Wednesday, March 31, 2010

निर्भर भक्ति में कुछ नहीं करना पड़ता।बस,केवल निर्भरता को अपने जीवन में उतारना पड़ता है।इस भक्ति में हमारे सामने आदर्श है शिशु।छोटा बच्चा माँ की मार से बचने के लिये भी माँ की ही गोद में घुसता है।जो इस प्रकार निर्भर है भगवान् पर,वही वास्तविक निर्भर है।
अहंकार तथा अपने स्वार्थ का त्याग करके दूसरेका हित कैसे हो?दूसरे का कल्याण कैसे हो?दूसरे को सुख कैसे मिले? अपने तनसे,मनसे,वचनसे,बुद्धिसे,पदसे किसी तरह ही दूसरों को सुख कैसे हो? ऐसा भाव रहेगा तो आप ऐसे निर्मल हो जायँगे कि आपके दर्शनों में भी दूसरे लोग निर्मल हो जायँगे।
एक भाई ने मुझसे कहा कि आप मुझे परम आस्तिक क्यों कहते हैं? मैं तो परम आस्तिक नहीं हूँ।मैंने कहा-मैं इसीलिये कहता हूँ कि आप आस्तिक हो जायेंगे।यह कोई कल्पना नहीं है,यह वास्तविकता है।जिसको आप जैसा समझेंगे,जैसा सोचेंगे,जैसा मानेंगे,वैसा वह हो जायेगा।हम किसी को बुरा न समझें।तब किसी के बुरे होने में हमारा हाथ नहीं रहेगा।
गुणों का वर्णन तो करना चाहिये,किंतु किसी के दोष का वर्णन नहीं करना चाहिये।हम किसी के गुणॊं का वर्णन करें तो उसका हमारे में प्रेम बढ़ेगा,हमारा उसके साथ प्रेम बढ़ेगा किंतु गुणों का वर्णन सच्चा करना चहिये झूठा नहीं।झूठे गुणगान से कोई असर और लाभ नहीं होता

Tuesday, March 30, 2010

विश्वास करो,तुमपर भगवान् की बड़ी कृपा है;तभी तो तुम्हें मनुष्य का देह मिला है।यह और भी विशेष कृपा समझो जो तुम्हें भजन करने की बुद्धि प्राप्त हुई और भजन के लिये सुअवसर मिला।इस सुअवसर को हाथ से मत जाने दो,नहीं तो पछ्तावोगे।
अपने को सत्यवादी मान लेने पर ही सत्य बोलने की प्रवृति होती है और सत्य बोलने की प्रवृति से "मैं सत्यवादी हूँ"-इस भाव की दृढ़ता हो जाती है।
जो पमेश्वर महापामर दीन-दुखी अनाथको याचना करने पर उसके दुर्गुण और दुराचारों की ओर खयाल न करके बच्चे को माता की भाँति गले लगा लेता है,ऎसे उस परम दयालु सच्चे हितैषी परम पुरुष की इस दया के तत्व को जाननेवाला पुरुष उसकी प्राप्ति से वंचित कैसे रह सकता है?
गुरुदेव सक्सात शिव रूप है पल-दो पल भी यदि कोई उनके सन्मुख हो जाये तो उन्केउपर ऐसी ध्रस्ती करते की उसे यही प्रतीत होता है की यही पल मेरे जीवन का सबसे कीमती पल है गुरुदेव को देख कर भ्रम्ह दर्शन की प्यास मिट जाती है उनको देखते हे सहज रूप में ऐसा प्रतीत होता है जैसे ढ्रपर, त्राता अथवा सतयुग के किसी रूषी को हम देख रहे हैं

