Sunday, April 25, 2010

जिस किसी कामको करो,उसको सुचारुरुपसे करो,जिससे आपके मनमें सन्तोष हो और दूसरे भी कहें कि बहुत अच्छा काम करता है।लिखना हो,पढ़ना हो,बिक्री करना हो,खरीदारी करना हो आदि-आदि संसारका जो कुछ काम करना हो,उसको बड़े सुचारुरुपसे करो।माता-बहनें रसोई बनायें तो अच्छी तरह से बनायें।सामग्री भले ही कैसी हो,पर चीज बढ़िया बनायें।सबको कैसे संतोष हो-ऐसा भाव रखकर सब काम करें।

Whatever work you do, do it satisfactorily, whereby you feel contented in your mind, and others also feel that he is doing a fine job. Whether it be writing, reading, selling, buying, etc., whatever work there is in this life, do it well and with great joy. Mothers-sisters, when you cook, do it well. Whatever may be the available supplies, but make great things. Do all work with the sentiments, that how can I make everyone satisfied

किसी गरीबके सामने गर्वभरी वाणी बोलना,उसके साथ रुखा और कठोर व्यवहार करना भगवान् का अपराध है;क्योंकि उस गरीबके रुपमें भगवान् ही तुम्हारे सामने प्रकट हैं।अतएव सभीके साथ नम्र होकर मधुर वाणी बोलो;अपनी विनय-विनम्र पीयूषवर्षिणी वाणी तथा व्यवहारके द्वारा सर्वत्र शीतल मधुर-सुधाकी धारा बहा दो और यह सब करो केवल भगवान् की सेवा के लिये।तुम्हारी सेवासे भगवान् बड़े प्रसन्न होंगे और उनकी प्रसन्नता तुम्हारे जीवनको परम सफ़ल बना देगी।

In front of someone poor, to speak with arrogance, to speak and relate with them roughly and with harshness is a slander on God. God Himself has appeared in front of you in the form of the poor person. Therefore speak with humility and with a sweet and pleasant voice. And relating with others in a courteous-mild, nectar-filled voice, let the cool, sweet-ambrosia flow and do all of this to serve God. God will be very pleased by your service and his happiness will make your life an eternal success.

कष्टमें हमें भगवान् याद आते हैं।हमलोग संसारके तुच्छ,नाशवान् भोगोंके पीछे भगवान् को भूले रहते हैं।इसलिये बीच-बीचमें कष्ट देकर भगवान् हमें चेतावानी देते रहते हैं कि मुझे भूलो मत,नहीं तो बड़ी दुर्दशा होगी,यह मनुष्यशरीर भोगोंके लिये नहीं मिला है,मुझे प्राप्त करने के लिये ही मिला है-इसलिये इसे व्यर्थ कामोंमें न गँवाओ।

In difficulties, we remember God. We forget God in the midst of running after worldly sense enjoyments that are temporary and worthless. Therefore inbetween by giving us some difficulties, God is alerting us to not forget Him. Without that our state would be terrible. This human body has not been received for sense enjoyments. It has been received only to realize Me - therefore do not waste it away on useless activities.

साधन से न तो निराश होना चाहिए और न ही हार स्वीकार करनी चाहिए।जो साधक साधन करने से निराश नहीं होता और हार स्वीकार नहीं करता,वह अवश्य सिद्धि पाता है।असफ़लता का कारण एकमात्र साधन से निराश होना और हार स्वीकार करना है,जो साधक की अपनी ही असावधानी है।

One must not feel dejected by their spiritual disciplines nor accept a defeat. an aspirant that is not feeling a sense of hopelessness and does not accept defeat, he will definitely attain perfection. The reason for lack of success is due to disappointment with one's spiritual discipline and due to accepting defeat, which is an aspirant's own lack of caution and alertness!

हे नाथ!तुम्हारे सिवा हम-सरीखे पामर गरीब दीनों को कौन आश्रय देगा?अपनी ही ओर देखकर ही अब तो हमें खींचकर चारु चरणोंमें डाल दो।प्रभो! हमें मोक्ष नहीं चाहिये,तुम्हारा कोई धाम नहीं चाहिये,स्वर्ग या मर्त्यलोकमें कोई नाम नहीं चाहिये।हमें तो बस,तुम अपनी चरणरजमें बेसुध होनेवाले पागल बना दो।तुम्हारा नाम लेते ही नेत्रोंसे आनन्दके आँसुओंकी धारा बहने लगे,गद्गद् होकर वाणी रुक जाये और समस्त शरीर रोमाञ्चित हो जाये।

