Friday, May 7, 2010

हे नाथ ! हम आपके विवेक का दूर उपयोग करके पतनकी तरफ जा रहे हैं और उसमें अपनी बुद्धिमानी मान रहे हैं! हे नाथ! पतित्तोंका उद्धार करना आपका सहज स्वभाव है आपके इस स्वभावको देखकर हमारे मनमें विशेष उत्साह होता है की हम पतित हैं और आप पतितपावन हैं, फिर हमारा उधार होनेमें क्या संदेह है?

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