Monday, March 29, 2010

जिस बालक को माँ ने अपना माना है,वह छोरा दौड़कर गोद में चढ़ जाय तो माँ हँसेगी और जानकर ऊँ-ऊँ-ऊँ करके रोता है तो माँ हँसती है कि देखो ठगाई करता है मेरे से।छोरे की वह कौन-सी क्रिया है,जिससे माँ को प्रसन्नता नहीं होती है।ऐसे ही हम भगवान् के बनकर जो भी करें,हमारी हर क्रिया भगवान् का भजन हो जायेगी।कुछ भी काम करो भगवान् खुश होते रहते हैं।यह मेरा बालक खेल रहा है।कैसी मस्ती है!(
प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी के शरणापन्न रहता है। अन्तर केवल इतना है कि आस्तिक एक के और नास्तिक अनेक के। आस्तिक आवश्यक्ता की पूर्ति करता है और नास्तिक इच्छाओं की। आवश्यक्ता एक और इच्छाएँ अनेक होती है। आवश्यक्ता की पूर्ति होने पर पुनः उत्पत्ति नहीं होती। इच्छाकर्ता तो बेचारा प्रवृत्ति द्वारा केवल शक्तिहीनता ही प्राप्त करता है
भले होने का सहज,सुगम,सुलभ उपाय क्या है?वह यह है कि हम अपनी वर्तमान निर्दोषता में अविचल आस्था करें।यह ऐसा दार्शनिक उपाय है,वैज्ञानिक उपाय है,अनुभव-सिद्ध उपाय है कि हम वैसे ही भले हो जाते हैं,जैसे कि बुराई की उत्पति से पूर्व थे।
मितभाषी बनना अथार्त् गम्भीरता के साथ विचारकर यथासाध्य बहुत कम बोलना चाहिये,क्योंकि अधिक शब्दों का प्रयोग करने से विशेष विचार के लिये समय न मिलने के कारण भूल से असत्य शब्दका प्रयोग हो सकता है।
भक्त प्रारम्भसे ही भग्वत्कृपा की डोरी से बँधे हुए चलते हैं।अतएव जहाँ पैर फिसला कि भगवान् ने डोरी खैंची।इससे भक्त कभी गिरते नहीं।
विवाद छोड़कर विचार करो। प्रमाद छोड़कर भजन करो। याद रक्खो - भगवान्का भजन ऐसा कुशल पथप्रदर्शक है जो तुम्हें सदा यथार्थ मार्ग दिखलाता रहेगा। तुम कभी मार्ग भूल नहीं सकोगे।
यदि तुम किसी भय से पीड़ित हो तो आर्तभाव से भगवान् को पुकारो, उनसे रक्षा के लिये प्रार्थना करो। वे तुम्हारी प्रार्थना को अवश्य सुनेंगे और तुम्हें भयसे मुक्त कर देंगे। हे नाथ - हे मेरे नाथ!
यदि तुम अपने लक्ष्य को - भगवान् को कभी न भूलते हुए सदा निर्लेप तथा सावधान रहकर भगवान् की ओर चलते रहोगे तो यह मानव-शरीर तुम्हें निश्चय ही वहाँ पहुँचाने में समर्थ होगा।

झूठे झगड़ेको छोड़कर साधनमें लग जाओ-जी-जानसे लग जाओ। मनुष्य-जीवन बहुत थोड़े दिनों का है, देर न करो। याद रक्खो-देर में कहीं मानव जीवनका अवसान हो गया तो पीछे बहुत पछताना पड़ेगा।

भक्ति से मेरे यथार्थ स्वरूप को तत्त्व से तुम जान सकोगे औरे उसे जानते ही तुम उसी क्षण मुझमें प्रवेश कर जाओगे। मैं और तुम दोनों एक ही हो जायँगे।

यदि तुम्हें जीवन के चरम तथा परम लक्ष्य श्रीभगवान् के धाम पहुँचना है, भगवान् को प्राप्त करना है तो इस बात को कभी न भूल कर सावधानी तथा शीघ्रता के साथ आगे बढ़ते जाओ।
वृक्ष के समान सहनशील हों।पत्थर मारनेवाले को फल दें,काटकर जला देनेवालेकी रोटी पका दें।चीरकर काट देनेवालेका दरवाजा,चौखट,छ्त बन जायँ।बिना किसी भेदके सबको छाया दें,जात-पात का भेद कुछ न मानें।
भयंकर से भयंकर परिस्थिति आ जाय,तब भी कह दो-"आओ मेरे प्यारे!आओ,आओ,आओ।तुम कोई और नहीं हो।मैं तुम्हें जानता हूँ।तुमने मेरे लिये आवश्यक समझा होगा कि मैं दु:ख के वेश में आऊँ,इसलिये तुम दु:ख के वेश में आये हो।स्वागतम्!वैलकम्! आओ आओ चले आओ!" आप देखेंगे कि वह प्रतिकूलता आपके लिये इतनी उपयोगी सिद्ध होगी कि जिस पर अनेकों अनुकूलतायें निछावर की जा सकती है।