Thursday, April 22, 2010

भगवान् के प्रेमका मूर्तिमान् विग्रह बने हुए भक्तको सारा संसार परम प्रेममय और परम आनन्दमय प्रतीत होने लगता है।वह जिस मार्गसे जाता है उसी मार्गमें श्रद्धा,प्रेम,भक्ति,आनन्द,समता और शान्तिका प्रवाह बहने लगता है।ऐसे भक्तको अपने ऊपर धारणकर धरणी धन्य और सनाथ होती है,पितरगण प्रमुदित हो जाते हैं और देवता नाचने लगते हैं।
यह नियम है कि जिसके मन की बात पूरी होती है,वह उससे प्रेम करने लगता है जिसने उसके मन की बात पूरी की।अत: आस्तिक को अपनी बात पूरी न होने में विशेष कृपा का अनुभव इस कारण होता है कि अब मेरे प्यारे ने अपने मन की बात की है,अत: वे मुझसे अवश्य प्रेम करेंगे।प्रेमास्पद का प्रेम ही तो प्रेमी का सर्वस्व है।इस दृष्टि से आस्तिक किसी भी अवस्था में क्षुब्ध नहीं होता।
तुम्हारे द्वारा किसी प्राणीकी कभी कॊई सेवा हो जाय तो यह अभिमान न करो कि मैंने उसका उपकार किया है।यह निश्चित समझो कि उसको तुम्हारे द्वरा बनी हुई सेवासे जो सुख मिला है,वह निश्चय ही उसके किसी शुभ कर्म का फल है;तुम तो उसमें केवल निमित बने हो।ईश्वरका धन्यवाद करो,जिसने तुम्हें किसी को सुख पहुँचानेमें निमित बनाया और उस प्राणीका उपकार मानो,जिसने तुम्हारी सेवा स्वीकार की।
किसी भक्त ने कहा है-’हे नरकासुरका अन्त करनेवाले प्रभो! आप चाहे मेरा स्वर्गमें निवास कर दें,चाहे पृथ्वीपर निवास कर दें और चाहे नरकोंमें निवास कर दें।इसके लिये मैं मना नहीं करता।मेरी तो एक ही माँग है कि शरदऋतुके कमलकी शोभाको हरनेवाले आपके जो चरण हैं,उनको मृत्यु-अवस्थामें भी भूलूँ नही।आपके चरण मेरेको सदा याद रहें।’
हमारेपर भगवान् की कृपानिरन्तर होरही है परहम उधर देखतेही नहीं!हमउस कृपाकी अवज्ञा करते हैं,निरादर करते हैं,फिरभी भगवान् अपना कृपालु स्वभाव नहीं छोड़ते,कृपा करतेही रहते हैं।बालक माँकाकोई कम निरादर नहीं करता।कहीं पेशाब कर देता है,कहीं थूकदेता है पर माँ सब कुछ सहलेती है।हमभी उल्टे चलनेमें बालककी तरह तेज हैं,पर कृपा करनेमें भगवान् भी माँसे कम तेजनहीं हैं!इसलिये हमें उनकी कॄपाका भरोसा रखना चाहिये।
हे नाथ! हमें आपके चरित्र अच्छे लगें,आपकी लीला अच्छी लगे,आपके गुण अच्छे लगे,तो यह आपके कृपा ही है,हमारा कोई बल नहीं है।आज जो हम आपका नाम ले रहे हैं,आपकी चर्चा सुन रहे हैं,आपमें लगे हुए हैं,यह केवल आपकी ही कृपा है।काम,क्रोध,लोभ,मोह,मद जैसे कितने-कितने अवगुण भरे हुए हैं और कैसा कलियुग का समय है! ऐसे समयमें आपके तरफ वृति होती है तो यह केवल आपकी कृपा है।
हमारे अधिकार तभी सुरक्षित रह सकते हैं,जब हमारे साथी कर्तव्य-परायण हों;और हमारे साथियों के अधिकार तभी सुरक्षित होंगे,जब हम कर्तव्यनिष्ठ हों। हमारे कर्तव्यनिष्ठा ही हमारे साथियों में कर्तव्य परायणता उत्पन्न करेगी;क्योंकि, जिसके अधिकार सुरक्षित हो जाते हैं,उसके हृदय में हमारे प्रति प्रीति स्वत: उत्पन्न हो जाती है,जो उसे कर्तव्य-परायण होने के लिए विवश कर देती है।
आत्मबल में श्रद्धा उत्पन्न होते ही कायर शूरवीर हो जाते हैं, प्रमादी एवं आलसी उद्यमी हो जाते हैं, मूर्ख विद्वान हो जाते हैं, रोगी निरोग हो जाते हैं, दरिद्र धनवान हो जाते हैं, निर्बल बलवान हो जाते हैं और जीव शिवस्वरूप हो जाते हैं।
यदि प्राणी व्यथित हृदय से उन्हें पुकारे तो उसे सबकुछ मिल सकता है।इस दृष्टि से अपने को निर्दोष बनाने में प्रार्थना का मुख्य स्थान है।वह प्रार्थना सजीव तभी होती है,जब की हुई भूल को न दुहरा कर प्रायश्चितपूर्वक प्रार्थना की जाय।

Tuesday, April 20, 2010

जब प्राण तन से निकले...

इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकले...
गोवोंद नाम लेकर तब प्राण तन से निकले...
श्री गंगा जी का तट हो या युमना का बंसी वाट हो....
मेरा सावरा निकट हो जब प्राण तन से निकले...
इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकले...
पीताम्बरी कासी हो, छबी मन मै ये बसी हो...
होठो पे कुछ हसी हो, जब प्राण तन से निकले...
गोवोंद नाम लेकर तब प्राण तन से निकले...
जब कंठ प्राण आये, कोइयी रोग न सताये...
यम दरस न दिखाये, जब प्राण तनसे निकले...
गोवोंद नाम लेकर तब प्राण तनसे निकले...
उसवक्त जल्दी आना, नहीं स्याम भूल जाना...
राधे को साथ लाना, जब प्राण तन से निकले...
गोवोंद नाम लेकर तब प्राण तन से निकले...
एक भक्त की है अर्जी खुद गरज की है जर्गी ...
आगे तुम्हारी मर्जी, जब प्राण तन से निकले...
गोवोंद नाम लेकर तब प्राण तन से निकले...
इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकले...

Monday, April 19, 2010

अन्त:करणमें यदि प्रसन्नता न मालूम हो तो न हो,केवल सच्ची कल्पना ही कर लो कि अन्त:करण प्रसन्नता से भरा हुआ है तो वह संकल्प ही सत्य हो जायेगा। भगवान् की दयासे वह संकल्प सत्य हो जाता है,इसमें कोई संदेह नहीं।
संतोंके दर्शन,स्पर्श,उपदेश-श्रवण और चरणधूलिके सिर चढ़ानेकी बात तो दूर रही,जो कभी अपने मनसे संतोंका चिन्तन भी कर लेता है,वही शुद्धान्त:करण होकर भगव्तप्राप्ति का अधिकारी बन जाता है।
दोष को देखना है,अपने में उसकी स्थापना नहीं करना है,अपितु दोष देखने के पश्चात् तुरन्त निर्दोषता की स्थापना कर अचिन्त हो जाना है और दोष को पुन: न दोहराने का दृढ़ संकल्प करना है। उसके पश्चात् कोई कहे कि तुम दोषी हो,तो प्रसन्नचित्त होकर कह दो कि अब नहीं हूँ,पहले था।अर्थात भूतकाल के दोषों को वर्तमान में मत देखो।
दोष को देखना है,अपने में उसकी स्थापना नहीं करना है,अपितु दोष देखने के पश्चात् तुरन्त निर्दोषता की स्थापना कर अचिन्त हो जाना है और दोष को पुन: न दोहराने का दृढ़ संकल्प करना है। उसके पश्चात् कोई कहे कि तुम दोषी हो,तो प्रसन्नचित्त होकर कह दो कि अब नहीं हूँ,पहले था।अर्थात भूतकाल के दोषों को वर्तमान में मत देखो।

