Wednesday, May 19, 2010

जागो.... उठो.... अपने भीतर सोये हुए निश्चयबल को जगाओ। सर्वदेश, सर्वकाल में सर्वोत्तम आत्मबल को अर्जित करो। आत्मा में अथाह सामर्थ्य है। अपने को दीन-हीन मान बैठे तो विश्व में ऐसी कोई सत्ता नहीं जो तुम्हें ऊपर उठा सके। अपने आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो गये तो त्रिलोकी में ऐसी कोई हस्ती नहीं जो तुम्हें दबा सके।
जैसे स्वप्न में मिली हुई सजा जागृत अवस्था में नहीं रहती, दूध में से घी निकलने के बाद वह दूध में नहीं मिलता अपितु पृथक ही रहता है, लकड़ी जल जाने के बाद वह अग्निरूप हो जाती है और लकड़ी का कहीं नामोनिशान नहीं रहता है, उसी प्रकार संसारस्वप्न में से जो जीव जाग जाता है उसे फिर संसार स्वप्न की कैद में, माता के गर्भ में आने का दुर्भाग्य नहीं होता
hajaaro manushyo me koyi viralaa ishwar ke raaste chalataa hai .. hajaaro ishwar ke raaste chalane waalo me se koyi virale sidhdi paate hai aur wahaa hi ruk jaate…. aise hajaaro me koyi viralaa saty sankalp se aage badhataa hai..us me se koyi viralaa bramhgyaani banataa hai ..
शरीर के तो करोडो करोडो बार जन्म हुए, मृत्यु हुयी… केवल ये ना-समझी है की , ‘मैं ’ दुखी हूँ.. ‘मैं ’ बच्चा हूँ.. ‘मैं ’ फलानी जाती का हूँ.. ये सभी व्यवहार की रमणा है..अपना व्यवहार चलाने के लिए बाहर से चले लेकिन अन्दर से जाने की “सोऽहं.. सोऽहं” मैं वो ही हूँ!..सत -चित-आनंद स्वरुप!….जो पहेले था, बाद में भी रहेगा वो ही मैं अब भी हूँ…
जो मनुष्य संसारसे दु:खी होकर ऐसा सोचता है को कोई तो अपना होता,जो मुझे अपनी शरणमें लेकर,अपने गले लगाकर मेरे दु:ख,सन्ताप,पाप,अभाव,भय नीरसता आदिको हर लेता,उसको भगवान्‌ अपनी भक्ति प्रदान करते हैं।परन्तु जो मनुष्य केवल संसार के दु:खोंसे मुक्त होना चाहता है,उसको भगवान्‌ मुक्ति प्रदान करते हैं।

Monday, May 17, 2010

लक्ष्य जितना ऊँचा होता है उतने ही संकल्प शुद्ध होते हैं। ऊँचा लक्ष्य है मोक्ष,परमात्मा-प्राप्ति, , अनन्त ब्रह्माण्डनायकईश्वर से मिलना। ऊँचा लक्ष्य तुच्छ संकल्पों को दूर कर देता है। ऊँचा संकल्प जितना दृढ़ होगा उतना ही तुच्छ संकल्पों को हटाने में सफलता मिलेगी।, उतना ही ऊँचा जीवन, ऊँची समझ, ऊँचा स्वास्थ्य, ऊँचा सुख, ऊँची शांति और ऊँचे में ऊँचे परमात्मा की प्राप्ति सुलभ होगी।
आप जो भी कार्य करो यज्ञार्थ भावना से करो, ईश्वर से नाता जोड़ने के लिए करो, दूसरों का कल्याण करने की भावना से करो, अपनी वासनाएँ निवृत्त करके जीवन को निर्मल बनाने के हेतु से करो सबमें मेरा ही नारायण स्वरूप विलास कर रहा है'- ऐसी मंगल भावना से व्यवहार होता है वह परम मांगल्य के द्वार खोल देता है।
नम्रतापूर्वक पूज्यश्री सदगुरू के पदारविन्द के पास जाओ। सदगुरू के जीवनदायी चरणों में साष्टांग प्रणाम करो। सदगुरू के चरणकमल की शरण में जाओ। सदगुरू केपावन चरणों की पूजा करो। सदगुरू के पावन चरणों का ध्यान करो। । सदगुरू के यशःकारीचरणों की सेवा में जीवन अर्पण करो।
ऐसा कोई लोक नहीं जिसका विनाश न हो। ऐसा कोई शरीर नहीं जो मरता न हो। ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसका रूपान्तर न हो। यह अकाट्य सिद्धान्त है।अपनी बुद्धि की योग्यता बढ़ाकर, अपनी क्षमता बढ़ाकर यहीं अपनी अमरता का साक्षात्कार कर लो।तुम निर्भीक हो, निर्द्वन्द्व हो। निश्चिन्त जीवन जीने की कला पाकर जीते जी मुक्त बनो।

