वे तो परम भाग्यशाली हैं कि जिन्हें ऐसा भास होता है कि भाई,मैंने ममता तोड़ी नहीं,फिर न जाने कैसे टूट गई! मैंने तो आत्मीयता जोड़ी नहीं,फिर न जाने कैसे जुड़ गई।दोषों की निवृति का भास न हो और गुणों की अभिव्यक्ति का भास न हो,तब समझना चाहिए कि निर्दोषता से एकता हो गई।
No comments:
Post a Comment