Sunday, April 18, 2010

सन्त संदेश--प्राण प्यारे के प्रिय साधको! सभी साधक साध्य के होकर रहें,उन्हीं की महिमा को अपनाकर सभी के लिये उपयोगी हो जाएँ,यह माँग जीवन की माँग है।अनुपयोगी वही रहता है जिसे अपने लिये किसी से कुछ चाहिए।अपना करके सृष्टि में कुछ नहीं है।’अपने’ अपने में अवश्य हैं।अपने में अपनी प्रियता स्वत: होती है,की नहीं जाती।केवल प्रेमास्पद के अस्तित्व और महत्व को अपनाना है।अकिंचन-शरणानन्द
जैसे घुटनोंके बलपर चलनेवाला छोटा बालक कोई वस्तु उठाकर अपने पिताजीको देता है तो उसके पिताजी बहुत प्रसन्न हो जाते हैं और कहते हैं कि बेटा! तू इतना बड़ा हो जा अर्थात् मेरेसे भी बड़ा हो जा।क्या बालकके देनेसे पिताजीको कोई विशेष चीज मिल गयी?नहीं।केवल बालकके देनेके भावसे ही पिताजी राजी हो गये।ऐसे ही भगवान् को किसी वस्तुकी कमी नहीं है,फिर भी भक्तके देनेके भावसे वे प्रसन्न हो जाते हैं।
हे प्रभो! थोड़ी-सी योग्यताआते ही हमेंअभिमान होजाता है! योग्यतातो थोड़ी होती है,पर मान लेते हैंकि हमतो बहुत बड़े होगये,बड़े भक्त बन गये,बड़े त्यागी,बन गये!भीतरमें यह अभिमानभरा है नाथ! आपकी ऐसीबात सुनी हैकि आप अभिमानसे द्वेश करते हो और दैन्यसे प्रेम करते हो।अगर आपको अभिमान सुहाता नहीं हैतो फिरउसको मिटादो,दूर करदो।बालककीचड़से सना होऔर गोदीमें जाना चाहता होतो माँही उसको धोयेगी और कौनधोयेगा?
मोह के कारण ही तुम सांसारिक भोग-सुखोंको चाहते हो और सांसारिक दु:खोंको भयानक मानकर उनसे भागना चाहते हो।विस्वास करो,जो सुख भगवान् का विस्मरण कराकर भगवान् की ओर अरुचि उत्पन्न कर दे,उसके समान कोई भी हमारा शत्रु नहीं है।और जो दु:ख विषयोंसे हटाकर भगवान् की ओर लगा दे,उसके समान हमारा कोई मित्र नहीं है।
भगवान् सर्वज्ञ हैं।अपना सच्चा हित किसमें है यह वही जानते हैं,अतएव उनपर खूब विश्वास करके किसी बात की चिन्ता न रखे।जैसे गूँगा मिश्री खाकर आनन्दमें मुग्ध हो जाता है,वैसे ही भगवान् की दयाका विचार करके उसीमें निमग्न हो जाना चाहिये और किसी बातका विचार नहीं करना चाहिये।भगवान् के राजीमें राजी रहे।फिर भगवान् चाहे खड्डेमें क्यों न डाल दें।उसमें कोई आपति नहीं। उसीमें प्रसन्न रहे।

Saturday, April 17, 2010

सभी बुरे विचार एवं दुर्गुण भगवान् के मार्गपर चलना प्रारम्भ कर देनेपर अपने-आप छूट जायेंगे।धन कमानेका उद्देश्य रखनेवाला एक पैसेके नाशको भी सह नहीं सकता।वैसे ही जो भगवान् को उद्देश्य बनाकर चलेगा,उसे भगवान् की प्राप्तिकी विरोधी बातें अच्छी ही नहीं लगेंगीं।मामूली दुर्गण भी उसे बहुत खलेंगे और उन्हें वह निकाल फेंकेगा।
जिस समय मन या हृदय एकदम पिघल जाता है,उस समय हृदयमें धारण किये गये भाव स्थायी रुपसे सुस्थिर हो जाते हैं।इसलिये भगवान् के प्रति प्रेम और श्रद्धा अपने हृदयमें स्थापित करके-रोम-रोम-में परिपूर्ण करके करुणाभावसे समय-समयपर भगवान् के लिये रोना चाहिये,व्याकुल होना चाहिये।इसके लिये लगन होना चाहिये।
प्रेममें मगन होकर भगवान् का भजन लगनसे करे और भगवान् के आगे करुणाभावसे रोता रहे-’हे नाथ! हे हरि! हे गोविन्द! हे वासुदेव! हे नारायण! मुझे तो केवल आपका ही सहारा है,मेरा आपके बिना और कोई आधार नहीं है।प्रभु! मेरेमें न ज्ञान है,न भक्ति है,न वैराग्य है,और न प्रेम ही है।मेरेमें कुछ भी तो नहीं है!मैं तो केवल आपकी शरण हूँ,वह भी केवल वचनमात्रसे!आप ही दया करके मुझे सब प्रकारसे अपनी शरणमें लें।
वे तो परम भाग्यशाली हैं कि जिन्हें ऐसा भास होता है कि भाई,मैंने ममता तोड़ी नहीं,फिर न जाने कैसे टूट गई! मैंने तो आत्मीयता जोड़ी नहीं,फिर न जाने कैसे जुड़ गई।दोषों की निवृति का भास न हो और गुणों की अभिव्यक्ति का भास न हो,तब समझना चाहिए कि निर्दोषता से एकता हो गई।
आप कह सकते हो कि बड़ा परिवार है,रोटी-कपड़ेकी भी तंगी है,काम चलता नहीं फिर इच्छा किये बिना कैसे रहे?तो इच्छा करनेसे वस्तुएँ थोड़े ही मिलेंगी।वस्तुएँ तो काम करनेसे मिलेंगी।इसलिये वस्तुओंकी इच्छा न करके काम करने की इच्छा करो।निकम्मे,निरर्थक मत रहो।यह जो संग्रह करनेकी इच्छा है,इसका त्याग कर दो तो जो आपके भाग्यमें लिखा नहीं है,वह आपके पास आ जायेगा।
दूसरोंको सुख पहुँचाना,उनके दु:खको अपना दु:ख बनाकर अपना सुख उन्हें दे देना-इस प्रकारका क्षणभरका मनोरथ भी महान् पुण्यरुप है!दूसरेके दु:खको सर्वथा अपना बना लेना तो अत्यन्त ही महत्वकी बात है,उसके दु:खका जरा-सा हिस्सा बँटाना भी बहुत बड़ा सौभाग्य है।इसीमें मानवताका विकास है।सत्पुरुषोंको अपने दु:खकी परवा ही नहीं होती।वे तो दूसरोंके दु:खसे ही दु:खी होते हैं।
अगर आपको निकम्मा ईश्वर प्यारा लगता हो,वह निष्ठुर भी हो,निकम्मा भी हो,हमें न भी चाहता हो,तब भी अगर आप उसे अपना कह सकें,तो स्मृति जगेगी।आज मालूम है,क्या है?एक सज्जन बीमार हुए।उनकी स्त्री ने कहीं सुन लिया कि भगवान् सबकी रक्षा करते हैं।बस.खूब पूजा हुई,पति अच्छे हो गये।दोबारा बीमार हुए,खूब पूजा हुई,मर गए।ठाकुरजी को उठाकर फेंक दिया।
हमको तो नाथ!दयाकर अपना वह प्रेम दो जिससे अश्रु-पूर्ण-लोचन और गद्गदकण्ठ होकर निरन्तर तुम्हारा नाम-गुणगान करते रहें;वह शक्ति दो,जिससे जन्म-जन्मान्तरमें कभी तुम्हारे चरणकमलोंकी विस्मृति एक क्षणके लिये स्वप्नमें भी न हो,तुम्हारा नाम लेते हुए आन्नदसे मरें और तुम्हारी इच्छासे जिस योनिमें जन्में तुम्हारी ही छ्त्र छायामें रहें।
महात्माओंका तो कहना ही क्या है,उनकी आज्ञा पालन करनेवाले मनुष्य भी परमपदको प्राप्त हो जाते हैं। भगवान् स्वयं भी कहते हैं कि जो किसी प्रकारका साधन नहीं जानता हो,वह भी महान् पुरुषोंके पास जाकर उनके कहे अनुसार चलनेसे मुक्त हो जाता है।