Friday, May 14, 2010

Apni karni se tum guru ko pass ya door anubhav karte ho. Wo na kisi ko door karte hain, na hi pass laate hain. Tumhari shradha hi tumhe aisa ehsaas karati hai - Ashram SMS
हे नाथ ! हे मेरे नाथ! । छोटा बालक रोता है तो माँ आ ही जाती है । बालक घरका कुछ काम नहीं करता, पर जब वह रोने लगता है, तब माँको सब काम छोडकर बालकको उठाना पडता है । बालकका एकमात्र बल रोना ही है—‘बालानां रोदनं बलम्’ । रोनेमें बड़ी ताकत है । सच्चे ह्रदयसे व्याकुल होकर यह बालक आपको पुकार रहा है, आपके लिए रो रहा है ! आपको आकर उठाना ही पड़ेगा
अगर भगवान् हमारे पापोंसे अटक जायँ तो हमारे पाप भगवान् से प्रबल हुए ! अगर पाप प्रबल (बलवान्) हैं तो भगवान् मिलकर भी क्या निहाल करेंगे ? जो पापोंसे अटक जाय, उसके मिलनेसे क्या लाभ ? परन्तु भगवान् इतने निर्बल नहीं हैं, जो पापोंसे अटक जायँ । उनके समान बलवान् कोई है नहीं, हुआ नहीं, होगा नहीं, हो सकता ही नहीं । आपकी जोरदार इच्छा हो जाय तो आप कैसे ही हों, भगवान् तो मिलेंगे, मिलेंगे, मिलेंगे !
किसीकी भूल न ढूंढो; भूल दिखे तो उसे भूल जाओ, उसके अच्छे हेतु, परिश्रम और लगनकी ह्रदयसे कद्र करो; उसके कार्यमें गुणोको ढूंढों भलाई की खोज करो तुम गुणवान और भले आदमी बन जाओ
भगवान्‌ की व्याकुलता तभी होती है,जब कि वह भक्त संसारके समस्त पदर्थोंसे परमात्मा को बड़ा समझता है;इस लोक और परलोकके समस्त भोगोंको अत्यन्त तुच्छ और नगण्य समझकर केवल एक परम प्यारे परमात्मा के लिये अपने जीवन,धन,ऐश्वर्य,मान,लो्कलज्जा,लोकधर्म और वेदधर्म सबको समर्पण कर चुकता है।
Gurudev ke aage roz RONA chahiye, ki gurudev aap itna satsang ke dwara GYAN de rahe hai, phir bhi hamara vivek, vairagya kyo jagrut nahi hota. Kyo sansar se preeti ho rahi hai, parmatma se preeti kyo nahi hoti, aise din kab aayenge ki ham ye drishyaman jagat swapne jaisa lagega. - Hari Om
माँका ॠण सबसे बड़ा होता है।परन्तु पुत्र भगवान्‌ का भक्त हो जाय तो माँका ऋण नहीं रहता और माँ का कल्याण भी हो जाता है! इसलिये बहनों!माताओ! अपने बालकोंको भगवान्‌ में लगाओ,उनको भक्त बनाओ!आपकी गोदीमें भक्त आये,भगवान्‌ का भजन करनेवाला आये ऐसा बेटा हो।ऐसा बालक होना बिलकुल आपके हाथकी बात है।बालक का पहला गुरु माँ है।माँ का स्वभाव पुत्रपर ज्यादा आता है।
आया जहाँ से सैर करने, हे मुसाफिर ! तू यहाँ। था सैर करके लौट जाना, युक्त तुझको फिर वहाँ। तू सैर करना भूलकर, निज घर बनाकर टिक गया। कर याद अपने देश की, परदेश में क्यों रुक गया।। फँसकर अविद्या जाल में, आनन्द अपना खो दिया। नहाकर जगत मल सिन्धु में, रंग रूप सुन्दर धो दिया। निःशोक है तू सर्वदा, क्यों मोह वश पागल भया। तज दे मुसाफिर ! नींद, जग, अब भी न तेरा कुछ गया।।

