Tuesday, August 28, 2012
ईश्वर का भोग और ईश्वर से योग (आत्मनिष्ठ पूज्य बापू जी की ज्ञानमयी अमृतवाणी)
आपको ईश्वर से योग करना है कि ईश्वर का भोग करना है ? बोलो ! वासुदेवः सर्वम् है तो भोग किसका कर रहे हैं ? ૐ ईशावास्यमिदं सर्वं.... सब ईश्वर है तो भोग तुम ईश्वर का करते हो कि दूसरे किसी का ? बताओ ! दिन-रात ईश्वर का ही भोग कर रहे हैं लेकिन पता नहीं है। चीज-वस्तु सब ईश्वर ही है और यहाँ (भोक्ता के रूप में) भी ईश्वर है। पति-पत्नी सब ईश्वर है। ईश्वर का भोग हो रहा है और ईश्वर से योग भी हो रहा है लेकिन भोग संयत करो तो ईश्वर के योग और भोग दोनों में पास हो जाओगे तथा भोग अधिक करोगे तो खोखले हो जाओगे।
ʹईश्वर का भोग करेंʹ तो तुम ईश्वर का भोग करने वाले कौन ? ईश्वर से बड़े हो ? नहीं, ईश्वर के स्वरूप हो। तो हम अपने-आपका भोग कर रहे हैं। अपने-आपका भोग करोगे संयम से तो अपने-आपको जानोगे और अपने-आपका भोग करोगे असंयम से तो अज्ञानी, मूर्
आपको ईश्वर से योग करना है कि ईश्वर का भोग करना है ? बोलो ! वासुदेवः सर्वम् है तो भोग किसका कर रहे हैं ? ૐ ईशावास्यमिदं सर्वं.... सब ईश्वर है तो भोग तुम ईश्वर का करते हो कि दूसरे किसी का ? बताओ ! दिन-रात ईश्वर का ही भोग कर रहे हैं लेकिन पता नहीं है। चीज-वस्तु सब ईश्वर ही है और यहाँ (भोक्ता के रूप में) भी ईश्वर है। पति-पत्नी सब ईश्वर है। ईश्वर का भोग हो रहा है और ईश्वर से योग भी हो रहा है लेकिन भोग संयत करो तो ईश्वर के योग और भोग दोनों में पास हो जाओगे तथा भोग अधिक करोगे तो खोखले हो जाओगे।
ʹईश्वर का भोग करेंʹ तो तुम ईश्वर का भोग करने वाले कौन ? ईश्वर से बड़े हो ? नहीं, ईश्वर के स्वरूप हो। तो हम अपने-आपका भोग कर रहे हैं। अपने-आपका भोग करोगे संयम से तो अपने-आपको जानोगे और अपने-आपका भोग करोगे असंयम से तो अज्ञानी, मूर्
ख होकर नीच योनियों में जाओगे।
तुम ईमानदारी से सभी का मंगल चाहो, सभी का हित चाहो और फिर अपना। समाज का मंगल चाहना – यह संसार की सेवा हो गयी। ईश्वर को प्रेम करना – यह ईश्वर की सेवा हो गयी और अपने आत्मा में आकर बैठना, अपनी सेवा हो गयी। बस, तीन सेवाएँ करनी हैं और क्या है ! अपने-आपमें बैठना है, तो मंत्रोच्चारण करते हुए निःसंकल्प हों – ૐ ૐ परमात्मने नमः। ૐૐ आनंदस्वरूपाय नमः। ૐ....ૐ..... ૐ.... माने जो सारी सृष्टियों का पालनहार, कर्ता-धर्ता है और अंतर्यामी होकर विराज रहा है।
जो ईश्वर को भोगता है वह लघु साधना में जाता है लेकिन जो ईश्वर को भोगते हुए जानता है, ʹवह ईश्वर गुरु हैʹ - ऐसा जानकर स्वयं भी गुरु बन जाता है और लघुता से पार हो जाता है।
तुम ईमानदारी से सभी का मंगल चाहो, सभी का हित चाहो और फिर अपना। समाज का मंगल चाहना – यह संसार की सेवा हो गयी। ईश्वर को प्रेम करना – यह ईश्वर की सेवा हो गयी और अपने आत्मा में आकर बैठना, अपनी सेवा हो गयी। बस, तीन सेवाएँ करनी हैं और क्या है ! अपने-आपमें बैठना है, तो मंत्रोच्चारण करते हुए निःसंकल्प हों – ૐ ૐ परमात्मने नमः। ૐૐ आनंदस्वरूपाय नमः। ૐ....ૐ..... ૐ.... माने जो सारी सृष्टियों का पालनहार, कर्ता-धर्ता है और अंतर्यामी होकर विराज रहा है।
जो ईश्वर को भोगता है वह लघु साधना में जाता है लेकिन जो ईश्वर को भोगते हुए जानता है, ʹवह ईश्वर गुरु हैʹ - ऐसा जानकर स्वयं भी गुरु बन जाता है और लघुता से पार हो जाता है।
संत और गुरु में क्या अंतर होता है ?
