेवा अत्यंत कल्याणकारी है। बिना सेवा के ब्रह्मविधा मिलती या फलीभूत नहीं होती । ब्रह्मविधा के ठहराव के लिए शुद्ध अंत करण की आवश्यकता है । सेवा से अंत करण शुद्ध होता है, नम्रता आदि सद्गुण आते हैं। शाखाओं का झुकना फलयुक्त होने का चिह्न है, इसी तरह नम्र तथा शुद्ध अंत करण में ज्ञान का प्रादुर्भाव होता है । यही ब्रह्मविधा की पहचान है।

For an aspirant, on the path of Self-realization, serving the saints is highly beneficial. Without service it is difficult to realize or to bring to fruition the Knowledge of the True Self. A pure antahkarana is an essential requirement for assimilating the knowledge of the True Self. Serving the Saints purifies the antahkarana and inculcates the virtues like politeness, etc. Sagging of the branches is an indication of their being laden with fruits. Similarly, Enlightenment descends on a pure and polite heart. Purity of antahkarana and politeness are indicators of enlightenment.

--Ishwar Ki Aur

Sunday, September 9, 2012

आप जैसा सोचते हो वैसे ही बन जाते हो। अपने-आपको पापी कहो तो अवश्य ही पापी बन जाओगे। अपने को मूर्ख कहो तो अवश्य ही मूर्ख बन जाओगे। अपने को निर्बल कहो तो संसार में कोई ऐसी शक्ति नहीं है जो आपको बलवान बना सके। अपने सर्वशक्तित्व का अनुभव करो तो आप सर्वशक्तिमान हो जाते हो।

As you think, so you become. Call yourself a sinner, and a sinner you become.Call yourself a fool, and you become fool. Call yourself a coward, and no power on earth can make you powerful. Experience your Omnipotent nature and you become Omnipotent.

-- Nirbhay Naad
संसार में जितनी वस्तुएँ प्रत्यक्ष में घबराने वाली मालूम होती हैं, वास्तव में तेरी प्रफुल्लता और आनन्द के लिए ही प्रकृति ने तैयार की हैं। उनसे डरने से क्या लाभ? तेरी ही मूर्खता तुझे चक्कर में डालती है, नहीं तो तुझे कोई नीचा दिखाने वाला है ही नहीं। यह पक्का निश्चय रख कि संसार तेरे ही आत्मदेव का सारा विलास है। संसार का कोई भी पदार्थ तुझे वास्तव में दुःख नहीं दे सकता है।

In the world, anything, which apparently seems to be frightening, is made by Nature for your pleasure and development. Why should you be afraid? Your own folly puzzles you. Otherwise there is nothing to degrade you. Have complete faith that the Universe is a support of your Divine Self alone. Nothing in the universe can give you any trouble.

-- Nirbhay Naad
अपने हृदय से द्वैत की भावना को चुन-चुनकर निकाल डालो। अपने परिच्छिन्न अस्तित्व की दीवारों को नींव से ढहा दो, जिससे आनन्द का महासागर प्रत्यक्ष लहराने लगे।क्या तुम्हें अपने ब्रह्मत्व के विषय में सन्देह है? अपने हृदय में ऐसा सन्देह रखने की अपेक्षा गोली मार लेना श्रेष्ठ है।

Completely remove the sense of duality from your heart. Demolish the walls offinite existence from its base, so that you can directly experience the ocean of Bliss.Do you doubt your being Brahman? Don.t even think like this.

-- Nirbhay Naad
यदि स्वप्न में रूचिकर और चित्ताकर्षक घटनाएँ उपस्थित हैं तो वे तेरे ही विचार हैं और महाभयावने रूप विद्यमान हैं तो वे भी तेरी ही करतूतें हैं। वैसे ही संसार में मनभाती घटनाएँ हो चाहे विपत्तियाँ और आफतें हों,ये सब तेरी ही बनायी हुई हैं। तू दोनों का स्वामी है।

If attractive and interesting happenings take place in the dream state, they are your thoughts, and if horrible scenes appear, they are also your thoughts. Similarly, in the world, whether attractive things appear or miseries and troubles appear, all are of your own making. You are the master of both.

-- Nirbhay Naad
हे प्रिय ! तेरे ही विराट स्वरूप में ये जगतरूपी तरंगे अपने-आप उदय होती हैं और अस्त होती हैं। उसमें न तेरी वृद्धि होती है न नाश, क्योंकि जगतरूपी तरंगें तुझसे भिन्न नहीं हैं। फिर "किसका ग्रहण करूँ.... किससे मोह करूँ.… किससे द्वेष करूँ..." आदि चिन्तन करके क्यों परेशान होता है?

O Dear! Just as by their nature, waves rise and subside in an ocean, the worlds are rise created and dissolved in your universal Being. Thus, neither are you expanded nor destroyed, as the waves of the world are not different from you. Then why do you trouble yourself by thinking, .What should I accept? Who should I love? Who should I hate?.

-- Nirbhay Naad
इस इन्द्रजालवत् मिथ्या संसार में मोह मत कर। हे सौम्य ! तेरा यह जड़ शरीर कल्प के अन्त तक स्थिर रहे चाहे अभी इसी वक्त इसका नाश हो जाय, तुझ चैतन्य को भय कैसा? इस संसाररूपी समुद्र में एक तू ही हुआ है, तू ही है और कृतार्थ भी तू ही होगा। तेरा न बन्धन है और न मोक्ष है, यह निश्चित जानकर तू सुखपूर्वक विचर।

Do not be attached to this world, which is as unreal as the illusion seen in a magic trick. O handso
me one! Why should you? O consciousness, be afraid, whether your insentient body lasts-until the end of the universal destruction or is destroyed, just now, at this very moment? You alone have come into existence. You alone exist, and you alone shall be accomplished, in this ocean of the world. You are not subjected to either bondage or liberation.Know this resolutely, and live happily.

-- Nirbhay Naad
भय मात्र हमारी कल्पना की उपज है। यह सब प्रपंच हमारी स्फुरणा है, कल्पना मात्र है। फिर बताओ, हम किससे भय खायें और किसकी इच्छा करें ? सदा सिंहवत् निर्भय रहो। कभी भी किसी से मत डरो।

All fear is a product of our thoughts. All this illusion is only our thinking and imagination. Then tell us, whom should we be afraid of? And why should we desire anything? Always be fearless like a lion. Never be afraid of anybody.

-- Nirbhay Naad
किसी भी अनुकूलता की आस मत करो। संसारी तुच्छ विषयों की माँग मत करो। विषयों की माँग कोई भी हो, तुम्हें दीन बना देगी। विषयों की दीनतावालों को भगवान नहीं मिलते।

Do not wish for any favorable. Do not demand any petty worldly things of pleasure. Demanding sense-pleasure will make you poor. God does not love slaves of sense-pleasure.