Friday, May 7, 2010

jis ka koyi janm nahi hota , jis ka koyi mrutyu nahi hota , vo hum hai…janm humhara nahi hota, sharir ka hota hai..raag dwesh hum ko nahi hota , man me hota hai…bimari hum ko nahi hoti, sharir ko hoti hai..
khana khavoge to pet bharega , koshish karoge to manjil pavoge vese hi souoge to nind me javoge aur didi sona to duniya ke liye hai aap atma nindra me javo , yog nindra me javo aur pa lo apne prabhu ko unki kripa ko
satsang sunte sunte uski masti me kho jana aur dub jana us parmatma me jo nirntar hai , hamesha hai , sadha hai , kabhi dur huwa nahi , kabhi paraya huwa nahi , kabhi alag huwa nahi , jo hamesha hamare pass hai , hamare sath hai , hamare under hai
yah sharir jal jaye uske pahele teri jyot jag jaye , yah tan chut jaye iske pahele sansari akarshan chut jaye , pani ka anjalikoi muje de uske pahele meri ankho se bahete ashru bindu teje pighala de mere data ab to isi daya kar do mere data muje me muj ko dikha do , tuj me mujko basa lo
yah sharir jal jaye uske pahele teri jyot jag jaye , yah tan chut jaye iske pahele sansari akarshan chut jaye , pani ka anjalikoi muje de uske pahele meri ankho se bahete ashru bindu teje pighala de mere data ab to isi daya kar do mere data muje me muj ko dikha do , tuj me mujko basa lo
Bhagwan santi ke mahasagar hain, anand ke mahastrot, ve apne hisse ki shanti, anand,madhurya ka humen anubhav karva rahe hain phir bhi hum unhen door mante hain - Ashram SMS
जिसके पास गुरूकृपा रूपी धन है वह सम्राटों का सम्राट है। जो गुरूदेव की छत्रछाया के नीचे आ गये हैं, उनके जीवन चमक उठते हैं। गुरूदेव ऐसे साथी हैं जो शिष्य के आत्मज्ञान के पथ पर आनेवाली तमाम बाधाओं को काट-छाँटकर उसे ऐसे पद पर पहुँचा देते हैं जहाँ पहुँचकर फिर वह विचलित नहीं होता।
किसी के ह्रदय में व्यर्थ का आघात न करना। अपने व्यवहार से कभी भी किसी के मन को व्यथा न पहुंचाना। गुलाब के समान काँटों से क्षत विक्षत होकर भी सभी को सुगंध का दान देना। किसी की प्रशंसा स्तुति से पिघलना मत एवंकिसी के द्वारा की गई आलोचना से उबलना मत ,आलोचना, आत्मसंशोधन तथा उन्नति में सहायता पहुँचाती है एवं विवेक बुद्धि को जाग्रत रखती है।
हे नाथ ! हम आपके विवेक का दूर उपयोग करके पतनकी तरफ जा रहे हैं और उसमें अपनी बुद्धिमानी मान रहे हैं! हे नाथ! पतित्तोंका उद्धार करना आपका सहज स्वभाव है आपके इस स्वभावको देखकर हमारे मनमें विशेष उत्साह होता है की हम पतित हैं और आप पतितपावन हैं, फिर हमारा उधार होनेमें क्या संदेह है?
‘अब हमें परमात्माकी प्राप्ति ही करनी है, हमें इस मार्गपर ही चलना है’—ऐसा अटल निश्चय हो जाय । लोग निंदा करें या स्तुति करें, धन आ जाय या चला जाय, शरीर ठीक रहे या बीमार हो जाय, हम जीते रहें या मर जायँ, पर हम इस निश्चय पर अडिग रहेंगे । इस तरह ‘मैं’-पनमें यह भाव कर लिया जाय कि ‘मैं तो केवल पारमार्थिक साधक हूँ’ तो फिर साधन अपने-आप होगा ।
सत्य का अधिकारी कौन है? जिसको प्रसन्नता देने के लिए संसार असमर्थ है, अर्थात जिसको भोग में रोग, हर्ष में शोक, संयोग में वियोग, सुख में दुःख, घर में वन, जीवन में मृत्यु का अनुभव होता है, वही सत्य का अधिकारी है
"जीवन की सम्पूर्णता है आनन्द और आनन्द परमात्मा का ही एक रूप या एक नामहै, जिसे सच्चिदानन्द कहा जाता है। हमारा जन्म परमात्मा से मिलने के लिए हीहुआ है और इसी उद्देश्य को लेकर हम दुनिया में आए है। वस्तुतः जीवन एक अवसर है परमात्मा से मिलने के लिए।"
भगवान शिव ने जब विष पीया तो उसको गले मैं रखा और इस दुनिया को कह दिया की दुनिया की कड़वाहट को पी जाना , पर कड़वाहट को पीकर गले तक ही रखना ,गले से नीचे नहीं उतरनेदेना .दिल तक नहीं पहुँचने देना .दुनिया की बातें दिल को लगाने के लिए नहीं है !अगर दिल पर लगाकर बैठ गए तो खुद का जीना मुश्किल हों जाएगा !और अगर कड़वाहट को मुख से बाहर उगल दिया तो दूसरों के लिए परशानी खाडी हों जाएगी