Thursday, April 15, 2010

Firstly, worldly sense pleasures are not received according to our wish / desire, and what we get is also incomplete, and even on getting it, it quickly comes to an end. However, on having exclusive desire for God, He is surely attained.
यदि कहें कि किस बातको लेकर खुश रहें तो इसका उत्तर यह है कि भगवान् की दयाको देख-देखकर।देखो,भगवान् की तुमपर कितनी दया है। अपार दया समझकर इतना आनन्द होना चाहिये कि वह हृदयमें समावे नहीं।हर समय आनन्दमें मुग्ध रहें।बार-बार प्रसन्न होवें।अहा प्रभुकी कितनी दया है।यही सबसे बढ़कर साधन है और यही भक्ति है एवं इसीका नाम शरण है।
भगवान् का नाम मीठा लगे,प्यारा लगे। प्यारा न लगे तो भगवान् से कहो कि ’हे नाथ! मुझे आपका नाम प्यारा लगे,हे प्रभु! मैं आपको भूलूँ नहीं।’मिनट-मिनटमें ,आधे-आधे मिनटमें कहते रहो कि ’हे नाथ! आपको भूलूँ नहीं।

सभीको प्रेमभरी मधुरता और सहानुभूतिभरी आँखोंसे देखो। याद रखो- सुखी जीवनके लिये प्रेम ही असली खुराक है। संसार इसीकी भूखसे मर रहा है! अतएव प्रेम वितरण करो- अपने हॄदयके प्रेमको हृदयमें ही मत छिपा रखो। उसे उदारताके साथ बाँटो। जगत्का बहुत-सा दु:ख दूर हो जायगा।

एक अच्छे गृहस्थ सेठ थे।एक साधु उनके घर गये तो पूछा-यह मोटर किसका है?सेठ बोला-ठाकुरजीकी!ये किसके बच्चे खेल रहे है?ठाकुरजीकी!ये लोग कौन हैं?ठाकुरजीके! पूरा मकान देखते-देखते ऊपर गये तो वहाँ मन्दिर था।यह मन्दिर किसका है?ठाकुरजीका!ये सोने-चाँदीके बर्तन किसके हैं?ठाकुरजीके!ये वस्त्र किसके हैं?ठाकुरजीके।साधुने ठाकुरजीकी तरफ संकेत करके पूछा-ये किसके हैं?सेठ बोला-ये तो मेरे हैं!
"आप जानते हैं रस किसे कहते हैं? जिससे कभी तृप्ति न हो,जिसको कभी निवृति और जिसकी कभी तृप्ति न हो।वह रस प्रियता में, प्रियता आत्मीयता में,आत्मीयता विश्वास में और विश्वास श्रद्धा में और श्रद्धा आस्था में निहित है।इस दृष्टि से हम सब अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार अपनी-अपनी परिस्थिति के अनुसार किसीमें आस्था करें,पर वह एक हो।एकमें आस्था होने से प्रभुमें आस्था हो जाती है।

Wednesday, April 14, 2010

निर्दोषता की अभिव्यक्ति तभी सुरक्षित रह सकती है,जब किसी के प्रति वैर-भाव की गन्ध तक न रहे।यह तभी सम्भव है जब किसी के प्रति भी दोषी भाव न रहे,अर्थात् अपने प्रति होने वाली बुराई का कारण भी अपने को ही मान लिया जाय।जिन्हें दोषी मान लिया है,यदि किसी कारण उन्हें निर्दोष माननेमें असमर्थता प्रतीत हो,तो उन्हें अनजान बालककी भाँति क्षमा कर दिया जाय।
अपनेमें योग्यता प्रत्यक्ष दीखती है,इसलिये अभिमानसे बचना बहुत कठिन होता है।मनुष्यको प्रत्यक्ष दीखता है कि मैं अधिक पढ़ा-लिखा हूँ,मैं गीता जाननेवाला हूँ,मैं कीर्तन करनेवाला हूँ,इसलिये वह फँस जाता है।अगर यह दीखने लग जाय कि यह सब केवल भगवान् की कृपासे हो रहा है तो निहाल हो जाय! ऐसा चेत भी भगवान् की कृपा से ही होता है।जिनको चेत न हो उनपर दया आनी चाहिये।वे भी चेतेंगे,पर देरी से!
भगवान् का मत वही भक्त का मत।भगवान् के भावोंका प्रचार करना ही भक्त का मत होता है।उसके सामने उसे कोई चीज प्रिय नहीं होती।यह एकदम निष्कामभाव है कि भगवान् के भावोंको कर्तव्य समझकर अपनेमें ग्रहण करना और दुनियामें प्रचार करना।
यदि निर्भरताकी कमीके कारण कभी ऐसा जान पड़े कि हमारे हृदयमें कोई कुविचार प्रवेश करना चाहता है तो हमें कातर स्वर से ’हे नाथ! हे नाथ!’ पुकारना चाहिये।प्रभुका आश्रय लेनेसे चिन्ता,भय,शोक एवं सब प्रकारके दुर्गुण-दुराचार मूलसहित नष्ट हो जाते हैं तथा सद्गुण,सदाचार एवं शान्ति आदिका स्वत: ही विकास होता है।
संसारके भोग पहले तो इच्छानुसार प्राप्त नहीं होते,प्राप्त भी अधूरे ही होते हैं और प्राप्त होकर निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं;परंतु अनन्य इच्छा करनेपर भगवान् निश्चय ही प्राप्त होते हैं।