संतों में भी स्तर होते हैं , गुरुपद के संत (७० प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर)
से शक्ति के स्पंदन प्रक्षेपित होते हैं, सद्गुरु पद के संत (80%
आध्यात्मिक स्तर) उसके अगले स्तर के होते हैं और उनसे आनंद के स्पंदन
प्रक्षेपित होते हैं और वह वह शक्ति के स्पंदन से अधिक सूक्ष्म होते हैं और
सबसे ऊपर परात्पर पद के संत (९० % आध्यात्मिक स्तर) के होते हैं उनसे
शांति के स्पंदन प्रक्षेपित होते हैं |
सभी गुरु संत होते हैं, परन्तु
सभी संत गुरु नहीं होते | गुरु पद एक कठिन पद होता है और कई बार संत इस पद
को स्वीकार करने को इच्छुक नहीं होते और वे आत्मानंद में रत रहना पसंद करते
हैं | ऐसे संतो के मात्र अस्तित्व से ब्रह्माण्ड की सात्त्विकता बनी रहती
है | कुछ संत भक्तों के अध्यात्मिक कष्ट दूर तो करते हैं, पर किसी को शिष्य
स्वीकार कर उसे मोक्ष तक ले जाने को इच्छुक नहीं होते क्योंकि संतों को
पता होता है मात्र शिष्य बनाने से काम समाप्त नहीं होता, शिष्य जब तक मोक्ष
को प्राप्त नहीं होता, तब तक वह उत्तरदायित्व गुरु का होता है; अतः कई
गुरु शिष्य बनाते समय बहुत सतर्क रहते हैं और योग्य पात्र को ही शिष्य
स्वीकार करते हैं | मात्र गुरु पद स्वीकार करने के पश्चात् संतो की प्रगति
मोक्ष की द्रुत गति से होती है | ईश्वर प्रत्येक संत को गुरुके लिए नहीं
चुनते, जिनमे दूसरों को सिखाने की विशेष क्षमता हो, मां समान मातृत्व,
क्षमाशीलता और प्रेम हो, उसे ही सद्गुरु पद पर आसीन करते हैं |........
Monday, August 27, 2012
यह
सत्य है कच्चे कान के लोग दुष्ट निन्दकों के वाग्जाल में फँस जाते हैं।
जिस व्यक्ति ने अपने जीवन में आत्मशांति देने वाला, परमात्मा से जोड़ने वाला
कोई काम नहीं किया है, उसकी बात सच्ची मानने का कोई कारण ही नहीं है।
तदुपरान्त मनुष्य को यह भी विचार करना चाहिए कि जिसकी वाणी और व्यवहार से
हमें जीवन-विकास की प्रेरणा मिलती है, उसका यदि कोई अनादर करना चाहे तो हम
उस महापुरुष की निन्दा कैसे सुन लेंगे? व कैसे मान लेंगे?
शास्त्रों
में आता है कि संत की निन्दा, विरोध या अन्य किसी त्रुटि के बदले में संत
क्रोध कर दें, शाप दे दें तो इतना अनिष्ट नहीं होता जितना अनिष्ट संतों की
खामोशी व सहनशीलता के कारण होता है। सच्चे संतों की बुराई का फल तो भोगना
ही पड़ता है। संत तो दयालु और उदार होते हैं। वे तो क्षमा कर देते हैं,
परंतु प्रकृति कभी नहीं छोड़ती। इतिहास उठाकर देखें तो पता चलेगा कि सच्चे
संतों व महापुरुषों के निन्दकों को कैसे-कैसे भीषण कष्टों को सहते हुए
बेमौत मरना पड़ा है और पता नहीं किन-किन नरकों को सड़ना पड़ा है। अतएव समझदारी
इसी में है कि हम संतों की प्रशंसा करके या उनके आदर्शों को अपनाकर लाभ न
ले सकें तो उनकी निन्दा करके पुण्य व शांति भी नष्ट नहीं करें।
पराशर मुनि ने राजा जनक को कहा हैः
कृतानि यानि कर्माणि दैवतैर्मुनिभस्तथा।
न चरेत् तानि धर्मात्मा श्रुत्वा चापि न कुत्सयेत्॥
'देवताओं और मुनियों द्वारा जो अनुचित कर्म दिये गये हों, धर्मात्मा पुरुष
उनका अनुकरण न करे और उन कर्मों को सुनकर भी उन देवता आदि की निन्दा न
करे।'
महा. शांतिपर्व (291/17)
'देवताओं और मुनियों द्वारा जो अनुचित कर्म दिये गये हों, धर्मात्मा पुरुष उनका अनुकरण न करे और उन कर्मों को सुनकर भी उन देवता आदि की निन्दा न करे।'
महा. शांतिपर्व (291/17)
सत्पुरुष
हमें जीवन के शिखर पर ले जाना चाहते हैं, किंतु कीचड़ उछालने वाला आदमी
हमें खाई की ओर खींचकर ले जाना चाहता है। उसके चक्कर में हम क्यों फँसे?
