जिस मूर्ति को गौरांग निहारते थे उस जगन्नाथजी को औरों ने भी निहारा था। लेकिन गौरांग की इतनी एकाग्रता थी कि वे सशरीर उसी मूर्ति में समा गये। जिस मूर्ति को मीराजी देखती थी उस मूर्ति को और लोग भी देखते थे। लेकिन मीरा की एकाग्रता ने अदभुत चमत्कार कर दिया। धन्ना जाट ने सिलबट्टा पाया पण्डित से। जिस सिलबट्टे से पण्डित रोज भाँग रगड़ता था वही सिलबट्टा धन्ना जाट की दृष्टि में ठाकुरजी बना और पूजा में रखा गया। धन्ना जाट की इतनी एकाग्रता हुई कि ठाकुर जी को उसी सिलबट्टे में से प्रकट होना पड़ा। काले कुत्ते को अनेक यात्रियों ने देखा। नामदेव भी एक यात्री थे। अलग-अलग तम्बू लगाकर यात्री लोग भोजन बना रहे थे। कुत्ते को आया देखकर कोई बोलाः यह अपशकुन है। किसी ने कहाः काला कुत्ता तो शकुन माना जाता है। वे लोग कुत्ते की चर्चा कर रहे थे और इतने में कुत्ता नामदेव की रोटी लेकर भागा। कुत्ते में भी भगवान को निहारनेवाले भक्त नामदेव घी की कटोरी लेकर पीछे भागे। सबमें भगवान को निहारने की उनकी इतनी एकाग्रता थी, इतनी दृढ़ता थी कि उस कुत्ते में से भगवान को प्रकट होना पड़ा।
Thursday, March 29, 2012
Thursday, March 22, 2012
विपत्तियों के पहाड़, दुःखों के समुद्र हमें दुःखी बनाने में समर्थ नहीं हैं, क्योंकि सर्वसमर्थ हमारा आत्मा हमारा परम हितैषी है । केवल हम उसे अपना मानें, समर्थ मानें, प्रीतिपूर्वक सुमिरें । अचेतन अवस्था में भी वह हमारा साथ नहीं छोड़ता । मृत्यु भी हमारे और ईश्वर के अमर संबंध को नहीं तोड़ सकती । हाय राम ! ऐसे पिया को छोड़कर किस-किसकी शरण लोगे ? किस-किसके आगे गिड़गिड़ाओगे ? हरि शरणम्... प्रभु शरणम्... । ॐ... ॐ... ॐ... ईश्वर को पाये बिना दुनिया की कोई भी विद्या पा ली तो अंत में घुटने टेकने ही पड़ते हैं ।
Wednesday, March 21, 2012
मोह और ममता पहले थोड़े होती है, वह तो ज्ञान के अनादर के बाद होती है । मोह-ममता स्वाभाविक थोड़े ही है । परिवार की सेवा करो, ममता का क्या अर्थ ? परिवार के अधिकार की रक्षा करो और परिवार के उपर से अपना अधिकार हटा लो । यही त्याग हो गया । परिवार को बुरा मत समझो, परिवार की निन्दा मत करो। हर आदमी अपनी जगह पर पूरा और श्रेष्ठ है ।
हिंमत हारा बैठा था में...
हिंमत हारा बैठा था में,
पीठ फिराये भविष्य से।
हार चुका था अपनी शक्ति,
...
अपनी ही कमजोरी से ।
देखा मैंने एक मकड़ी को,
बार बार यूँ गिरते हुए।
अपने बुने हुए जाल पे फिर भी,
कंई बार जो सँभलते हुए।
गिरती रही, सँभलती रही पर..
बुनती रही वो अपना जाल।
पुरा बन चुकने पर मकडी,
जैसे हो गई हो निहाल।
एक छोटी मक़्डी ने मुझ में,
भर दी हिंमत कंई अपार।
कुछ करने की ठान ली मैंने,
अब ना रहा मैं यूँ लाचार।
मक़डी ने सिखलाया मुज़को,
हरदम कोशिश करते रहना।
”राज़” कितनी बाधाएं आयें,
हरदम कदम बढाये रहना।
पीठ फिराये भविष्य से।
हार चुका था अपनी शक्ति,
...