Tuesday, April 13, 2010

जो भगवान् का भक्त बनना चाहता है,उसे सबसे पहले अपना हृदय शुद्ध करना चाहिये और नित्य एकान्तमें भगवान्से यह कातर प्रार्थना करना चाहिये कि हे भगवन्!ऎसी कृपा करो जिससे मेरे हॄदयमें तुम्हें हर घड़ी हाजिर देखकर तनिक भी पापवासना भी उठने और ठहरने न पावे।तदन्तर उस निर्मल हृदय-देशमें तुम अपना स्थिर आसन जमा लो और मैं पल-पलमें तुम्हें निरख-निरखकर निरतशय आनन्दमें मग्न होता रहूँ।
पिघले हुए चपड़ेमें जैसा भी रंग डाल दिया जाय,वह वैसा ही रंग वाला बन जाता है।इसी तरह किसीका हृदय जब पिघल जाता है तब बहुत ही अच्छा रंग चढ़ता है।जिन पुरुषोंका हृदय भगवान् के विरह की व्याकुलता में पिघला है,उनके चरित्र को करुणाभाव या प्रेमभाव से याद करे।ऐसा करने से हृदय एकदम पिघल जाता है।यदि आदमी का हृदय व्याकुल हो जाय तो उसका जीवन बहुत ही बदल जाय।
जैसे छोटा बच्चा केवल माँका ही दूध पीता है,जल-अन्न आदि कुछ नहीं लेता;अगर वह रोगी हो जाय तो माँको दवा लेनी पड़ती है।इस प्रकार केवल परमात्मतत्वको जाननेकी उत्कण्ठावाले साधक सन्त-महात्माओंकी कृपा के आश्रित रहते हैं,अपना कुछ भी अभिमान नहीं रखते।सन्त-महात्मा जो कुछ कहें-उसीके अनुसार जीवन बनाना है,ऐसा जिनका भाव हो जाता है,उन साधकोंके उद्धारके लिये सन्तोंको उद्योग करना पड़ता है।
हम लोग अपराध करनेसे नहीं हारते हैं और जब उसके परिणाममें डूबने लगते हैं तब अपना ही विकार अपनेको आगे नहीं बढ़ने देता है।लेकिन उबारनेवाले कभी नहीं थकते।कोई बात नहीं।प्यार करनेवाले माता-पिता हमारे मौजूद हैं।उन्हींके बच्चे तो हम हैं।सजाके,सँवारके,सुन्दर बनाके उन्होंने दुनियामें भेजा,कीचडमें हम गिर गये।कपड़े गन्दे हो गए।तो भी वे करुणामयी माँ,हम गिरे-पड़े,रोते हुए बच्चेको उठानेमें कभी पीछे नहीं हटते।
’हे नाथ! मेरे कर्मोंका आप कितना खयाल रखते हैं कि मैंने न जाने किस-किस जन्ममें,किस-किस परिस्थितिमें परवश होकर क्या-क्या कर्म किये हैं,उन सम्पूर्ण कर्मोंसे सर्वथा रहित करनेके लिये आप कितना विचित्र विधान करते हैं! मैं तो आपके विधानको किञ्चिन्मात्र भी समझ नहीं सकता।इसलिये हे नाथ! मैं उसमें अपनी बुद्धि क्यों लगाऊँ?मेरेको तो केवल आपकी तरफ ही देखना है।

Monday, April 12, 2010

अगर आप कहें कि हम अपने असत् को अपने प्रिय जनों के सामने रखेंगे तो हमारा आदर नहीं रहेगा।अगर आपको इतना ध्यान है कि हमारा आदर बना रहे,तो उस असत् को निकाल दो।प्रश्न ही नहीं आयेगा।लेकिन अपने जाने हुए असत् का त्याग भी न कर सको,प्रकट भी न कर सको,और आदर भी चाहो।तो सच मानो,धीरे-धीरे जो आप अनादर से बचना चाहते हो,यह बहुत बड़े अनादर की तैयारी है।
हम जानकर उद्दोगपूर्वक छिप-छिपकर पाप करते हैं।पापजन्य रुपये-पैसे,सुख-आराम मिलनेपर खुशी मनाते हैं कि हम निहाल हो गये!मौज हो गयी!इनके दोषों की तरफ हमारी दोषदृष्टि जाती ही नहीं,जिससे हम फँस जाते हैं,चौरासी लाख योनियों में जाते हैं,दु:ख भोगते हैं,कराहते हैं,चिल्लाते हैं,पुकारते हैं।फिर भी उधर ही जाने का मन करता है!क्या करें... नाथ!आप ही हमें अपनी तरफ खींच लें।
भगवान् के समान कोई सर्वसमर्थ नहीं है और कोई परम दयालु नहीं है।ऐसे भगवान् के रहते हुए भी आप दु:ख पा रहे हैं,आपकी मुक्ति नहीं हो रही है तो क्या गुरु आपको मुक्त कर देगा?क्या गुरु भगवान् से भी अधिक सर्वशक्तिमान् और दयालु है?कोरी ठगाई के सिवाय कुछ नहीं होगा!जबतक आपके भीतर अपने कल्याण की लालसा जाग्रत नहीं होगी,तबतक भगवान् भी... आपका कल्याण नहीं कर सकते,फिर गुरु कैसे कर देगा?
समस्त जगत्को भगवान् की प्रजा समझकर प्रेम करे तथा इससे बढ़कर सबको अपनी आत्मा समझकर प्रेम करे और इससे भी बढ़कर सबको भगवत्स्वरुप समझकर प्रेम करना चाहिये।

Sunday, April 11, 2010

प्रेमकी इति नहीं है।प्रथम भगवान् में प्रेम बढ़ता है तो अश्रुपात होता है,वाणी गद्गद् हो जाती है।जब आगे बढ़ जाता है,तब प्रेम में बेहोश हो जाता है। और आगे बढ़े तो होश आ जाता है फिर भगवान् मिल जाते हैं।
जैसे बच्चा माँसे दूर चला जाय तो माँ को उसकी बहुत याद आती है।माताओं की ऐसी बात सुनी हैं।दीपावली,अक्षय तृतीया आदि त्यौहार आते हैं तो माताएँ कहती हैं कि क्या बनायें? लड़का तो घर पर है नहीं,अच्छी चीज बनाकर किसको खिलायें?ऐसे ही भगवान् के लड़के हमलोग चले गये विदेशमें!अब भगवान् कहते हैं कि क्या करुँ?क्या दूँ?लड़का तो घरपर ही नह...ीं है!वह तो धन-सम्पति की तरफ लगा है,खेल-कूद में लगा है!
तुम यदि अपनेको भगवान् के प्रति सौंप देते हो,अपनी इच्छाओंको भगवान्की इच्छामें मिला देते हो एवं अपने ज्ञान और बलको भगवान् के ज्ञान और बल का अंश मान लेते हो तो निश्चय समझो-फिर तुम भगवान् की मङ्गलमयी इच्छासे मङ्गलमय बनकर केवल अपना ही कल्याण नहीं करोगे;तुम्हारा प्रत्येक विचार,तुम्हारा प्रत्येक निश्चय और तुम्हारी प्रत्येक क्...रिया अखिल जगत् का मङ्गल करनेवाली होगी।
अपने से सुखियों को देखकर आप प्रसन्न हो जायं।अपने से दुखियों को देख कर आप करुणित हो जायं।जिस हृदय में करुणा निवास करती है उस हृदयमें भोग की रुचि नहीं रहती।और जिस चित्त में प्रसन्नता निवास करती है,उसमें काम की उत्पति नहीं होती।आप हो जायेंगे भोग की वासना से रहित और काम से रहित।यह भौतिक जीवन की पराकाष्टा हो गई।
प्रेमकी इति नहीं है।प्रथम भगवान् में प्रेम बढ़ता है तो अश्रुपात होता है,वाणी गद्गद् हो जाती है।जब आगे बढ़ जाता है,तब प्रेम में बेहोश हो जाता है। और आगे बढ़े तो होश आ जाता है फिर भगवान् मिल जाते हैं।
यदि अभिमान न छूटॆ तो इसके लिये आर्तभावपूर्वक भगवान् से ही प्रार्थना करनी चाहिये कि ’हे नाथ! मैं अभिमान छोड़ना चाहता हूँ,पर मेरे से छूटता नहीं,क्या करुँ!’ तो वे छुड़ा देंगे।जो काम हमारे लिये कठिन-से-कठिन है,वह भगवान् के लिये सुगम-से-सुगम है।अत: अपनेमें कोई दोष दीखे तो भगवान् को ही पुकारना चाहिये,अपने दोष को महत्व न देकर श...रणागतिको ही महत्व देना चाहिये।
जो भजन,ध्यान आदि साधन करके मुक्ति पाते हैं वे परिश्रम करके पेट भरनेवालों के समान हैं। और जो भगवान् के देने पर भी मुक्तिको ग्रहण न करके सबका कल्याण होने के लिये भगवान् के गुण,प्रेम,तत्व,रहस्य और प्रभावयुक्त भगवान् के सिद्दान्तका संसारमें प्रचार करते हैं,वे सबको खिलाकर भोजन करनेवालों के समान हैं।
जो भजन,ध्यान आदि साधन करके मुक्ति पाते हैं वे परिश्रम करके पेट भरनेवालों के समान हैं। और जो भगवान् के देने पर भी मुक्तिको ग्रहण न करके सबका कल्याण होने के लिये भगवान् के गुण,प्रेम,तत्व,रहस्य और प्रभावयुक्त भगवान् के सिद्दान्तका संसारमें प्रचार करते हैं,वे सबको खिलाकर भोजन करनेवालों के समान हैं।
विश्वास करो-तुम कितना ही अपराध करो,कितना ही धोखा दो,कितना ही उसका तिरस्कार और अपमान करो; भगवान् के सहज प्यार में कभी कोई अन्तर नहीं पड़ता।तुम्हीं जबतक मुख मोड़े रहोगे,उनके स्नेह-सुधा-सागर में अवगाहन का सौभाग्य नहीं पा सकोगे।पर याद रखो-जिस क्षण तुमने उनकी ओर मुख मोड़ा,तुम देखोगे कि तुम्हारे किसी अपराधका,किसी धोखेका और तुम्हारे द्वरा किये हुए किसी तिरस्कार का उन्हें स्मरण ही नहीं।

