Sunday, May 2, 2010

‘हे प्रभु ! हे दया के सागर ! तेरे द्वार पर आये हैं । तेरे पास कोई कमी नहीं । तू हमें बल दे, तू हमें हिम्मत दे कि तेरे मार्ग पर कदम रखे हैं तो पँहुचकर ही रहें । हे मेरे प्रभु ! देह की ममता को तोड़कर तेरे साथ अपने दिल को जोड़ लें

हे नाथ! दूसरा कौन है जो आपके सदृश दीनों को छाती से लगा ले?जिसको सारा संसार घृणाकी दृष्टिसे देखता है,घर के लोग त्याग देते हैं,कोई भी मुँह से बोलनेवाला नहीं होता,उसके आप होते हैं,उसको तुरंत गोदमें लेकर मस्तक सूँघने लगते हैं,हृदय से लगाकर अभय कर देते हैं।ऐसा कौन पतित है जो आपको पुकारनेपर भी आपकी दयादृष्टिसे वञ्चित रहा है? हे अभयदाता!मैं तो हर तरहसे आपकी शरण हूँ,आपका हूँ,मुझे अपनाइये प्रभु!

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