-- Nirbhay Naad
मौत के पूर्व देह की ममता को भी पार करना पड़ेगा, वर्ना कर्मबन्धन और विकार तुम्हारा पीछा न छोड़ेंगे। तुम्हारे भीतर प्रभु के गीत न गूँज पायेंगे, ब्रह्म-साक्षात्कार न हो पायेगा। जब तक तुम हड्डी-मांस-चाम को ही ‘मैं’ मानते रहोगे, तब तक दुर्भाग्य से पीछा न छूटेगा। बड़े-से-बड़ा दुर्भाग्य है जन्म-मृत्यु।

If you are not able to detach yourself from this body before death, bodily passions, and your past dee
d will follow you and bind you into the cycle of birth and death and you will not be able to hear the Divine song springing from your depths of heart, you cannot realize Brahman, the Supreme Being. As long as you continue to identify with the flesh, bones and skin, misery will follow you. The greatest misery and misfortune is this cycle.of birth and death.

-- Nirbhay Naad
सारी शक्ति निर्भयता से प्राप्त होती है, इसलिए बिल्कुल निर्भय हो जाओ। फिर तुम्हारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा।देहाध्यास को छोड़ना साधना का परम शिखर है, जिस पर तुम्हें पहुँचना होगा।

All power and glory springs from this fearlessness, so have tremendous faith in your Self. Then everything that is positive and true will come to you. Then nobody can daunt you from your journey.This highest peak of spiritual practice is to transcend the thought .I am the body.

-- Nirbhay Naad
पारिवारिक मोह और आसक्ति से अपने को दूर रखो। अपने मन में यह दृढ़ संकल्प करके साधनापथ पर आगे बढ़ो कि यह मेरा दुर्लभ शरीर न स्त्री-बच्चों के लिए है, न दुकान-मकान के लिए है और न ही ऐसी अन्य तुच्छ चीजों के संग्रह करने के लिए है। यह दुर्लभ शरीर आत्म ज्ञान प्राप्त करने के लिए है।

Abstain from family attachment and delusion. March on the path of Sadhana with a firm determination in your heart, that thisbody is not meant for my wife, children, the shop or residence or material wealth and other similar pretty things. It is very difficult to obtain human birth. This birth is meant only for the attainment of Self-Knowledge.

-- Nirbhay Naad
प्रतिकूलता से भय मत करो। सदा शांत और निर्भय रहो। भयानक दृश्य (द्वैत) केवल स्वप्नमात्र है, डरो मत।

Do not be afraid of any unfavourable circumstances. Always be peaceful and fearless. This ugly dangerous state of duality is merely a dream and it is temporary. Do not be afraid of it

--Nirbhay Naad
सुख का दृश्य भी आयेगा और जायेगा तो दुःख का दृश्य भी आयेगा और जायेगा। पर्दे को क्या? कई फिल्में और उनके दृश्य आये और चले गये, पर्दा अपनी महिमा में स्थित है। तुम तो छाती ठोककर कहोः ‘अनुकूलता या प्रतिकूलता, सुख या दुःख जिसे आना हो आये और जाय। मुझे क्या...?’ किसी भी दृश्य को सच्चा मत मानो। तुम दृष्टा बनकर देखते रहो, अपनी महिमा में मस्त रहो।

Many scenes of joy and sorrow will come and go on movie scre

ens in the theatres. The screen has nothing to do with these happenings. Many films and scenes will come and go but the screen will remain unaffected. Just like that, declare with boldness, "whether it is favourable or unfavourable, whether it is pain or pleasure, what is it to Me?I am eternal Atman, I am Immortal. I am not this body, nor am I the mind of the senses.

--Nirbhay Naad
दीनता-हीनता पाप है। तुम तो मौत से भी निर्भयतापूर्वक कहोः ‘ऐ मौत ! मेरे शरीर को छीन सकती है, पर मेरा कुछ नहीं कर सकती। तू क्या डरायेगी मुझे? ऐ दुनिया की रंगीनियाँ ! संसार के प्रलोभनो ! तुम मुझे क्या फँसाओगे? तुम्हारी पोल मैंने जान ली है। ऐ दुनिया के रीत-रिवाजो ! सुख-दुःखो ! अब तुम मुझे क्या नचाओगे? अब लाख-लाख काँटों पर भी मैं निर्भयतापूर्वक कदम रखूँगा। हजार-हजार उत्थान और पतन में भी मैं ज्ञान की आँ
ख से देखूँगा। मुझ आत्मा को कैसा भय? मेरा कुछ न बिगड़ा है न बिगड़ेगा। शाबाश है ! शाबाश है !! शाबाश है !!!

Those who experience faintheartedness and downtroddenness are sinners. Say unto death, .O death! You can kill my body but you cannot touch me. Who are you to frighten me? O worldly pleasures and temptations! Who are you to entrap me? I have known your illusory nature. O, worldly customs and manners, pains and pleasures, you cannot make me dance to your tune. I can overcome thousands of hurdles with this unified vision. I will remain calm, in thousands of failures and successes through knowledge. How can I, Atman, be afraid of anything? There is nothing for me to lose in this drama of life.

---Nirbhay Naad
तमाशबीन ही तमाशा बन रहा है। हाँ, प्रभावित होने का नाटक कर सकते हो परन्तु यदि वस्तुतः प्रभावित हो रहे हो तो समझो, अज्ञान जारी है। तुम अपने-आप में नहीं हो

The showman himself has become the object of the show. If you are really impressed by anyone or anything, be certain that you are still ignorant of Self-Knowledge. You are not abiding in your Self.

---Nirbhay Naad
जितना हो सके, जीवित सदगुरु के सान्निध्य का लाभ लो। वे तुम्हारे अहंकार को काट-छाँटकर तुम्हारे शुद्ध स्वरूप को प्रत्यक्ष करेंगे। उनकी वर्त्तमान हयाती के समय ही उनसे पूरा-पूरा लाभ लेने का प्रयास करो। उनका शरीर छूटने के बाद तो..... ठीक है, मंदिर बनते हैं और दुकानदारियाँ चलती हैं। तुम्हारी गढ़ाई फिर नहीं हो पायेगी। अभी तो वे तुम्हारी – ‘स्वयं को शरीर मानना और दूसरों को भी शरीर मानना’- ऐसी परिच्छिन्न मा
न्यताओं को छुड़ाते हैं। बाद में कौन छुड़ायेगा?..... बाद में नाम तो होगा साधना का कि मैं साधना करता हूँ, परन्तु मन खेल करेगा, तुम्हें उलझा देगा, जैसे सदियों से उलझाता आया है।

Take as much benefit possible of the vicinity of Satguru during His lifetime. He will slay your ego in order to reveal your Pure-Being. Get the maximum advantage of His presence at the present moment. After his passing away temples are built, and shop keeping thrives. But then your training and development will not occur. At present, He releases you from your self-limiting notions; and thinking yourself a body and others, too, as bodies. Who will release you afterwards? Then you will think that you are doing Sadhana, but it will be a play of your mind. The mind will bewilder you as it has been doing so for all your previous lives.