Sunday, May 2, 2010

यह दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है....

यह दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ,
कोई दिन में तारे दिखाए तो क्या है ,
यह महलो यह तख्तो यह ताजो की दुनिया,
यह दोलत के भूखे रिवाजो की दुनिया ,
हकीकत के दुश्मन समाजो की दुनिया,
यह दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ,
हर एक जिस्म के साथ ही मौत चलती ,
यह बढती जवानी अभी देख उड़लती ,
जहा है ख़ुशी वही आहे निकलती ,
यह दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ,
हर एक दिल है घायल हर एक रूह प्यासी ,
निगाहों में उलझन है भीतर उदासी ,
हर एक जोश के साथ है बदहवासी ,
यह दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ,
यहाँ तो खिलौना है इंसान की हस्ती ,
यह बस्ती है मुर्दा परस्तो की बस्ती,
यहाँ पर तो जीवन से है मौत सस्ती ,
यह दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ,
यहाँ सब भटकते है बदकार बनकर,
यहाँ जिस्म सजते है बाजार बनकर ,
यहाँ प्यार होता है व्यापर बनकर,
यह दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ,
यह दुनिया जहा आदमी कुछ नहीं है ,
वफ़ा कुछ नहीं दोस्ती कुछ नहीं है ,
यहाँ सत्य की कदर भी कुछ नहीं है ,
यह दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ,
समझ है तो दुनिया के पीछे न भागो ,
जो भी मद हो छोडो अपने में जागो ,
कुछ अपना न मानो
जो व्यक्ति ध्यान करने लगता है , धन कि तरफ जाने कि उसकी दौड़ अपने आप् कम हो जाती है क्योंकि अब बड़ा धन उपलब्ध होने लगा , छोटी दौड़ छूटने लगी जब हीरे मिलते हो तो कंकड़ पत्थर कौन इकट्ठे करता है ? तुम छोटे से मत लड़ो तुम बड़े को जगाओ छुद्र से लड़े कि भटक जाओगे विराट से जुडो छोटा अपने आप् विराट में लीन हो जाएगा और विराट में लीन होकर छोटा भी विराट हो जाता है...
‘हे प्रभु ! हे दया के सागर ! तेरे द्वार पर आये हैं । तेरे पास कोई कमी नहीं । तू हमें बल दे, तू हमें हिम्मत दे कि तेरे मार्ग पर कदम रखे हैं तो पँहुचकर ही रहें । हे मेरे प्रभु ! देह की ममता को तोड़कर तेरे साथ अपने दिल को जोड़ लें

हे नाथ! दूसरा कौन है जो आपके सदृश दीनों को छाती से लगा ले?जिसको सारा संसार घृणाकी दृष्टिसे देखता है,घर के लोग त्याग देते हैं,कोई भी मुँह से बोलनेवाला नहीं होता,उसके आप होते हैं,उसको तुरंत गोदमें लेकर मस्तक सूँघने लगते हैं,हृदय से लगाकर अभय कर देते हैं।ऐसा कौन पतित है जो आपको पुकारनेपर भी आपकी दयादृष्टिसे वञ्चित रहा है? हे अभयदाता!मैं तो हर तरहसे आपकी शरण हूँ,आपका हूँ,मुझे अपनाइये प्रभु!
आया जहाँ से सैर करने, हे मुसाफिर ! तू यहाँ। था सैर करके लौट जाना, युक्त तुझको फिर वहाँ। तू सैर करना भूलकर, निज घर बनाकर टिक गया। कर याद अपने देश की, परदेश में क्यों रुक गया।। फँसकर अविद्या जाल में, आनन्द अपना खो दिया। नहाकर जगत मल सिन्धु में, रंग रूप सुन्दर धो दिया। निःशोक है तू सर्वदा, क्यों मोह वश पागल भया। तज दे मुसाफिर ! नींद, जग, अब भी न तेरा कुछ गया।।

जहाँ भी गुरुवर चरण धरे वो धरती नसीबों वाली है...

