Thursday, April 22, 2010

यह नियम है कि जिसके मन की बात पूरी होती है,वह उससे प्रेम करने लगता है जिसने उसके मन की बात पूरी की।अत: आस्तिक को अपनी बात पूरी न होने में विशेष कृपा का अनुभव इस कारण होता है कि अब मेरे प्यारे ने अपने मन की बात की है,अत: वे मुझसे अवश्य प्रेम करेंगे।प्रेमास्पद का प्रेम ही तो प्रेमी का सर्वस्व है।इस दृष्टि से आस्तिक किसी भी अवस्था में क्षुब्ध नहीं होता।

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