--Nirbhay Naad

तुम्हारे जिस चित्त में सुखाकार-दुःखाकार-द्वेषाकार वृत्तियाँ उठ रही हैं, वह चित्त प्रकृति है और उसका प्रेरक परमात्मा साक्षी उससे परे है। वही तुम्हारा असली स्वरूप है। उसमें न रहकर जब प्रकृति में भटकते हो, वृत्तियों के साथ एक हो जाते हो तो अशांत होते हो और स्वरूप में रहकर सब करते हो तो करते हुए भी अकर्ता हो। फिर आनन्द तो तुम्हारा स्वरूप ही है।


Your mind in which Vrittis (mental tendencies) of pleasure, pain, aversion arises, belongs to Nature, and is impelled by the witness that is beyond it. That is your real Self. When you wander in the Nature by identifying yourself with the Vrittis, you become restless, and when you perform all actions holding onto the self, you become restless, and when you perform all actions holding onto the Self, you are action less even while engaged in actions. The bliss turns out to be your very Being.

--Nirbhay Naad

भजन करते समय साधक को अच्छे बुरे विचारों से घबराना नहीं चाहिए विचार आ नहीं रहे, जा रहे हैं | विचार उत्पन्न होते हैं और उत्पन्न होने वाली वस्तु नष्ट होती है | इस विचारों की उपेक्षा करते हुए सावधान रहना हैं .............
भजन करते समय साधक को अच्छे बुरे विचारों से घबराना नहीं चाहिए विचार आ नहीं रहे, जा रहे हैं | विचार उत्पन्न होते हैं और उत्पन्न होने वाली वस्तु नष्ट होती है | इस विचारों की उपेक्षा करते हुए सावधान रहना हैं .............

Tuesday, August 28, 2012

जिसके जीवन में समय का मूल्य नहीं, कोई उच्च लक्ष्य नहीं, उसका जीवन बिना
स्टियरींग की गाड़ी जैसा होता है। साधक अपने एक-एक श्वास की कीमत समझता है,
अपनी हर चेष्टा का यथोचित मूल्यांकन करता है।

ईश्वर का भोग और ईश्वर से योग (आत्मनिष्ठ पूज्य बापू जी की ज्ञानमयी अमृतवाणी)

आपको ईश्वर से योग करना है कि ईश्वर का भोग करना है ? बोलो ! वासुदेवः सर्वम् है तो भोग किसका कर रहे हैं ? ૐ ईशावास्यमिदं सर्वं.... सब ईश्वर है तो भोग तुम ईश्वर का करते हो कि दूसरे किसी का ? बताओ ! दिन-रात ईश्वर का ही भोग कर रहे हैं लेकिन पता नहीं है। चीज-वस्तु सब ईश्वर ही है और यहाँ (भोक्ता के रूप में) भी ईश्वर है। पति-पत्नी सब ईश्वर है। ईश्वर का भोग हो रहा है और ईश्वर से योग भी हो रहा है लेकिन भोग संयत करो तो ईश्वर के योग और भोग दोनों में पास हो जाओगे तथा भोग अधिक करोगे तो खोखले हो जाओगे।

ʹईश्वर का भोग करेंʹ तो तुम ईश्वर का भोग करने वाले कौन ? ईश्वर से बड़े हो ? नहीं, ईश्वर के स्वरूप हो। तो हम अपने-आपका भोग कर रहे हैं। अपने-आपका भोग करोगे संयम से तो अपने-आपको जानोगे और अपने-आपका भोग करोगे असंयम से तो अज्ञानी, मूर्

ख होकर नीच योनियों में जाओगे।

तुम ईमानदारी से सभी का मंगल चाहो, सभी का हित चाहो और फिर अपना। समाज का मंगल चाहना – यह संसार की सेवा हो गयी। ईश्वर को प्रेम करना – यह ईश्वर की सेवा हो गयी और अपने आत्मा में आकर बैठना, अपनी सेवा हो गयी। बस, तीन सेवाएँ करनी हैं और क्या है ! अपने-आपमें बैठना है, तो मंत्रोच्चारण करते हुए निःसंकल्प हों – ૐ ૐ परमात्मने नमः। ૐૐ आनंदस्वरूपाय नमः। ૐ....ૐ..... ૐ.... माने जो सारी सृष्टियों का पालनहार, कर्ता-धर्ता है और अंतर्यामी होकर विराज रहा है।

जो ईश्वर को भोगता है वह लघु साधना में जाता है लेकिन जो ईश्वर को भोगते हुए जानता है, ʹवह ईश्वर गुरु हैʹ - ऐसा जानकर स्वयं भी गुरु बन जाता है और लघुता से पार हो जाता है।

जहाँ तक अपनापन है उसे हटाते जाओ, जहाँ तक मेरा-मेरा विस्तार है उसको भी पार लगाते जाओ यह मेरा है ऐसा कहने को जब कुछ न बचेगा तब समझना कि साधना की सिद्धि का द्वारा मिल गया.....

सहजावस्था न जागृत हैं, न स्वप्न है, न सुषुप्ति हैं, ना मूर्छा हैं और न समाधि हैं | सुषुप्ति और सहजावस्था में फर्क यही है कि सुषुप्ति में तो बेहोशी रहती हैं, पर सहजावस्था में बेहोशी नहीं रहती, प्रत्युत होश रहता है, जागृति रहती है| ज्ञान की एक दीप्ति रहती हैं|

संत और गुरु में क्या अंतर होता है ?

संतों में भी स्तर होते हैं , गुरुपद के संत (७० प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर) से शक्ति के स्पंदन प्रक्षेपित होते हैं, सद्गुरु पद के संत (80% आध्यात्मिक स्तर) उसके अगले स्तर के होते हैं और उनसे आनंद के स्पंदन प्रक्षेपित होते हैं और वह वह शक्ति के स्पंदन से अधिक सूक्ष्म होते हैं और सबसे ऊपर परात्पर पद के संत (९० % आध्यात्मिक स्तर) के होते हैं उनसे शांति के स्पंदन प्रक्षेपित होते हैं |
सभी गुरु संत होते हैं, परन्तु सभी संत गुरु नहीं होते | गुरु पद एक कठिन पद होता है और कई बार संत इस पद को स्वीकार करने को इच्छुक नहीं होते और वे आत्मानंद में रत रहना पसंद करते हैं | ऐसे संतो के मात्र अस्तित्व से ब्रह्माण्ड की सात्त्विकता बनी रहती है | कुछ संत भक्तों के अध्यात्मिक कष्ट दूर तो करते हैं, पर किसी को शिष्य स्वीकार कर उसे मोक्ष तक ले जाने को इच्छुक नहीं होते क्योंकि संतों को पता होता है मात्र शिष्य बनाने से काम समाप्त नहीं होता, शिष्य जब तक मोक्ष को प्राप्त नहीं होता, तब तक वह उत्तरदायित्व गुरु का होता है; अतः कई गुरु शिष्य बनाते समय बहुत सतर्क रहते हैं और योग्य पात्र को ही शिष्य स्वीकार करते हैं | मात्र गुरु पद स्वीकार करने के पश्चात् संतो की प्रगति मोक्ष की द्रुत गति से होती है | ईश्वर प्रत्येक संत को गुरुके लिए नहीं चुनते, जिनमे दूसरों को सिखाने की विशेष क्षमता हो, मां समान मातृत्व, क्षमाशीलता और प्रेम हो, उसे ही सद्गुरु पद पर आसीन करते हैं |........