ऐसे अधम व्यक्ति के निन्दाचारों में पड़कर हमें पाप की गठरी बाँधने की क्या
आवश्यकता है? इस जीवन में तमाम अशांतियाँ भरी हुई हैं। उन अशांतियों में
वृद्धि करने से क्या लाभ?
दृढ़तापूर्वक
निश्चय करो कि तुम्हारी जो विशाल काया है, जिसे तुम नाम और रुप से ‘मैं’
करके सँभाल रहे हो उस काया का, अपने देह का अध्यास आज तोड़ना है । साधना के
आखिरी शिखर पर पँहुचने के लिए यह आखिरी अड़चन है । इस देह की ममता से पार
होना पड़ेगा । जब तक यह देह की ममता रहेगी तब तक किये हुए कर्म तुम्हारे लिए
बंधन बने रहेंगे । जब तक देह में आसक्ति बनी रहेगी तब तक विकार तुम्हारा
पीछा न छोड़ेगा । चाहे तुम लाख उपाय कर लो लेकिन जब तक देहाध्यास बना रहेगा
तब तक प्रभु के गीत नहीं गूँज पायेंगे । जब तक तुम अपने को देह मानते रहोगे
तब तक ब्रह्म-साक्षात्कार न हो पायेगा । तुम अपने को हड्डी, मांस, त्वचा,
रक्त, मलमूत्र, विष्टा का थैला मानते रहोगे तब तक दुर्भाग्य से पिण्ड न
छूटेगा । बड़े से बड़ा दुर्भाग्य है जन्म लेना और मरना । हजार हजार सुविधाओं
के बीच कोई जन्म ले, फर्क क्या पड़ता है? दु:ख झेलने ही पड़ते हैं उस बेचारे
को ।
हृदयपूर्वक ईमानदारी से प्रभु को प्रार्थना करो कि:
‘हे प्रभु ! हे दया के सागर ! तेरे द्वार पर आये हैं । तेरे पास कोई कमी नहीं । तू हमें बल दे, तू हमें हिम्मत दे कि तेरे मार्ग पर कदम रखे हैं तो पँहुचकर ही रहें । हे मेरे प्रभु ! देह की ममता को तोड़कर तेरे साथ अपने दिल को जोड़ लें |’
हृदयपूर्वक ईमानदारी से प्रभु को प्रार्थना करो कि:
‘हे प्रभु ! हे दया के सागर ! तेरे द्वार पर आये हैं । तेरे पास कोई कमी नहीं । तू हमें बल दे, तू हमें हिम्मत दे कि तेरे मार्ग पर कदम रखे हैं तो पँहुचकर ही रहें । हे मेरे प्रभु ! देह की ममता को तोड़कर तेरे साथ अपने दिल को जोड़ लें |’
जिनका
जीवन आज भी किसी संत या महापुरुष के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सान्निध्य
में है, उनके जीवन में निश्चिन्तता, निर्विकारिता, निर्भयता, प्रसन्नता,
सरलता, समता व दयालुता के दैवी गुण साधारण मानवों की अपेक्षा अधिक ही होते
हैं तथा देर-सवेर वे भी महान हो जाते हैं और जो लोग महापुरुषों का, धर्म का
सामीप्य व मार्गदर्शन पाने से कतराते हैं, वे प्रायः अशांत, उद्विग्न व
दुःखी देखे जाते हैं व भटकते रहते हैं। इनमें से कई लोग आसुरी वृत्तियों से
युक्त होकर संतों के निन्दक बनकर अपना सर्वनाश कर लेते हैं।
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