अपनी ही कमजोरी से ।
देखा मैंने एक मकड़ी को,
बार बार यूँ गिरते हुए।
अपने बुने हुए जाल पे फिर भी,
कंई बार जो सँभलते हुए।
गिरती रही, सँभलती रही पर..
बुनती रही वो अपना जाल।
पुरा बन चुकने पर मकडी,
जैसे हो गई हो निहाल।
एक छोटी मक़्डी ने मुझ में,
भर दी हिंमत कंई अपार।
कुछ करने की ठान ली मैंने,
अब ना रहा मैं यूँ लाचार।
मक़डी ने सिखलाया मुज़को,
हरदम कोशिश करते रहना।
”राज़” कितनी बाधाएं आयें,
हरदम कदम बढाये रहना।
उल्लुओं की पंचायत इकट्ठी हुई| एक ने दूसरे से पूछा के तुम में से किसी ने सूर्य देखा है? भला उन में से किसी ने सूर्य देखा हो तो हां कहे| उनहोंने कहा कि सूर्य होता ही नहीं| यही दशा अज्ञानी लोगों की है| वे ईश्वर के लिए कहते हैं कि ईश्वर है ही नहीं| वे संसार को सत् समझकर बैठे है|
अपने आपको भूल के, हैरान हो गया,
माया के जाल में फंसा, बैरान हो गया|
*** यदि मनुष्य वाणी का सदुपयोग करेगा अर्थात मौन धारण करेगा अथवा उचित और पर्याप्त बोलेगा तो जगत के बहुत से झगड़े मिट जायें....
अपने आपको भूल के, हैरान हो गया,
माया के जाल में फंसा, बैरान हो गया|
*** यदि मनुष्य वाणी का सदुपयोग करेगा अर्थात मौन धारण करेगा अथवा उचित और पर्याप्त बोलेगा तो जगत के बहुत से झगड़े मिट जायें....
अभ्यास में रूचि क्यों नहीं होती? (15 जनवरी 1958, कानपुर।)
सत्संग-प्रसंग पर एक जिज्ञासु ने पूज्य बापू से प्रश्न कियाः
"स्वामीजी ! कृपा करके बताएँ कि हमें अभ्यास में रूचि क्यों नहीं होती?"
पूज्य स्वामीजीः "बाबा ! अभ्यास में तब मजा आयेगा जब उसकी जरूरत का अनुभव करोगे।
एक बार एक सियार को खूब प्यास लगी। प्यास से परेशान होता दौड़ता-दौड़ता वह एक नदी के किनारे पर गया और जल्दी-जल्दी पानी पीने लगा। सियार की पानी पीने की इतनी तड़प देखकर नदी में रहने वाली एक मछली ने उससे पूछाः
'सियार मामा ! तुम्हें पानी से इतना सारा मजा क्यों आता है? मुझे तो पानी में इतना मजा नहीं आता।'
सियार ने जवाब दियाः 'मुझे पानी से इतना मजा क्यों आता है यह तुझे जानना है?'
मछली ने कहाः ''हाँ मामा!"
सियार ने तुरन्त ही मछली को गले से पकड़कर तपी हुई बालू पर फेंक दिया। मछली बेचारी पानी के बिना बहुत छटपटाने लगी, खूब परेशान हो गई और मृत्यु के एकदम निकट आ गयी। तब सियार ने उसे पुनः पानी में डाल दिया। फिर मछली से पूछाः
'क्यों? अब तुझे पानी में मजा आने का कारण समझ में आया?'
मछलीः 'हाँ, अब मुझे पता चला कि पानी ही मेरा जीवन है। उसके सिवाय मेरा जीना असम्भव है।'
इस प्रकार मछली की तरह जब तुम भी अभ्यास की जरूरत का अनुभव करोगे तब तुम अभ्यास के बिना रह नहीं सकोगे। रात दिन उसी में लगे रहोगे।
"स्वामीजी ! कृपा करके बताएँ कि हमें अभ्यास में रूचि क्यों नहीं होती?"