Monday, August 27, 2012

हरी नाम से बड़ी चाहत क्या होगी ..
गुरुदेव से बड़ी इबादत क्या होगी ...
जिसे मिले बापू जी जेसे गुरु ...
उसे ज़िन्दगी से शिकायत क्या होगी ???????

यह सत्य है कच्चे कान के लोग दुष्ट निन्दकों के वाग्जाल में फँस जाते हैं। जिस व्यक्ति ने अपने जीवन में आत्मशांति देने वाला, परमात्मा से जोड़ने वाला कोई काम नहीं किया है, उसकी बात सच्ची मानने का कोई कारण ही नहीं है। तदुपरान्त मनुष्य को यह भी विचार करना चाहिए कि जिसकी वाणी और व्यवहार से हमें जीवन-विकास की प्रेरणा मिलती है, उसका यदि कोई अनादर करना चाहे तो हम उस महापुरुष की निन्दा कैसे सुन लेंगे? व कैसे मान लेंगे?

जिस प्रकार पानी में दिखने वाला सूर्य का प्रतिबिम्ब वास्तविक सूर्य नहीं है अपितु सूर्य का आभासमात्र है, उसी प्रकार विषय-भोगों में जो आनंद दिखता है वह आभास मात्र ही है, सच्चा आनंद नहीं है। वह ईश्वरीय आनंद का ही आभासमात्र है। एक परब्रह्म परमेश्वर ही सत्, चित् तथा आनंदस्वरूप है।

जो सच्चा जिज्ञासु है, वह मोक्ष को अवश्य प्राप्त करता है। लगातार अभ्यास चिंतन तथा ध्यान करने से साधक आत्मनिश्चय में टिक जाता है। अतः लगातार अभ्यास, चिंतन, ध्यान करते रहना चाहिए, फिर निश्चय ही सब दुःखों से मुक्ति और परमानंद की प्राप्ति हो जायेगी। मोक्ष प्राप्त हो जायेगा।

शास्त्रों में आता है कि संत की निन्दा, विरोध या अन्य किसी त्रुटि के बदले में संत क्रोध कर दें, शाप दे दें तो इतना अनिष्ट नहीं होता जितना अनिष्ट संतों की खामोशी व सहनशीलता के कारण होता है। सच्चे संतों की बुराई का फल तो भोगना ही पड़ता है। संत तो दयालु और उदार होते हैं। वे तो क्षमा कर देते हैं, परंतु प्रकृति कभी नहीं छोड़ती। इतिहास उठाकर देखें तो पता चलेगा कि सच्चे संतों व महापुरुषों के निन्दकों को कैसे-कैसे भीषण कष्टों को सहते हुए बेमौत मरना पड़ा है और पता नहीं किन-किन नरकों को सड़ना पड़ा है। अतएव समझदारी इसी में है कि हम संतों की प्रशंसा करके या उनके आदर्शों को अपनाकर लाभ न ले सकें तो उनकी निन्दा करके पुण्य व शांति भी नष्ट नहीं करें।
पराशर मुनि ने राजा जनक को कहा हैः

कृतानि यानि कर्माणि दैवतैर्मुनिभस्तथा।
न चरेत् तानि धर्मात्मा श्रुत्वा चापि न कुत्सयेत्॥

'देवताओं और मुनियों द्वारा जो अनुचित कर्म दिये गये हों, धर्मात्मा पुरुष उनका अनुकरण न करे और उन कर्मों को सुनकर भी उन देवता आदि की निन्दा न करे।'
महा. शांतिपर्व (291/17)

सत्पुरुष हमें जीवन के शिखर पर ले जाना चाहते हैं, किंतु कीचड़ उछालने वाला आदमी हमें खाई की ओर खींचकर ले जाना चाहता है। उसके चक्कर में हम क्यों फँसे? ऐसे अधम व्यक्ति के निन्दाचारों में पड़कर हमें पाप की गठरी बाँधने की क्या आवश्यकता है? इस जीवन में तमाम अशांतियाँ भरी हुई हैं। उन अशांतियों में वृद्धि करने से क्या लाभ?

दृढ़तापूर्वक निश्चय करो कि तुम्हारी जो विशाल काया है, जिसे तुम नाम और रुप से ‘मैं’ करके सँभाल रहे हो उस काया का, अपने देह का अध्यास आज तोड़ना है । साधना के आखिरी शिखर पर पँहुचने के लिए यह आखिरी अड़चन है । इस देह की ममता से पार होना पड़ेगा । जब तक यह देह की ममता रहेगी तब तक किये हुए कर्म तुम्हारे लिए बंधन बने रहेंगे । जब तक देह में आसक्ति बनी रहेगी तब तक विकार तुम्हारा पीछा न छोड़ेगा । चाहे तुम लाख उपाय कर लो लेकिन जब तक देहाध्यास बना रहेगा तब तक प्रभु के गीत नहीं गूँज पायेंगे । जब तक तुम अपने को देह मानते रहोगे तब तक ब्रह्म-साक्षात्कार न हो पायेगा । तुम अपने को हड्डी, मांस, त्वचा, रक्त, मलमूत्र, विष्टा का थैला मानते रहोगे तब तक दुर्भाग्य से पिण्ड न छूटेगा । बड़े से बड़ा दुर्भाग्य है जन्म लेना और मरना । हजार हजार सुविधाओं के बीच कोई जन्म ले, फर्क क्या पड़ता है? दु:ख झेलने ही पड़ते हैं उस बेचारे को ।

हृदयपूर्वक ईमानदारी से प्रभु को प्रार्थना करो कि:

‘हे प्रभु ! हे दया के सागर ! तेरे द्वार पर आये हैं । तेरे पास कोई कमी नहीं । तू हमें बल दे, तू हमें हिम्मत दे कि तेरे मार्ग पर कदम रखे हैं तो पँहुचकर ही रहें । हे मेरे प्रभु ! देह की ममता को तोड़कर तेरे साथ अपने दिल को जोड़ लें |’

जिनका जीवन आज भी किसी संत या महापुरुष के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सान्निध्य में है, उनके जीवन में निश्चिन्तता, निर्विकारिता, निर्भयता, प्रसन्नता, सरलता, समता व दयालुता के दैवी गुण साधारण मानवों की अपेक्षा अधिक ही होते हैं तथा देर-सवेर वे भी महान हो जाते हैं और जो लोग महापुरुषों का, धर्म का सामीप्य व मार्गदर्शन पाने से कतराते हैं, वे प्रायः अशांत, उद्विग्न व दुःखी देखे जाते हैं व भटकते रहते हैं। इनमें से कई लोग आसुरी वृत्तियों से युक्त होकर संतों के निन्दक बनकर अपना सर्वनाश कर लेते हैं।