Wednesday, April 7, 2010

हमको भगवान् अवश्य मिलेंगे,ऐसा अपने मन में विश्वास करना चाहिये और ऐसा निश्चित विश्वास होने के साथ ही धीरता,वीरता,निर्भयता आदि गुण आ जाते हैं और उसका साधन उसी समय तेज होने लग जाता है।
इस तरह निश्चित कर ले कि यह दैवी सम्पदा के जो गुण हैं उत्तम गुण और आचरणों का समूह है, इनका धारण करना क्या कठिन है, ये तो बहुत उत्तम बात है।इससे मनुष्य वंचित कैसे रह सकता है,जब भगवान् की दया है तो दुर्गुण और दुराचार अपने पास आ ही कैसे सकते हैं?
भगवान् के प्रेममें ऐसा हो कि भगवान् का वियोग बर्दाश्त नहीं कर सके और भगवान् के बिना एक क्षण भी उसके प्राण रह नहीं सके
बालक जबतक जीता है, चाहे बड़ा हो जाये, माँ रक्षा करती ही है इश्वररुपी माँ मरनेवाली नहीं है, इसलिए हमें चिन्ता नहीं करनी चाहिए
प्रेम का विषय बड़ा अद्भूत है प्रेमकी बाते ऐसी हैं जहाँ हम - लोगोंकी पहुँच नहीं वे बातें लिखनेवाला लिख नहीं सकता अगर वह प्रेम प्राप्त हो जाय तब तो लिखना-पढ़ना सब बन्द हो जाता है वह अपने आपको सम्हाल ही नहीं सकता
क्षमाप्राथी वही हो सकता है,जो की हुई भूल को किसी भी प्रलोभन तथा भय से दुहराता नहीं है अपितु पूर्ण निर्दोषता ही जिसे अभीष्ट है,अथवा जो अपना सर्वस्व देकर निर्दोष रहना चाहता है।निर्दोषता को सुरक्षित करने के लिये जिसे बड़ी-से-बड़ी कठिनाई सहने में प्रसन्नता होती है,वही सच्चा क्षमाप्राथी है।
बार-बार उठे-वह कौन सा क्षण होगा! वह कौनसा काल होगा! जब मैं अपने सत्यको जानूँगा अथवा अपने सत्य में निवास करुँगा। इस प्रकार की जो लालसा है,वह धीरे-धीरे असत् की कामनाओं की जड़ काट देगी।
शरणागति का साधन क्या है? शरणागत होने वाले महानुभाव को यह भली प्रकार जान लेना चाहिए कि - १. किसको शरणागत होना चाहिए २. किसके शरणागत होना चाहिए और ३. किसलिए शरणागत होना चाहिए ?
सुख और आनन्द में क्या भेद है? सुख से दुःख दब जाता है और आनन्द से मिट जाता है दबा हुआ दुःख फिर उत्पन्न होता है किन्तु मिट जाने पर फिर उत्पन्न नहीं होता
प्रेम, प्रेम-पात्र करते हैं, प्रेमी नहीं, क्योंकि प्रेम वह कर सकता है, जिसको अपने लिए कुछ भी आवश्यकता न हो प्रेमी को प्रेम-पात्र की आवश्यकता होती है, अतः प्रेमी बेचारा प्रेम नहीं कर पाता
हर स्थिति में हर जगहप्रभु की सहज कृपा पर विश्वाश करने वाले भक्त को प्रत्येक परिस्थिति में उनकी अनुकम्पा का अनुभव होता हैं. स्थितिया बदलती रहते हैं परन्तु उसे अटल विश्वास रहता हैं की प्रभु सदेव उसका कल्याण ही करते हैं , इसलिए वहा सर्वदा प्रमुदित रहता हैं.
अपनी इच्छा को त्याग करके यह कह दो कि ’भगवन्! मैं अपने आपको तुम्हारी चाह पर छोड़ता हूँ।तुम जो चाहो सो करो।मेरी चाह अगर तुम्हारी चाह के विपरीत हो तो उसे कभी पूरी न करना।तुम्हारी चाह ही पूरी हो’।
हमारे दु:ख से यदि प्रेमास्पद सुखी होता हो,तो वह दु:ख हमारे लिये सुख है- यह प्रेमीका हार्दिक भाव होता है।ऐसे दु:ख को,ऐसी विपति को वह परम सुख,परम सम्पति मानता है।मानता ही नहीं,सर्वथा ऐसा ही अनुभव करता है।
सच्चे भक्तों का एकमात्र बल भगवानका भरोसा ही है वे पूर्ण निर्भरताके साथ भगवान् के होकर अपना जीवन केवल भगवानके चिन्तनमे ही लगाया करते हैं
"दूसरेके द्वारा तुम्हारा कभी कोई अनिष्ट हो जाय तो उसके लिए दुःख न करो; उससे अपने किये हुआ बुरे कर्मका फल समझो, यह विचार कभी मनमें मत आने दो कि " अमुकने मेरा अनिष्ट कर दिया है," यह निश्चय समझो कि ईश्वरके दरबारमें अन्याय नहीं होता... वह पूर्वक्रुक्त कर्मोका फल है
अगर हम शरीर की ममता सर्वथा छोड़ दें तो शरीर प्राय: बीमार नहीं होगा।मन की ममता छोड़ दें तो मन में बुराई नहीं रहेगी।बुद्धि की ममता छोड़ दें तो बुद्धि में बुराई नहीं रहेगी।ऐसे ही मैं-पन के साथ जो ममता(अपनापन) है,उसका त्याग कर दें तो कोई बुराई नहीं रहेगी।(