श्रद्धा भाव से गुरु प्रेम में भक्त जो मारे गोता है ,
बिन मांगे सब कुछ वो पता ,उसका मंगल होता है,
गुरु ज्ञान के सूरज से फिर रात न रहती काली है,
जहाँ भी गुरुवर चरण धरे वो धरती नसीबों वाली है,
हम तो जाते भूल उन्हें पर वो तो पास ही रहते हैं,
उनका ह्रदय कोमल निर्मल सदा वो हित ही करते हैं,
हम सबका जीवन एक बगिया , वो बगिया के माली हैं,
जहाँ भी गुरुवर चरण धरे वो धरती नसीबों वाली है,
गुरु शिष्य का रिश्ता जग में सबसे प्यारा होता है ,
पवन हो जाता है वो जो गुरु की याद में रोता है,
गुरु आज्ञा मानी तो समझो अपनी बिगड़ी बना ली है,
जहाँ भी गुरुवर चरण धरे वो धरती नसीबों वाली है …
इनके चरणों में सुख सच्चा , सरे तीर्थ धाम यही ,
गुरु जो देते उससे ऊँचा होता है कोई नाम नहीं,
सार्थक है बस उसका जीवन , जिसने भक्ति पा ली है,
जहाँ भी गुरुवर चरण धरे वो धरती नसीबों वाली है …
निगुरे निंदक महा पापी निर्दोष पे डिश लगते है ,
फिर भी कैसा संत ह्रदय वो सब कुछ सहते जाते हैं,
कर्मों की गति गहन है निंदक मद में फुले जाते हैं ,
ऐसे महापापी तो सीधे नरक कुंड में जाते हैं...

अनमोल वचन...

1) जगत कि ओर देखने वाला अहंकर से भरता है, प्रभु कि ओर देखने वाला प्रेम से पूर्ण होता है
2) अहंकर सदा लेकर प्रसन्न होता है, प्रेम सदा देकर संतुष्ट होता है
3) अहंकर को अकड़ने का अभ्यास है, प्रेम सदा झुक कर रहता है
4) अहंकर जिस पर बरसता है उसे तोड़ देता है, प्रेम जिस पर बरसता है उसे जोड़ देता है
5) अहंकर सबको ताप देता है, प्रेम मीठे जल सी तृप्ति देता है
6) अहंकर संग्रह (collection) में लगा रहता है, प्रेम बाँट बाँट (distribution) कर बढता है
7) अहंकर सबसे आगे रहना चाहता है, प्रेम सबके पीछे रहने में प्रसन्न है
8) अहंकर बहुत कुछ पाकर भी भिखारी है, प्रेम आकिंचन रहकर भी पूर्ण-धनी है
वास्तवमें तो एक भगवान् या आत्मा के अतिरिक्त अन्य किसी की सत्ता ही नहीं, इस सत्य को प्राप्त करके कृतकृत्य हो जाओ। निश्चय मानो, तुम जड अनित्य नहीं सच्चिदानन्द आत्मा हो।
संसार के सुख पाने की इच्छा दोष ले आती है और आत्मसुख पाने की इच्छा सदगुण ले आती है। ऐसा कोई दुर्गुण नहीं जो संसार के भोग की इच्छा से पैदा न हो। व्यक्ति बुद्धिमान हो, लेकिन भोग की इच्छा उसमें दुर्गुण ले आयेगी। चाहे कितना भी बुद्धू हो, लेकिन ईश्वर प्राप्ति की इच्छा उसमें सदगुण ले आएगी।

utho pyare....