Tuesday, April 17, 2012

जब व्यक्ति की बुद्धि सदैव दूसरों को यश देने वाली हो जाती है तो यह बुद्धि "यशोदा" बन जाती है, और व्यक्ति का मन दूसरों की निन्दा से रहित हो जाता है तो यह मन "नन्द" बन जाता है, तब इन्द्रियों के समूह "गोकुल" रूपी शरीर में आनन्द रूप में भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हो जाते हैं
चिन्ता उन्हीं की होती है जिनके पास ठीक चिन्तन नहीं है। शरीर की आवश्यकता पूरी करने के लिए पुरूषार्थ करना हाथ-पैर चलाना, काम करना, इसकी मनाही नहीं है। लेकिन इसके पीछे अन्धी दौड़ लगाकर अपनी चिन्तनशक्ति नष्ट कर देना यह बहुत हानिकारक है।
निश्चिन्त जीवन कैसे हो ?
निश्चिन्त जीवन तब होता है जब तुम ठीक उद्यम करते हो। चिन्तित जीवन तब होता है जब तुम गलत उद्यम करते हो। लोगों के पास है वह तुमको मिले इसमें तुम ...स्वतन्त्र नहीं हो। तुम्हारा यह शरीर अकेला जी नहीं सकता। वह कइयों पर आधारित रहता है। तुम्हारे पास जो है वह दूसरों तक पहुँचाने में स्वतन्त्र हो। तुम दूसरे का ले लेने में स्वतंत्र नहीं हो लेकिन दूसरों को अपना बाँट देने में स्वतंत्र हो। मजे की बात यह है कि जो अपना बाँटता है वह दूसरों का बहुत सारा ले सकता है। जो अपना नहीं देता और दूसरों का लेना चाहता है उसको ज्यादा चिन्ता रहती है।
जो खुद बड़ा होता है, वह दूसरे को भी बड़ा ही बनाता है । जो दूसरे को छोटा बनाता है, वह खुद छोटा होता है । जो वास्तवमेँ बड़ा होता है, उसको छोटा बनने मेँ लज्जा भी नहीँ आती । क्षत्रियोँ के समुदाय मेँ, अठारह अक्षौहिणी सेना मेँ भगवान घोड़े हाँकनेवाले बने । अर्जुन ने कहा कि दोनोँ सेनाओँ के बीच मेँ मेरा रथ खड़ा करो तो भगवान शिष्य की तरह अर्जुन की आज्ञा का पालन करते हैँ । ऐसे ही पाण्डवोँ ने यज्ञ किया तो उसमेँ सबसे पहले भगवान श्रीकृष्ण का पूजन किया । परंतु उस यज्ञ मेँ ब्राह्मणोँ की जूठी पत्तलेँ उठाने का काम भी भगवान ने किया । छोटा काम करने मेँ भगवान को लज्जा नहीँ आती । जो खुद छोटा होता है, उसी को लज्जा आती है और भय लगता है कि कोई मेरे को छोटा न समझ ले, कोई मेरा अपमान न कर दे ।

Sunday, April 15, 2012

पारिवारिक मोह और आसक्ति से अपने को दूर रखो। अपने मन में यह दृढ़ संकल्प करके साधनापथ पर आगे बढ़ो कि यह मेरा दुर्लभ शरीर न स्त्री-बच्चों के लिए है, न दुकान-मकान के लिए है और न ही ऐसी अन्य तुच्छ चीजों के संग्रह करने के लिए है। यह दुर्लभ शरीर आत्म ज्ञान प्राप्त करने के लिए है। मजाल है कि अन्य लोग इसके समय और सामर्थ्य को चूस लें और मैं अपने परम लक्ष्य आत्म-साक्षात्कार से वंचित रह जाऊँ? बाहर के नाते-रिश्तों को, बाहर के सांसारिक व्यवहार को उतना ही महत्त्व दो जहाँ तक कि वे साधना के मार्ग में विघ्न न बनें। साधना मेरा प्रमुख कर्त्तव्य है, बाकी सब कार्य गौण हैं – इस दृढ़ भावना के साथ अपने पथ पर बढ़ते जाओ।

किसी भी अनुकूलता की आस मत करो। संसारी तुच्छ विषयों की माँग मत करो। विषयों की माँग कोई भी हो, तुम्हें दीन बना देगी। विषयों की दीनतावालों को भगवान नहीं मिलते।
साधक को सबसे पहले 'मैं भगवान का हूँ' इस प्रकार अपने अहंता को बदल देना चाहिए। कारण कि बिना अहंता के बदले साधन सुगमता से नहीं होता और अहंता के बदलने पर साधन सुगमता से, स्वाभाविक ही होने लगता है।

विवाह हो जाने पर कन्या अपनी अहंता को बदल देती है कि 'मैं तो ससुराल की ही हूँ' और पिता के कुल का सम्बन्ध बिल्कुल छूट जाता है।

ऐसे ही साधक को अपनी अहंता बदल देनी चाहिए कि 'मैं भगवान का हूँ और भगवान मेरे हैं, मैं संसार का नहीं हूँ और संसार मेरा नहीं है।'

अहंता के बदलने पर ममता भी अपने आप बदल जाती है।...... पूज्यपाद श्रीबापूजी
सुख का दृश्य भी आयेगा और जायेगा तो दुःख का दृश्य भी आयेगा और जायेगा। पर्दे को क्या? कई फिल्में और उनके दृश्य आये और चले गये, पर्दा अपनी महिमा में स्थित है। तुम तो छाती ठोककर कहोः ‘अनुकूलता या प्रतिकूलता, सुख या दुःख जिसे आना हो आये और जाय। मुझे क्या...?’ किसी भी दृश्य को सच्चा मत मानो। तुम दृष्टा बनकर देखते रहो, अपनी महिमा में मस्त रहो।
पारिवारिक मोह और आसक्ति से अपने को दूर रखो। अपने मन में यह दृढ़ संकल्प करके साधनापथ पर आगे बढ़ो कि यह मेरा दुर्लभ शरीर न स्त्री-बच्चों के लिए है, न दुकान-मकान के लिए है और न ही ऐसी अन्य तुच्छ चीजों के संग्रह करने के लिए है। यह दुर्लभ शरीर आत्म ज्ञान प्राप्त करने के लिए है। मजाल है कि अन्य लोग इसके समय और सामर्थ्य को चूस लें और मैं अपने परम लक्ष्य आत्म-साक्षात्कार से वंचित रह जाऊँ? बाहर के नाते-रि...श्तों को, बाहर के सांसारिक व्यवहार को उतना ही महत्त्व दो जहाँ तक कि वे साधना के मार्ग में विघ्न न बनें। साधना मेरा प्रमुख कर्त्तव्य है, बाकी सब कार्य गौण हैं – इस दृढ़ भावना के साथ अपने पथ पर बढ़ते जाओ।

किसी भी अनुकूलता की आस मत करो। संसारी तुच्छ विषयों की माँग मत करो। विषयों की माँग कोई भी हो, तुम्हें दीन बना देगी। विषयों की दीनतावालों को भगवान नहीं मिलते।
श्री दादा गुरुवाणी - १६ अप्रैल २०१२

विकार कब तक?