Sunday, March 28, 2010

Hai Prabhu

mara prabhu mane sachi disha batacjo ,sachu margdharshan dejo , he sukh sawarup , shaniti shawarup maray haiya ma sukh rupe , shanti rupe saday vasjso , he karuna nidan , he krishna kaniya , bansi bajaiya , madur lala , mara vahaluda mara riday ma saday nivas karjo , mari kadji lejo , mane eklo , atulo kadapi na mukjo mara nath , hu tamari sharane , tara vina na koi maro nath , bas taro j ek sath mane mara pritam , mara dev , mara hridaya na nath Om narayan narayan narayan

he shanti data , giyan devta ,mara ishtadevta , kay cho tame , mara dil ma cho kem chupaya cho aji sudhi , mane man mandir na dharshan karavo mara nath , mane potana ma dubado mara nath

Atlu madi jay to sukhi thavu , aa kurshi suchi phohich javu to sukhi tavu , kya suthi aa badhu karta rahishu nath , kaya sudhi sansar na janam maran na chakro ma padta rahishu , kya suthi ame sansari vato ma atvata rahishu , bas have to evo di dekhad ke tara ma dubhi jayai , bas kya sudhi duniyavi maja pachad ame dodta rahishu , kem ishavariyi maja ma man nathi dubtu , cigarete , pana , masala and kahava piva ma maja shodhiye chiye kem diyan ma maja nathi avati, kem simran and satsang ma maja nathi aavati bas he gurudev , he nath ave to asli maja dekhadi to duniyavi mana bhuli jayeaye

Pram bharelu haiyu lai ne tare dware aaveyo chu jo tu mujne tarchode to duneya ma mare javu kya? na janu hu pooj tari na janu bhakti ne rit, gandi ghale vane ma hu gato guruji tara geet chacker banine charne tara rahva ne hu aaveyo chu jo tu mujne tarchode to duneya ma mare javu kya?