पूज्य स्वामीजीः "बाबा ! अभ्यास में तब मजा आयेगा जब उसकी जरूरत का अनुभव करोगे।
एक बार एक सियार को खूब प्यास लगी। प्यास से परेशान होता दौड़ता-दौड़ता वह एक नदी के किनारे पर गया और जल्दी-जल्दी पानी पीने लगा। सियार की पानी पीने की इतनी तड़प देखकर नदी में रहने वाली एक मछली ने उससे पूछाः
'सियार मामा ! तुम्हें पानी से इतना सारा मजा क्यों आता है? मुझे तो पानी में इतना मजा नहीं आता।'
सियार ने जवाब दियाः 'मुझे पानी से इतना मजा क्यों आता है यह तुझे जानना है?'
मछली ने कहाः ''हाँ मामा!"
सियार ने तुरन्त ही मछली को गले से पकड़कर तपी हुई बालू पर फेंक दिया। मछली बेचारी पानी के बिना बहुत छटपटाने लगी, खूब परेशान हो गई और मृत्यु के एकदम निकट आ गयी। तब सियार ने उसे पुनः पानी में डाल दिया। फिर मछली से पूछाः
'क्यों? अब तुझे पानी में मजा आने का कारण समझ में आया?'
मछलीः 'हाँ, अब मुझे पता चला कि पानी ही मेरा जीवन है। उसके सिवाय मेरा जीना असम्भव है।'
इस प्रकार मछली की तरह जब तुम भी अभ्यास की जरूरत का अनुभव करोगे तब तुम अभ्यास के बिना रह नहीं सकोगे। रात दिन उसी में लगे रहोगे।
व्याकुलता क्यों ?
एक मंत्री धर्मात्मा और सत्संगी था| उसे राज दरबार का बहुत काम करना पड़ता था| कभी कभी उससे तंग आ जाता था| परन्तु बाद में जब उसे स्मरण होता था कि यह संसार अनित्य है, तब ठहाके मारता था| कहता था - "में यह क्या कर रहा हूं| किस का काम कर रहा हं? सब नाश्वत है, तो फिर व्याकुलता किसके लिए?"
हमें भी सब अनित्य जानकर दुनिया में चलना चाहिए| विषयों में फंसकर अपना जीवन बर्बाद नही करना चाहिए|
*** सदैव सोच समझकर बोलना चाहिए, नहीं तो शान्ति में रहना चाहिए| बुद्धिमान मनुष्य वह है, जो बोलने से पहले सोचता है|
अपने दोष देखो
दूसरे की पहाड़ जीतनी भूल भी तिल जीतनी करके देखो, किंतु अपनी तिल जीतनी भूल भी पहाड़ जीतनी करके जानो|
यदि कोई तुम्हारी निंदा करे तो प्रसन्नता से वह सुनो| मन को तपाओ नहीं| यदि तुम में सचमुच वह दोष हो तो उसे दूर कराने का निश्चय करो|
सदैव अपने दोष देखा करो| दूसरों के दोषों कि और न देखो|
अपना सखी तू, निज मन मांहीं विचार,
नारायण जो खोट है, ताको तुर्त निवार|
*** संग सदैव सोच सझकर करना चाहिए| संत असतं, पापी महात्मा, भले बुरे का विचार करके संग करो| संग का बहोत प्रभाव पड़ता है|
यदि कोई तुम्हारी निंदा करे तो प्रसन्नता से वह सुनो| मन को तपाओ नहीं| यदि तुम में सचमुच वह दोष हो तो उसे दूर कराने का निश्चय करो|
सदैव अपने दोष देखा करो| दूसरों के दोषों कि और न देखो|
अपना सखी तू, निज मन मांहीं विचार,
नारायण जो खोट है, ताको तुर्त निवार|
*** संग सदैव सोच सझकर करना चाहिए| संत असतं, पापी महात्मा, भले बुरे का विचार करके संग करो| संग का बहोत प्रभाव पड़ता है|
वाणी के चार पाप :-
कभी-भी कड़वी बात नहीं बोलनी चाहिए। किसी भी बात को मृदुता से, मधुरता से एवं अपने हृदय का प्रेम उसमें मिलाकर फिर कहना चाहिए। कठोर वाणी का सर्वथा त्याग कर देना चाहिए। यह वाणी का एक पाप है।.....