आसक्ति (मोह), काम, क्रोध आदि विकार क्या हैं? जांच कर देखोगे तो वे कुछ नहीं हैं| राग और द्वेष की अग्नि जलाती है| वे सब तब तक हैं, जब तक तुमने वास्तविकता को नहीं पहचाना है| जब वास्तविकता को पहचानोगे, जब सब में चेतन का चमत्कार देखोगे, तब कुछ नहीं रहेगा, सभी विकार हट जाएंगे| जिसे अपना बेटा समझते हो और इसलिए उनसे मोह रखते हो, जब वे चले जाएंगे, तब उनमें भी चेतन का चमत्कार समझोगे| तुम यह शरीर नहीं हो, न बुझने वाली ज्योति हो|

*** तीसरी कृपा है सतगुरु की| सतगुरु कृपा से अज्ञान के तीनों परदे दूर होते हैं और मन निर्मल होता है|
स्वय दिखना चाहिए ! उस दर्शन से - वह दर्शन ही जीवन कि और ले जाने का मार्ग बन जाता है ! और तब जीवन पाने के लिए क्या करू ? यह नहीं पूछना पड़ता है ! जैसे ही यह दर्शन होता है कि मैं मृत हूँ ...मेरा अब तक का होना .....मेरा अब तक का व्यक्तित्व ......यह सब मृत्यु ही है, ...और साथ ही साथ उसके भी दर्शन होने लगते है जो कि मृत्यु नहीं है !

Thursday, April 5, 2012

हर समय, हर स्थान में जिस का अस्तित्व है उस सत्य स्वरूप चिद्घन चैत्यन्य परमात्मा का नाम हरि है..जिस के स्मरण से दुख, शोक, पाप हर जाते है उस परमात्मा का नाम हरि है..
श्री दादा गुरुवाणी - ५ अप्रैल २०१२

जीवन का उद्देश्य

मनुष्य शरीर, जाती, वर्ग, आश्रम, धर्म आदि से अपनी एकता करके, उनका अभिमान करने लगता है, उन्हें अपना समझता है ओर उनके अनुसार स्वयं को कई बंधनों में बांध कर राग द्वेष करने लगता है, तभी उनका मन अशुद्ध रहेता है| अतः साधक को यही विश्वास ओर निश्चय करना चाहिए कि मैं शरीर नहीं हूं| मुझे मनुष्य शरीर भगवान की कृपा से साधना के लिए मिला है| यह निश्चय करके शरीर में सुख की भावना नहीं रखनी चाहिए| जो प्राप्त हो, उसका शुद्ध उपयोग करना चाहिए|

*** विषय विकारों को थोड़ा करके न जानो| सौ मण दूध में यदि एक बूंद विष की डालोगे तो सौ मण ही व्यर्थ जायेगा| विषय विकारों को सांप के विष से भी अधिक भयानक समझो|

Tuesday, April 3, 2012

गलत ढंग से चित्त का निर्माण हो जाता है तो वह बन्धन व दुःख का कारण बन जायगा। जैसे, चित्त का निर्माण हो गया कि मैं अमुक जाति का हूँ, यह मेरा नाम है, मैं स्त्री हूँ या पुरूष हूँ।

इस प्रकार के चित्त का निर्माण हो गया तो उसके लिए आदर के दो शब्द जीवन बन जाते हैं और अनादर के दो शब्द मौत बन जाते हैं। झूठे संस्कारों से चित्त का निर्माण हो गया।

क्योंकि जो कुछ नाम-रूप हैं, सुख-दुःख हैं, अनुकूलता-प्रतिकूलता हैं वे सब माया में खिलवाड़ मात्र हैं। मायामात्रं इदं द्वैतम्। यह सारा प्रपंच जो दिख रहा है वह सब माया मात्र है।

देखिये सुनिये गुनिये मन माँहि।
मोहमूल परमारथ नाँही।।........ पूज्यपाद श्रीबापूजी
दोस्त कभी भी आपका साथ छोड़ सकता है, भाई कभी भी आपसे मुंह मोड़ सकता हैं, इसिलएः-
1- हमेशा अपनी क्षमता, सामर्थ्य और बाजुओं पर भरोसा करें।
2- सफल लोगों से प्रेरणा लेकर कार्य करें।
3- छोटो को देखकर जींएं।
4- बड़ों से सीखकर आगें बढ़ें।
5- चुनौतियों का डटकर सामना करें।
6- संकट के लिए तैयार रहें और सुख के लिए निरन्तर प्रयत्न करते रहें।
इसका सुखद परिणाम यह मिलेगा कि जीवन में कभी भी आपको दुःखी व निराश नहीं होना पड़ेगा।
मोह किस को बोलते? विपरीत ज्ञान को मोह बोलते.

है तो सत-चित-आनंद स्वरूप लेकिन मान रहे अपने को शरीर …मान रहे अपने को अमुक जातीवाला, अमुक कर्म वाला, अमुक बंधन वाला…मान मान के फसते इस को बोलते मोह ..
सदगुरु ही जगत में तुम्हारे सच्चे मित्र हैं। मित्र बनाओ तो उन्हें ही बनाओ, भाई-माता-पिता बनाओ तो उन्हें ही बनाओ। गुरुभक्ति तुम्हें जड़ता से चैतन्यता की ओर ले जायेगी। जगत के अन्य नाते-रिश्ते तुम्हें संसार में फँसायेंगे, भटकायेंगे, दुःखों में पटकेंगे, स्वरूप से दूर ले जायेंगे। गुरु तुम्हें जड़ता से, दुःखों से, चिन्ताओं से मुक्त करेंगे। तुम्हें अपने आत्मस्वरूप में ले जायेंगे।

Monday, April 2, 2012

धार्मिक आदमी वह नहीं है,जो ईश्‍वर को खोजता है,बल्कि धार्मिक आदमी वह है,जिसे खोजने के लिए ईश्‍वर को मजबूर होना पडे। सिर्फ मंदिर जाने से कोई धार्मिक नहीं हो जाता,धार्मिक तो वह है,जो जहां बैठ जाए,वह जगह मंदिर बन जाए। जहां भी जाए,वहीं मंदिर की सुगंध आने लगे। जहां खडा हो जाए,वह भूमि पवित्र हो जाए। जहां देख ले,वहां प्रार्थना की हवा छा जाए।

एकाग्रताः सफलता की कुंजी....

