Wednesday, April 14, 2010

अपनेमें योग्यता प्रत्यक्ष दीखती है,इसलिये अभिमानसे बचना बहुत कठिन होता है।मनुष्यको प्रत्यक्ष दीखता है कि मैं अधिक पढ़ा-लिखा हूँ,मैं गीता जाननेवाला हूँ,मैं कीर्तन करनेवाला हूँ,इसलिये वह फँस जाता है।अगर यह दीखने लग जाय कि यह सब केवल भगवान् की कृपासे हो रहा है तो निहाल हो जाय! ऐसा चेत भी भगवान् की कृपा से ही होता है।जिनको चेत न हो उनपर दया आनी चाहिये।वे भी चेतेंगे,पर देरी से!

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