आप अपनी करनी की तरफ मत देखो, अपने पापोंकी तरफ मत देखो, केवल भगवान् की तरफ देखो जैसे विदुरानी भगवान् को छिलका देती हैं तो भगवान् छिलका ही खाते हैं छिलका खानेमें भगवान् को जो आनन्द आता है, वैसा आनंद गिरी खाने में नहीं आता कारण कि विदुरानी के मनमें यह भाव है कि भगवान् मेरे हैं
मनुष्य के सामने दो ही बातें हैं - या तो वह अपनी सभी कामनाएँ पूरी कर ले अथवा उनका त्याग कर दे ! वह कामनाओंको पूरी तो कर सकता ही नहीं, फिर उनको छोड़नेमें किस बातका भय! जो हम कर सकते हैं, उसको तो करते नहीं और जो हम नहीं कर सकते, उसको करना चाहते हैं - इसी प्रमाद से दुःख पा रहे हैं !
शरणागत भक्त को भगवान् का नाम स्वाभाविक ही बड़ा मीठा,प्यारा लगता है।अगर कोई पूछे कि तुम श्वास क्यों लेते हो? यह हवाको भीतर-बाहर करनेका क्या धन्धा शुरु कर रखा है? तो यही कहेंगे कि भाई! यह धन्धा नहीं है,इसके बिना हम जी ही नहीं सकते।ऐसे ही शरणागत भक्त भजन के बिना रह नहीं सकता।जिसको सब कुछ अर्पित कर दिया,उसके विस्मरण में परम व्याकुलता,महान् छटपटाहट होने लगती है।
जिस समय सुख का प्रलोभन नहीं होगा,सुख का भोग नहीं होगा,उसी समय जिसे आप दु:ख मानते हैं या अनुभव करते हैं नहीं रहेगा,अपितु वहाँ दु:खहारी होंगे। वे कहेंगे-तुम मेरे हो! तुम कहोगे-नहीं, तुम मेरे हो। वे कहेंगे-तुम प्यारे हो। तुम कहोगे-नहीं,तुम प्यारे हो। यही अगाध अनन्त रस है और इसी में मानव जीवन कि पूर्णता है।
दयामय परमात्माकी सब जीवों पर इतनी दया है कि सम्पूर्ण रुप से तो उस दया को मनुष्य समझ ही नहीं सकता। वह अपनी समझ के अनुसार अपने ऊपर जितनी अधिक-से-अधिक दया समझता है,वह भी नितान्त अल्प ही होती है। मनुष्य ईश्वर की दया का यथार्थ कल्पना भी नहीं कर सकता।
बैल किसान की बात मानता है। घोड़ा घुड़सवार की बात मानता है। कुत्ता या गधा भी अपने मालिक की बात मानता है। परंतु जो मनुष्य किन्हीं ब्रह्मवेत्ता को अपने सदगुरु के रूप में तो मानता है लेकिन उनकी बात नहीं मानता वह तो इन प्राणियों से भी गया-बीता है।
एकता जब आती हे , जब सब अपनी अपनी अकड छोड कर झुकना जान जाएं , नहीं तो विघटन रहता हे ! घमंड भरी आंखें, गलत गवही देने वाली जीभ , दुख देने वाले हाथ ,गलत रासते पर चलने वाले पैर भगवान को पसंद नहीं हें !
कभी भी अपना समय बेकार की मेगजीन पढ्ने में, बेकार की टीवी सीरीयल देखने में, बेकार की बातों में न गँवाया जायें। समय मिल गया तो माला से या मन से जप शुरु कर दिया जाय। जप हो गया तो सत्संग की कोई पुस्तक पढी जाय। वो भी पढ ली तो शान्त बैठे और श्वास बाहर-भीतर जाये उस पर जप किया जाये,
अगर हम शरीर की ममता सर्वथा छोड़ दें तो शरीर प्राय: बीमार नहीं होगा।मन की ममता छोड़ दें तो मन में बुराई नहीं रहेगी।बुद्धि की ममता छोड़ दें तो बुद्धि में बुराई नहीं रहेगी।ऐसे ही मैं-पन के साथ जो ममता(अपनापन) है,उसका त्याग कर दें तो कोई बुराई नहीं रहेगी।
नाम से मुझे बहुत लाभ हुआ। कई बार मुझे गिरने से बचाया, लोभ से बचाया। अनुभव तो क्या बतायें। जप करके अनुभव कर लें। नाम से सब कामनाओं की सिद्धि हो सकती है। भगवन्नाम और कृपा -- ये दो चीज जैसी परमार्थ में सहायक होती हैं और मेरे हुई हैं वैसी दूसरी नहीं। नाम सब कुछ करने में समर्थ है।
प्रश्न-संसारका सुख लेना कैसे मिटे?.....आप अपना पूरा बल लगायें।फिर भी न मिटे तो ’हे नाथ! हे नाथ!’ कहकर भगवान् को पुकारें।एक तो सांसारिक सुखासक्ति को मिटानेकी चाहना नहीं है और एक हम उसको मिटाते नहीं हैं ये दो बाधाएँ है।ये दोनों बाधाएँ हट जायँ,फिर भी सुखासक्ति न मिटे तो उस समय आप स्वत: परमात्मा को पुका...र उठोगे। सज्जनों उस प्रभुके आगे रो पड़ो तो सब काम हो जायेगा।

Guru Giyan

sadguru tumhare gyan ne jina sikha diya,
hamko tumhare pyar ne insa banadiya.

rahte hai jalve aapke nazro mai hargadhi,
masti ka jam aapne aisa piladiya.

sadguru tumhare gyan ne jina sikha diya,
hamko tumhare pyar ne insa banadiya.

bhula huvatha rasta bhatka huvatha mai,
rehma teri ne mujko kabil bana diya.