मनोवैज्ञानिकों का विज्ञान अगर मेज को कुर्सी दिखाने में सफल हो सकता है तो योगियों का विज्ञान जड़ में छुपे हुए चेतन को प्रकट करने में सफल क्यों नहीं हो सकता? वास्तव में जड़ जैसी कोई चीज नहीं है। जो जड़ दिखता है वह सब चेतन का विवर्त ही है। चेतन की घन सुषुप्ति को हम जड़ कहते हैं, क्षीण सुषुप्ति को वृक्ष आदि कहते हैं। वही चेतन अनेक प्रकार के स्वप्नों में, कल्पना में जब होता है तब उसी को जीव कहते हैं और वही जब अपने स्वरूप में जागता है तब शिवस्वरूप हो जाता है।
रामायण का विद्वान हो चाहे भागवत का विद्वान हो, कथाकार हो चाहे श्रोता हो, वकील हो चाहे न्यायाधीश हो लेकिन जब गूढ़ विषय का या गूढ़ बात का रहस्य खोजना हो तब वे लोग शांत और स्थिर हो जाते हैं। स्थिर होने का उनका जितना अभ्यास होता है उतना वे उस विषय में अधिक कुशल होते हैं।
यहाँ शंकराचार्य जी की बात हमें शब्दशः स्वीकार्य है कि मन और इन्द्रियों की एकाग्रता ही परम तप है। उनका जब सब धर्मों से महान है।
जो लोग भक्ति के मार्ग पर हैं और एकाग्रता की ओर ध्यान नहीं देते वे बेचारे रोते हैं किः "कुछ नहीं हुआ.... पच्चीस साल से भक्ति करते हैं लेकिन लड़का हमारा कहा नहीं मानता।"
जो लोग योग की ओर चले हैं लेकिन योग के द्वारा एकाग्रता का जो तरीका जानना चाहिए वह नहीं जाना तो महीना-दो-महीना योग करके कहेंगे कि योग में कुछ नहीं है, हमने करके देख लिया।
एकाग्रता कैसे प्राप्त होती है इस विषय का ज्ञान जब तक नहीं है तब तक अदभुत सामर्थ्य, हमारे अदभुत खजाने जो सुषुप्त हैं, छुपे हुए हैं, उनसे हम लोग वंचित रह जाते हैं। एकाग्रता हुई तो तपी का तप सिद्ध हो जायेगा, जपी का जप सफल हो जायेगा, योगी का योग सिद्ध हो जायेगा, सत्ताधीश सत्ता में सफल हो जायेगा, दुकानदार दुकानदारी में सफल हो जायेगा।
वह जो अपने पैरों पर नहीं खड़ा है, वह किसके पैरों पर खड़ा हो सकता है ? बुद्ध ने कहा है : अपने दीपक स्वयं बनो ! अपनी शरण स्वयं बनो ! स्वशरण के अतिरिक्त और कोई सम्यक गति नहीं है ! यही मैं कहता हूँ !
साधना, जीवन का, कोई खंड अंश नहीं है ! वह तो समग्र जीवन है ! उठना, बैठना, बोलना, हँसना ....सभी में उसे होना है ! तभी वह सार्थक और सहज होती है !

Thursday, March 29, 2012

एकाग्रता और भगवददर्शन.....

जिस मूर्ति को गौरांग निहारते थे उस जगन्नाथजी को औरों ने भी निहारा था। लेकिन गौरांग की इतनी एकाग्रता थी कि वे सशरीर उसी मूर्ति में समा गये। जिस मूर्ति को मीराजी देखती थी उस मूर्ति को और लोग भी देखते थे। लेकिन मीरा की एकाग्रता ने अदभुत चमत्कार कर दिया। धन्ना जाट ने सिलबट्टा पाया पण्डित से। जिस सिलबट्टे से पण्डित रोज भाँग रगड़ता था वही सिलबट्टा धन्ना जाट की दृष्टि में ठाकुरजी बना और पूजा में रखा गया। धन्ना जाट की इतनी एकाग्रता हुई कि ठाकुर जी को उसी सिलबट्टे में से प्रकट होना पड़ा। काले कुत्ते को अनेक यात्रियों ने देखा। नामदेव भी एक यात्री थे। अलग-अलग तम्बू लगाकर यात्री लोग भोजन बना रहे थे। कुत्ते को आया देखकर कोई बोलाः यह अपशकुन है। किसी ने कहाः काला कुत्ता तो शकुन माना जाता है। वे लोग कुत्ते की चर्चा कर रहे थे और इतने में कुत्ता नामदेव की रोटी लेकर भागा। कुत्ते में भी भगवान को निहारनेवाले भक्त नामदेव घी की कटोरी लेकर पीछे भागे। सबमें भगवान को निहारने की उनकी इतनी एकाग्रता थी, इतनी दृढ़ता थी कि उस कुत्ते में से भगवान को प्रकट होना पड़ा।

Thursday, March 22, 2012

विपत्तियों के पहाड़, दुःखों के समुद्र हमें दुःखी बनाने में समर्थ नहीं हैं, क्योंकि सर्वसमर्थ हमारा आत्मा हमारा परम हितैषी है । केवल हम उसे अपना मानें, समर्थ मानें, प्रीतिपूर्वक सुमिरें । अचेतन अवस्था में भी वह हमारा साथ नहीं छोड़ता । मृत्यु भी हमारे और ईश्वर के अमर संबंध को नहीं तोड़ सकती । हाय राम ! ऐसे पिया को छोड़कर किस-किसकी शरण लोगे ? किस-किसके आगे गिड़गिड़ाओगे ? हरि शरणम्... प्रभु शरणम्... । ॐ... ॐ... ॐ... ईश्वर को पाये बिना दुनिया की कोई भी विद्या पा ली तो अंत में घुटने टेकने ही पड़ते हैं ।

Wednesday, March 21, 2012

मोह और ममता पहले थोड़े होती है, वह तो ज्ञान के अनादर के बाद होती है । मोह-ममता स्वाभाविक थोड़े ही है । परिवार की सेवा करो, ममता का क्या अर्थ ? परिवार के अधिकार की रक्षा करो और परिवार के उपर से अपना अधिकार हटा लो । यही त्याग हो गया । परिवार को बुरा मत समझो, परिवार की निन्दा मत करो। हर आदमी अपनी जगह पर पूरा और श्रेष्ठ है ।

हिंमत हारा बैठा था में...

हिंमत हारा बैठा था में,

पीठ फिराये भविष्य से।

हार चुका था अपनी शक्ति,
...
अपनी ही कमजोरी से ।

देखा मैंने एक मकड़ी को,

बार बार यूँ गिरते हुए।

अपने बुने हुए जाल पे फिर भी,

कंई बार जो सँभलते हुए।

गिरती रही, सँभलती रही पर..