he mara nath , me mara valuda , janmo thi batki rahaya chiye , taro abhar che mara nath te amne manushaya jo jiwan apyo , have bas aa janam ma aame tane medvi laveye , tara ma dubhi ne tara charano me priti karine tane pami laviye , bas mara prabhu dar rose tane yaad kariye , sansar na sambhado ne kya sudhi sachivishu , bas tara sathe sambhand pako thai jaye to sansar na sambado to dodta pachad aavshe , savare uthu to tari yad aave , divas bar tane yad karta nikade and ratre suvu to bas tara khoda ma suvu , eve daya kara mara prabhu mara nath bas tara sivay kashu yad na rahe mari ankho bas tara didar kare , mari sans bas tara mate chale , mari hriday ma bas tari yad rahe , maru sharir bas tari seva ma ja jaye , jaldi mara nath mane evo di dekhad mara vahaluda
Guru saman nahi koi Hitkari , Guru sam nahi koi dayalu , Guru hi brahma , Guru hi Vishnu , Guru hi Devo Ke dev , Guru Hi Mata , Guru hi Pita , Guru hi samare sab kuch , Guru hi par utaranahar , Guru seva se badkar nahi koi seva , Guru Simran se nahi badkar koi simaran , Guru Puja se badkar nahi koi puja , Sadhak ka yah bhav hi Uski Mukati ka Marg hai ,
Holy ke rang Gurudev ke sang, Saneh , Pyar aur Samarpan ke rango se jiwan mahekta rahe , Guru Giyan aur Guru seva se jiwan anandit rahe , Guru kripa aur Guru prem se Man rang jaye , Shardha aur Vishavash ke rang jiwan ko maheka de aur Gurudev ke bataye huwe raste chalkar apni jiwan bagiya ko rango se bhar de yahi prathna Hari om
Holy ke rang Gurudev ke sang, Saneh , Pyar aur Samarpan ke rango se jiwan mahekta rahe , Guru Giyan aur Guru seva se jiwan anandit rahe , Guru kripa aur Guru prem se Man rang jaye , Shardha aur Vishavash ke rang jiwan ko maheka de aur Gurudev ke bataye huwe raste chalkar apni jiwan bagiya ko rango se bhar de yahi prathna Hari om
Bapu mene aapko apna Nasib Samja hai , Apne se bahot karib samaja hai , Bapu mene tumhe pakar sari duniya ko garib samja hai Tera hi dawara , tera sahara , teri hi arzu , teri hi zutsju , to bhin nahi aur koi sahara Bapu , rang jaye hamara sara jiwan tere rango me bapu
प्रेम अथार्त भगवान्।प्रेम का अर्थ है भगवान् का सुख,प्रेम का अर्थ है सम्पूर्ण समर्पण- यह जहाँ लहरा है वहाँ प्रेम के नाम पर प्रेम का चोंगा पहनकर भगवान् आते हैं।और जहाँ यह नहीं है वहाँ प्रेम का नाम रखकर डकैत आते हैं-काम,क्रोधदि।
जो प्रेमी भक्त भगवान् को छोटी-सी-छोटी आज्ञा का पालन करने के लिये अपने सर्वस्व को निछावर करने को तैयार रहते हैं, भगवान् उनके ऋणी हो जाते हैं।
अगर आपको इसमें सन्तोष है कि हमारी बुराई सारा संसार जान ले तो मैं भरी सभा में कहता हूँ कि आप लोग जितना मुझको बुरा समझते हैं उससे मैं अधिक बुरा हूँ और जितना आप लोग अच्छा समझते हैं,उससे मैं कम अच्छा हूँ। अब देखिये,इसमें मेरा क्या बिगड़ गया? बताओ जरा! क्या मैं उस जीवन को पसन्द करुँगा,जो आपकी उदारता पर टिका हो? नहीं-नहीं कोई विचारशील मानव उस जीवन को पसन्द नहीं करेगा।
लोगों में हमारे अवगुण प्रकट नहीं होते, तभी हमारा काम चलता है। हमारे मन में जो बुरी बातें आती हैं,उनको अगर लोग जान लें तो एक दिन में कितनी बार मार पड़े! परन्तु लोगों को उनका पता नहीं लगता! भगवान् तो सब जानते हैं,पर जानते हुए भी हमारा त्याग नहीं करते,प्रत्युत आँख मीच लेते हैं कि बालक है,कोई बात नहीं! इस कारण हमारा काम चलता है,नहीं तो बड़ी मुश्किल हो जाय!
जीवन में आप जो कुछ करते हो उसका प्रभाव आपके अंतःकरण पर पड़ता है। कोई भी कर्म करते समय उसके प्रभाव को, अपने जीवन पर होने वाले उसके परिणाम को सूक्ष्मता से निहारना चाहिए । ऐसी सावधानी से हम अपने मन की कुचाल को नियंत्रित कर सकेंगे, इन्द्रियों के स्वछन्द आवेगों को निरुद्ध कर सकेंगे, बुद्धि को सत्यस्वरूप आत्मा-परमात्मा में प्रतिष्ठित कर सकेंगे ।