sadguru tumhare gyan ne jina sikha diya,
hamko tumhare pyar ne insa banadiya

jisne kiseko aajtak sajda nahi kiya,
vo sarbhi maine aapke dar pe jukadiya

jisdin se mujko aapne apna banaliya
dono jaha ko das ne sab se bhula diya

sadguru tumhare gyan ne jina sikha diya
hamko tumhare pyar ne insa banadiya

Thursday, April 1, 2010

Jaise sadhana me age badhoge to kabhi vyarth ki ninda hogi us se bhaybhit na hue to bemap prashansha milegi usme bhi ab uljhe to parmatma Sakshaktar ho jayega
संसार में हर वस्तु का मूल्य चुकाना होता हे ! बिना ताप किये कष्ट सहे आप अधिकार, पद, प्रतिष्ठा, सत्ता, सम्पति, शक्ति प्राप्त नहीं कर सकते, अत: आपको तपस्वी होना चाहिए आलसी, आराम पसंद नहीं! जीवन के समस्त सुख आपके कठोर पर्रिश्रम के नीचे दबे पड़े हैं, इसे हमेशा याद रखिए!
श्रीकृष्ण बँसी ऐसी बजाते कि जो दूध के लिए विरह में छटपटाने वाले बछड़े माँ आने पर दूध पीने लगते वे श्रीकृष्ण की बँसी सुनकर दूध पीना भूल जाते और बँसी का सुख पाकर तन्मय हो जाते। श्रीकृष्ण अपनी बँसी में अपने ऐसे प्राण फूँकते, प्रेम फूँकते कि सुनने वालों के चित्त चुरा लेते।
'नाम के समान न ज्ञान है, न व्रत है, न ध्यान है, न फल है, न दान है, न शम है, न पुण्य है और न कोई आश्रय है। नाम ही परम मुक्ति है, नाम ही परम गति है, नाम ही परम शांति है, नाम ही परम निष्ठा है, नाम ही परम भक्ति है, नाम ही परम बुद्धि है, नाम ही परम प्रीति है, नाम ही परम स्मृति है।'
भगवन्नाम की बड़ी भारी महिमा है।बार-बार भगवन्नाम-जप करने से एक प्रकार का भगवदीय रस, भगवदीय आनंद और भगवदीय अमृत प्रकट होने लगता है। जप से उत्पन्न भगवदीय आभा आपके पाँचों शरीरों (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय) को तो शुद्ध रखती ही है, साथ ही आपकी अंतरात्मा को भी तृप्त करती है।

आसक्ति मिटाने के ७ उपाय

दिसम्बर २००८ पूनम दर्शन दिल्ली में आयोजित पूनम दर्शन सत्संग में स्वामी सुरेशानन्द जी ने आसक्ति मिटाने के ७ उपाय बताये जो कि इस प्रकार है

आसक्ति मिटाने के ७ सरल उपाय हैं

१- दृढ निश्चय कर लिया जाये कि जो गुरुजी कहेंगे वो मुझे करना ही है बस।

२- वासना पूर्ति के मार्ग में चलने वालों का हम संग नही करेंगे। चाहे कोई भी क्युं न हो, वासना पूर्ति के मार्ग में जो जा रहे है उनकी दोस्ती नही करेंगे ।

3- कभी भी हम लोग ऐसा विचार नही करेंगे कि वासना पूर्ति करने वाले लोग सुखी है। बडे बंगले में रहते है , बडी कार में घूमते हैं, खाक सुखी है सुखी वो है भगवान कृष्ण ने गीता में बताया हैं काम के वेग को और क्रोध के वेग को सहन करते की शक्ति रखता है दम रखता है भगवान कहता है कि बो मेरे मत में सुखी है, "सहयोगी सहसुखी नरः" आप गीता में पढिये ५वे अध्याय में, भगवान नें यह नही कहा है कि काम विकार नही आयेगा क्रोध विकार आयेगा ही नही, लोभ कभी आयेगा ही नही, भगवान ने कहा कि काम का वेग क्रोध का वेग, इस वेग में जो बह नही जाता उसको सहन करने का दम अपने पास रखता है, भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि वो मेरे मत में सुखी है और मेरे मत में वो योगी है।

४- अपने भोजन में पवित्रता सदैव रखी जाये। लहसुन प्याज निश्चित ही तमो गुण बढाने वाली चीजें है परन्तु कोई बुजुर्ग है किसी को शारीरिक कोई तकलीफ़ है, खाँसी की तकलीफ़ है या श्वास की बिमारी है वो अगर आदमी थोडा लहसुन, प्याज खा ले तो उसको कोई पाप नही लगेगा, घुटने का दर्द रहता है किसी को, वात प्रकोप रहता है न वायु का तो शरीर में दर्द रहता है घुटनों में कमर में तो किसी को ऐसा दर्द हो घुटनों आदि में तो वह औषधवश लहसुन खा सकता है, अंगेजी दवाई खाये इससे तो अच्छा है की वो थोडी सी हरी लहसुन खा ले, इसका मतलब से नही कि जो जवान है वो लोग सोचे कि हम भी लहसुन प्याज खाये हा शारीरिक तकलीफ़ है तो ठीक है। लोग बडे कमाल के है शरीर का नाश हो ऐसी चीज नही खाते है लेकिन बुद्धि नाश हो जाये ऐसी चीज पैसे देकर खाते हैं। इसलिये भगवत गीता के ६ठे अध्याय से १७वे श्लोक में और १७वें अध्याय से ८वे, ९वे, और १०वे श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने आहार सम्बन्धी बहुत बढिया बातें बताई है।

५- अपने जीवन में स्थान की पवित्रता रखी जाये, ऐसी जगह में न जाये जहाँ जाने से रजोगुण बढे और तमो गुण बढे। ऐसी जगह जाने में आग्रह रखें जहाँ जाने से सत्व गुण बढें, भक्ति बढें, भगवान के नाम में रुचि बढें।

६- कभी भी अपना समय बेकार की मेगजीन पढ्ने में, बेकार की टीवी सीरीयल देखने में, बेकार की बातों में न गँवाया जायें। समय मिल गया तो माला से या मन से जप शुरु कर दिया जाय। जप हो गया तो सत्संग की कोई पुस्तक पढी जाय। वो भी पढ ली तो शान्त बैठे और श्वास बाहर-भीतर जाये उस पर जप किया जाये,

७- भगवान कपिल बताते है माता देवहूति को कि माँ आसक्ति निश्चित रूप से दुखः देने वाली है परन्तु वही आसक्ति अगर भगवान और भगवत्प्राप्त गुरु में होती है तो वो तारने वाली होती हैं।
प्रभात के समय साधकों को जो प्रेरणा होती है, वह शुभ होती है। तुम जब कभी व्यावहारिक परेशानियों में उलझ जाओ तो विक्षिप्त चित्त से कोई निर्णय मत लो। प्रातः काल जल्दी उठो। स्नानादि के पश्चात् पवित्र स्थान पर पूर्वाभिमुख होकर बैठो। फिर भगवान या गुरुदेव से, जिनमें आपकी श्रद्धा हो, निष्कपट भाव से प्रार्थना करोः 'प्रभु ! मुझे सन्मार्ग दिखाओ। मुझे सद्प्रेरणा दो। मेरी बुद्धि तो निर्णय लेने में असमर्थ है।'