बुनती रही वो अपना जाल।

पुरा बन चुकने पर मकडी,

जैसे हो गई हो निहाल।

एक छोटी मक़्डी ने मुझ में,

भर दी हिंमत कंई अपार।

कुछ करने की ठान ली मैंने,

अब ना रहा मैं यूँ लाचार।

मक़डी ने सिखलाया मुज़को,

हरदम कोशिश करते रहना।

”राज़” कितनी बाधाएं आयें,

हरदम कदम बढाये रहना।
उल्लुओं की पंचायत इकट्ठी हुई| एक ने दूसरे से पूछा के तुम में से किसी ने सूर्य देखा है? भला उन में से किसी ने सूर्य देखा हो तो हां कहे| उनहोंने कहा कि सूर्य होता ही नहीं| यही दशा अज्ञानी लोगों की है| वे ईश्वर के लिए कहते हैं कि ईश्वर है ही नहीं| वे संसार को सत् समझकर बैठे है|

अपने आपको भूल के, हैरान हो गया,
माया के जाल में फंसा, बैरान हो गया|

*** यदि मनुष्य वाणी का सदुपयोग करेगा अर्थात मौन धारण करेगा अथवा उचित और पर्याप्त बोलेगा तो जगत के बहुत से झगड़े मिट जायें....

अभ्यास में रूचि क्यों नहीं होती? (15 जनवरी 1958, कानपुर।)

सत्संग-प्रसंग पर एक जिज्ञासु ने पूज्य बापू से प्रश्न कियाः
"स्वामीजी ! कृपा करके बताएँ कि हमें अभ्यास में रूचि क्यों नहीं होती?"
पूज्य स्वामीजीः "बाबा ! अभ्यास में तब मजा आयेगा जब उसकी जरूरत का अनुभव करोगे।
एक बार एक सियार को खूब प्यास लगी। प्यास से परेशान होता दौड़ता-दौड़ता वह एक नदी के किनारे पर गया और जल्दी-जल्दी पानी पीने लगा। सियार की पानी पीने की इतनी तड़प देखकर नदी में रहने वाली एक मछली ने उससे पूछाः
'सियार मामा ! तुम्हें पानी से इतना सारा मजा क्यों आता है? मुझे तो पानी में इतना मजा नहीं आता।'
सियार ने जवाब दियाः 'मुझे पानी से इतना मजा क्यों आता है यह तुझे जानना है?'
मछली ने कहाः ''हाँ मामा!"
सियार ने तुरन्त ही मछली को गले से पकड़कर तपी हुई बालू पर फेंक दिया। मछली बेचारी पानी के बिना बहुत छटपटाने लगी, खूब परेशान हो गई और मृत्यु के एकदम निकट आ गयी। तब सियार ने उसे पुनः पानी में डाल दिया। फिर मछली से पूछाः
'क्यों? अब तुझे पानी में मजा आने का कारण समझ में आया?'
मछलीः 'हाँ, अब मुझे पता चला कि पानी ही मेरा जीवन है। उसके सिवाय मेरा जीना असम्भव है।'
इस प्रकार मछली की तरह जब तुम भी अभ्यास की जरूरत का अनुभव करोगे तब तुम अभ्यास के बिना रह नहीं सकोगे। रात दिन उसी में लगे रहोगे।
जीवन में न शुष्क ज्ञान चाहिए और न ही अज्ञानपूर्ण श्रद्धा। श्रद्धा में चाहिए तत्त्वज्ञान एवं संयम तथा ज्ञान में चाहिए श्रद्धा।

व्याकुलता क्यों ?


एक मंत्री धर्मात्मा और सत्संगी था| उसे राज दरबार का बहुत काम करना पड़ता था| कभी कभी उससे तंग आ जाता था| परन्तु बाद में जब उसे स्मरण होता था कि यह संसार अनित्य है, तब ठहाके मारता था| कहता था - "में यह क्या कर रहा हूं| किस का काम कर रहा हं? सब नाश्वत है, तो फिर व्याकुलता किसके लिए?"

हमें भी सब अनित्य जानकर दुनिया में चलना चाहिए| विषयों में फंसकर अपना जीवन बर्बाद नही करना चाहिए|

*** सदैव सोच समझकर बोलना चाहिए, नहीं तो शान्ति में रहना चाहिए| बुद्धिमान मनुष्य वह है, जो बोलने से पहले सोचता है|

अपने दोष देखो

दूसरे की पहाड़ जीतनी भूल भी तिल जीतनी करके देखो, किंतु अपनी तिल जीतनी भूल भी पहाड़ जीतनी करके जानो|

यदि कोई तुम्हारी निंदा करे तो प्रसन्नता से वह सुनो| मन को तपाओ नहीं| यदि तुम में सचमुच वह दोष हो तो उसे दूर कराने का निश्चय करो|

सदैव अपने दोष देखा करो| दूसरों के दोषों कि और न देखो|

अपना सखी तू, निज मन मांहीं विचार,
नारायण जो खोट है, ताको तुर्त निवार|

*** संग सदैव सोच सझकर करना चाहिए| संत असतं, पापी महात्मा, भले बुरे का विचार करके संग करो| संग का बहोत प्रभाव पड़ता है|

वाणी के चार पाप :-

कभी-भी कड़वी बात नहीं बोलनी चाहिए। किसी भी बात को मृदुता से, मधुरता से एवं अपने हृदय का प्रेम उसमें मिलाकर फिर कहना चाहिए। कठोर वाणी का सर्वथा त्याग कर देना चाहिए। यह वाणी का एक पाप है।.....

हम जो जानते हैं वह न बोलें, मौन रहें तो चल सकता है किन्तु जो बोलें वह सत्य ही होना चाहिए, अपने ज्ञान के अनुसार ही होना चाहिए। अपने ज्ञान का कभी अनादर न करें, तिरस्कार न करें। जब हम किसी के सामने झूठ बोलते हैं तब उसे नहीं ठगते, वरन् अपने ज्ञान को ही ठगते हैं, अपने ज्ञान का ही अपमान करते हैं। इससे ज्ञान रूठ जाता है, नाराज हो जाता है। ज्ञान कहता है कि 'यह तो मेरे पर झूठ का परदा ढाँक देता है, मुझे दबा देता है तो इसके पास क्यों रहूँ ?' ज्ञान दब जाता है। इस प्रकार असत्य बोलना यह वाणी का पाप है।.....

इधर की बात उधर और उधर की बात इधर करना। क्या आप किसी के दूत हैं कि इस प्रकार संदेशवाहक का कार्य करते हैं ? चुगली करना आसुरी संपत्ति के अंतर्गत आता है। इससे कलह पैदा होता है, दुर्भावना जन्म लेती है। चुगली करना यह वाणी का तीसरा पाप है।.....

प्रसंग के विपरीत बात करना। यदि शादी-विवाह की बात चल रही हो तो वहाँ मृत्यु की बात नहीं करनी चाहिए। यदि मृत्यु के प्रसंग की चर्चा चल रही हो तो वहाँ शादी-विवाह की बात नहीं करनी चाहिए।
इस प्रकार मानव की वाणी में कठोरता, असत्यता, चुगली एवं प्रसंग के विरुद्ध वाणी – ये चार दोष नहीं होने चाहिए। इन चार दोषों से युक्त वचन बोलने से बोलनेवाले को पाप लगता है।