Saturday, March 27, 2010

आर्त भाव से भगवान को प्रार्थना करे…


हे दिन बंधो ! …मेरे जो कर्म दिव्य बने है तो आप की कृपा है; लेकिन नीच कर्मो से बचाने की आप ही कृपा करो.. हे दिव्य प्रभु, नित्य देव तुम ही मेरे अंतरात्मा, अन्तर्यामी हो.. समर्थ हो.. दयालु हो..मुझ पर कृपा करे….’ ऐसे भगवान को पुकारते पुकारते श्वासों-श्वास में भगवन नाम की गिनती करे…तो आप के कर्म दिव्य होने लगेंगे …. मन की दुष्टता, बुध्दी का रागद्वेष, कर्म का बंधन मिटाकर परमात्मा का रस पाने में साधक सफल होने लगता है…..
सत्संग के द्वारा ये समझ बढाए की शरीर की बिमारी मुझ में नहीं है, शरीर में बिमारी है, ये जानेगा..मुझ में बिमारी ऐसा मानेगा तो बिमारी तुम को ओर दबोचेगी… दुःख मुझ में नहीं, मन में दुःख आया.. टेंशन है तो मन में है, तनाव है तो मन में है; मुझ में नहीं….ऐसा जो जानता उस का जन्म और कर्म दिव्य होते..जो सामान्य मनुष्य जगत को सच्चा मानता तो उस की आत्मा की दिव्यता के ऊपर अ-ज्ञान का पर्दा पडा है…

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय..ना हम वसामि वैकुंठे योगिनाम ह्रुदएंवयी

मद भक्ता यत्र गायंत्री तत प्रतिष्ठामी नारदा

किसी का बुरा ना करो..किसी का बुरा ना सोचो… जनमने मरने के बाद भी मैं रहेता हूँ ऐसा सोचो .. आप के कर्म में अ-शुध्दी ना हो…आप के भाव में अ-शुध्दी नहीं हो.. आप की बुध्दी में ब्रम्हज्ञानी का ज्ञान हो… आप का जन्म दिव्य हो जाएगा….भगवान बोलते मैं ऐसे योगियों के ह्रदय में जरुर मिलता हूँ जिन के ह्रदय में दिव्यता मधुरता और प्रसन्नता होती…वहा मेरी पूर्ण पूजा होती है..

हरी सम जग कछु वस्तु नहीं प्रेम सम पंथ सदगुरू सम सज्जन नहीं गीता सम नहीं ग्रन्थ ll

एक घडी आधी घडी आधी में पुनि आध तुलसी संगत साधू की हरे कोटि अपराध ll

४० दिन तक रोज १० मिनट भगवान को एक टक देखे तो ४ चंचलता दूर हो जायेगी(वाणी की, हाथो की, नेत्रों की और पैरो की चंचलता दूर होगी) …हरी….. ओम्म्म्म्म्म्म्म् इस प्रकार भगवान के नाम का लंबा उच्चारण करे तो ज्ञान तंतु पुष्ट होंगे भगवत सत्ता का संचार आप के ७२ करोड़ ७२ लाख १० हजार २०१ नाड़ियों में होगा..

किसी के घर में मृत्यु हुयी तो उन्हें मंगलमय जीवन मृत्यु ये पुस्तक पढ़ाना.. मृतक की याद में रोते तो आँख-नाक से जो गन्दगी निकलती वो उन को पिलाया जाता जो मृतको के लिए रोते है..

ऐसा शास्त्रों में लिखा है..diव्य प्रेरणा प्रकाश और जीवन विकास ये पुस्तके जरुर पढ़े..

हरी ओम्म्म्म्म्म्म्ॐ

तम नमामि हरिम परमॐ
तम नमामि हरिम परमॐ
तम नमामि हरिम परम
काम करते समय यह भाव रखना चाहिये कि यह काम भगवान् का है और उन्हीं के आज्ञानुसार मैं इसे सिर्फ़ उन्हीं की प्रसन्नता के लिये कर रहा हूँ।प्रभु मेरे पास खड़े हुए मेरे काम को देख रहे हैं-ऎसा समझकर सदा प्रसन्न रहना चाहिये।
जो किसी को बुरा समझता है,वह उससे ज्यादा बुरा है,जो बुरा करता है।बुराई करने वाले के जीवन में कभी भी सजगता आ सकती है और वह पश्चाताप करके बुराई को छोड़ सकता है;किन्तु जो दूसरे को बुरा समझता है,उसके जीवन में तो मिथ्या अभिमान की ही उत्पति और पुस्टि होती रहती है।
यह बात तो मानना ही चाहिये कि भगवान् ग्रहण करके छोड़ते नहीं,पर यदि भजन में,सेवा में शिथिलता रहती है तो भगवान् से यह प्राथना अवश्य करनी चाहिये कि प्रभो! ये हमारे दिन जो कटते हैं,वे आपकी विस्मृति में ही कट जाते हैं,आपका निरन्तर स्मरण नहीं होता और न स्मरण न होने क दु:ख ही होता है। भगवन् हमारी यह दैन्यपूर्ण स्थिति दूर हो जाय।