कई रात्रियाँ तुमने सो-सोकर गुजार दीं और दिन में स्वाद ले लेकर तुम समाप्त होने को जा रहे हो। शरीर को स्वाद दिलाते-दिलाते तुम्हारी यह उम्र, यह शरीर बुढ़ापे की खाई में गिरने को जा रहा है। शरीर को सुलाते-सुलाते तुम्हारी वृद्धावस्था आ रही है। अंत में तो.... तुम लम्बे पैर करके सो जाओगे। जगाने वाले चिल्लायेंगे फिर भी तुम नहीं सुन पाओगे। डॉक्टर और हकीम तुम्हें छुड़ाना चाहेंगे रोग और मौत से, लेकिन नहीं छुड़ा पायेंगे। ऐसा दिन न चाहने पर भी आयेगा। जब तुम्हें स्मशान में लकड़ियों पर सोना पड़ेगा और अग्नि शरीर को स्वाहा कर देगी। एक दिन तो कब्र में सड़ने गलने को यह शरीर गाड़ना ही है। शरीर कब्र में जाए उसके पहले ही इसके अहंकार को कब्र में भेज दो..... शरीर चिता में जल जाये इसके पहले ही इसे ज्ञान की अग्नि में पकने दो।
इस संसार रूपी अरण्य में कदम-कदम पर काँटे बिखरे पड़े हैं। अपने पावन दृष्टिकोण से तू उन काँटो और केंकड़ों से आकीर्ण मार्ग को अपना साधन बना लेना। विघ्न मुसीबत आये तब तू वैराग्य जगा लेना। सुख व अनुकूलता में अपना सेवाभाव बढ़ा लेना। बीच-बीच में अपने आत्म-स्वरूप में गोता लगाते रहना, आत्म-विश्रान्ति पाते रहना।
जो बिना सीखे हो, वही सच्चा ’ज्ञान’ है अर्थात् स्वभावत: आ जाय । जो बिना हेतु के हो, वही सच्चा ’प्रेम’ है । और जो बिना किये हो, वही सच्चा ’त्याग’ है, क्योंकि सच्चा त्याग करना नहीं पड़ता, हो जाता है

sukh dukh ....

sukh dukh ko apanaa maanate to chhote hote… apane ko nity maanate to nity ke bal se hi to a-nity dikhataa hai… dukh aayaa to socho ki mai dukh ko jaanataa hun, dukh mere ko nahi jaanataa… sukh aayaa…sukh chalaa gayaa… mai to nahi gayaa, mai to rahaa naa… bachapan chalaa gayaa tum gaye kyaa? mai kaali bhut jaisi hun, raat ko dikhe hi nahi… kaali bhut jaisi bhi hai lekin gayi kyaa? …lekin bhut jaise dikhate ye bhi man ki kalpanaa hi hai..jaise hai taise hai lekin ‘jis paramaatm sattaa se dikhate vo dekhane waali sattaa ‘mai’ hun’ aisaa jaane to janm karm divy ho gayaa…! chintaa ke bhaav me chintaa-may janm hotaa… dukh ke bhaav me aaye to dukh-may janm hotaa…

apane shaant swabhaav me sthit baithe to badaa ras aataa hai… bramhgyaani ke aatmaa ke sukh ke aage indra kaa sukh bhi kuchh nahi…indr jis chij ko chaahe, vo aage aa jaaye .. ye sukh ki paraakaasthaa hai.. lekin aatm sukh ke aage ye sukh paane ki kalaa sau vi kalaa hai.. indr jo chij chaahegaa vo bhogane ke liye sukh paane ke liye sharir ki shakti kharchegaa.. aatmshakti waalaa shakti kharchegaa hi nahi, vo to aise hi sukh me hai..!

koyi ichhaa nahi.. sukh swarup aatmaa chamcham laheraa rahaa hai…khud bhi sukh me aur jahaa najar daale un ko bhi sukh dilaaye…!!.. ye nirdosh sukh hai..ye antarang sukh hai…!!!
हो जा अजर ! हो जा अमर !!जो मोक्ष है तू चाहता, विष सम विषय तज तात रे।आर्जव क्षमा संतोष शम दम, पी सुधा दिन रात रे।।संसार जलती आग है, इस आग से झट भाग कर।आ शांत शीतल देश में, हो जा अजर ! हो जा अमर !!
भूल से उत्पन्न हुई असावधानी और असावधानी से उत्पन्न एवं पोषित दोषों को मिटाने में अपने को असमर्थ स्वीकार करना और नित्य प्राप्त,स्वत: सिद्ध निर्दोषता से निराश होना मानव-जीवन का घोर अनादर है।यह नियम है कि जो अपना आदर नहीं करता,उसका कोई आदर नहीं करता।अपने आदर का अर्थ दूसरों का अनादर नहीं है,अपितु दूसरों के अनादर से तो अपना... ही अनादर होने लगता है;क्योंकि जो किसी को भी दोषी मानता है,वह स्वयं निर्दोष नहीं हो सकता।See More