हम जो जानते हैं वह न बोलें, मौन रहें तो चल सकता है किन्तु जो बोलें वह सत्य ही होना चाहिए, अपने ज्ञान के अनुसार ही होना चाहिए। अपने ज्ञान का कभी अनादर न करें, तिरस्कार न करें। जब हम किसी के सामने झूठ बोलते हैं तब उसे नहीं ठगते, वरन् अपने ज्ञान को ही ठगते हैं, अपने ज्ञान का ही अपमान करते हैं। इससे ज्ञान रूठ जाता है, नाराज हो जाता है। ज्ञान कहता है कि 'यह तो मेरे पर झूठ का परदा ढाँक देता है, मुझे दबा देता है तो इसके पास क्यों रहूँ ?' ज्ञान दब जाता है। इस प्रकार असत्य बोलना यह वाणी का पाप है।.....
इधर की बात उधर और उधर की बात इधर करना। क्या आप किसी के दूत हैं कि इस प्रकार संदेशवाहक का कार्य करते हैं ? चुगली करना आसुरी संपत्ति के अंतर्गत आता है। इससे कलह पैदा होता है, दुर्भावना जन्म लेती है। चुगली करना यह वाणी का तीसरा पाप है।.....
प्रसंग के विपरीत बात करना। यदि शादी-विवाह की बात चल रही हो तो वहाँ मृत्यु की बात नहीं करनी चाहिए। यदि मृत्यु के प्रसंग की चर्चा चल रही हो तो वहाँ शादी-विवाह की बात नहीं करनी चाहिए।
इस प्रकार मानव की वाणी में कठोरता, असत्यता, चुगली एवं प्रसंग के विरुद्ध वाणी – ये चार दोष नहीं होने चाहिए। इन चार दोषों से युक्त वचन बोलने से बोलनेवाले को पाप लगता है।
हम जो जानते हैं वह न बोलें, मौन रहें तो चल सकता है किन्तु जो बोलें वह सत्य ही होना चाहिए, अपने ज्ञान के अनुसार ही होना चाहिए। अपने ज्ञान का कभी अनादर न करें, तिरस्कार न करें। जब हम किसी के सामने झूठ बोलते हैं तब उसे नहीं ठगते, वरन् अपने ज्ञान को ही ठगते हैं, अपने ज्ञान का ही अपमान करते हैं। इससे ज्ञान रूठ जाता है, नाराज हो जाता है। ज्ञान कहता है कि 'यह तो मेरे पर झूठ का परदा ढाँक देता है, मुझे दबा देता है तो इसके पास क्यों रहूँ ?' ज्ञान दब जाता है। इस प्रकार असत्य बोलना यह वाणी का पाप है।.....
इधर की बात उधर और उधर की बात इधर करना। क्या आप किसी के दूत हैं कि इस प्रकार संदेशवाहक का कार्य करते हैं ? चुगली करना आसुरी संपत्ति के अंतर्गत आता है। इससे कलह पैदा होता है, दुर्भावना जन्म लेती है। चुगली करना यह वाणी का तीसरा पाप है।.....
प्रसंग के विपरीत बात करना। यदि शादी-विवाह की बात चल रही हो तो वहाँ मृत्यु की बात नहीं करनी चाहिए। यदि मृत्यु के प्रसंग की चर्चा चल रही हो तो वहाँ शादी-विवाह की बात नहीं करनी चाहिए।
इस प्रकार मानव की वाणी में कठोरता, असत्यता, चुगली एवं प्रसंग के विरुद्ध वाणी – ये चार दोष नहीं होने चाहिए। इन चार दोषों से युक्त वचन बोलने से बोलनेवाले को पाप लगता है।
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