Wednesday, July 3, 2013

सबसे श्रेष्ठ कर्म क्या है? सारे ब्रह्माण्ड को स्वयं से अभिन्न देखो। अपने को सबसे न्यारा देखो। जैसे मलत्याग करने के बाद सोचते नहीं कि उस मल का क्या हुआ, वह कहाँ गया? इसी प्रकार आत्मस्वरूप में जगने के बाद शरीर, मन आदि का क्या हुआ इसका विचार ही नहीं करना है। उनका आत्यंतिक लय करना है। विचार वही होकर रहो। अन्य कुछ बनोगे तो दुःखी होगे।

सबसे श्रेष्ठ कर्म क्या है? सारे ब्रह्माण्ड को स्वयं से अभिन्न देखो। अपने को सबसे न्यारा देखो। जैसे मलत्याग करने के बाद सोचते नहीं कि उस मल का क्या हुआ, वह कहाँ गया? इसी प्रकार आत्मस्वरूप में जगने के बाद शरीर, मन आदि का क्या हुआ इसका विचार ही नहीं करना है। उनका आत्यंतिक लय करना है। विचार वही होकर रहो। अन्य कुछ बनोगे तो दुःखी होगे।