Friday, March 26, 2010

sanso me tumhara nam rahe , mere man me prem ki jyot jale , vinti sada karte hi rahe , gurudev tumhare charano me , es sar par tumhara hath rahe , Jiwan Bhar tera sath rahe , Yah shardha hamari badti rahe Gurudev tumhare charano me , tere sumrin me ham magan rahe tere nam ki hame lagan rahe , yah shish sada zukata hi rahe Gurudev tumhare charno me
Hamare dil me base Gurudev , hamari pyar ki murat tum ho , tume milke ko dil bechen hota , tume dekhe to chain padta , to bina na koi aur sahara , bas he dinanath , he prabhu me moula , mere auliya bas apni kripa me banaye rakhana , apni nigaho se kabhi dur mat karna , apne karuna se kabhi dur mat karna
kuch nahi hai jiwan tumhare bina , tumhara sath Guruvar kabhi na chute ,banda jo prem ka rishta kabhi bhi hamse tute na mere Gurudev , bas tera hi sahara hai Gurudeva Karunay bhav se ki huwe prathna jarur kabhul hoti hai , jab bhi dukh sataye ,pareshani aaye bas Gurudev ko araj karo sache dil se,agar phislu me to tumhi bachana bhakti ki jyot dil me jagana tere rang me rang jaye jiwan yah Mere moula mere GurudevaSee More
जरा जरा-सी बात में डर रहे हैं? जरा जरा-सी बात में सिकुड़ रहे हैं? हो होकर क्या होगा? जो भी हो गया वह देख लिया। जो हो रहा है वह देख रहे हैं। जो होगा वह भी देखा जायेगा। मूँछ पर ताव देते हुए.... भगवान को प्यार करते हुए तुम आगे बढ़ते जाओ। निर्भय..... निर्भय.... निर्भय.... निर्भय..... निर्भय.....।
सांसारिक जीवन मे व्यस्त रहकर भी अगर कही से संतो की कथाएँ कानो तक पहुंच जाए तो उनकी प्रकृति ऐसी है की सुनने वाले को बिना किसी प्रकार का श्रम किए लाभ ही लाभ होता है
इन प्राणी, पदार्थ, परिस्थितियों की आस्था, आशा, आकांक्षा छोड़कर प्रभु की ओर देखो। फिर सारी प्रभु-इच्छित अनुकूलता अपने-आप ही आकर तुम्हारे चरण चूमेगी।
अगर तुम दुसरों के लिये बोलते हो, दुसरों के लिये सुनते हो, दुसरों के लिये सोचते हो, दूसरों के लिये काम करते हो, तो तुम्हारी भौतिक उन्नति होती चली जायगी। कोई बाधा नहीं डाल सकता। अगर तुम केवल अपने लिये सोचते हो तो दरिद्रता कभी नहीं जायगी
" जो हमारे बहुत करीब है उसे हम छू नही सकते शायद इसे 'मजबूरी' कहते है, जो हमे चाहता है उसे हम पा नही सकते शायद उसे 'नसीब' कहते है........!" इसी 'मजबूरी' और 'नसीब' के बीच एक रिश्ता पनपता है शायद इसे "मोहब्बत" कहते है.......
अगर मन इन्द्रियों के साथ चलेगा तो समझो परमात्मा रूठे है ..तो निचे जाएगा… मन को ऊपर उठाना है तो सत्संग किया, नियम का आदर है तो उंचा उठेगा..मन बुध्दी के अनुसार चलेगा.. अगर बुध्दी ज्ञान स्वरुप है तो सही निर्णय देगी…जिस के प्रिय भगवान नहीं, जिस के लिए भगवत प्राप्ति मुख्य नही, उस का संग ऐसे ठुकराओ जैसे करोडो वैरी सामने बैठे है यद्यपि वो परम स्नेही हो..