Monday, June 28, 2010

जिस प्रकार नदी या समुंदर पार करते समय नाविक पर विशवास रखना पड़ता है, उसी प्रकार का विशवास हमे भवसागर से पार होने के लिये सदगुरु पर करना चाहिये I
इस देह में यह सनातन जीवात्मा मेरा ही अंश है और वही इस प्रकृति में स्थित मन और पाँचो इन्द्रियों को आकर्षित करता है । वायु गन्ध के स्थान से गन्ध को जैसे ग्रहण करके ले जाता है, वैसे ही देहादि का स्वामी जीवात्मा भी जिस शरीर का त्याग करता है, उससे इस मन सहित इन्द्रियों को ग्रहण करके फिर जिस शरीर को प्राप्त होता है- उसमें जाता है । (८)
हे नाथ ! हृदयमें आपकी लगन लग जाय। दिल में आप धँस जाओ। आपकी रुपमाधुरी आँखोंमें समा जाय, आपके लिये उत्कट अनुराग हो जाय। बस,बस इतना ही और कुछ नहीं चाहिये।
संसार में माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी के सम्बन्ध की तरह गुरु-शिष्य का सम्बन्ध भी एक सम्बन्ध ही है लेकिन अन्य सब सम्बन्ध बन्धन बढ़ाने वाले हैं जबकि गुरु-शिष्य का सम्बन्ध सम बन्धनों से मुक्ति दिलाता है। यह सम्बन्ध एक ऐसा सम्बन्ध है जो सब बन्धनों से छुड़ाकर अन्त में आप भी हट जाता है और जीव को अपने शिवस्वरूप का अनुभव करा देता है।

Tuesday, June 22, 2010

शरणागत भक्त को भगवान् का नाम स्वाभाविक ही बड़ा मीठा,प्यारा लगता है।अगर कोई पूछे कि तुम श्वास क्यों लेते हो? यह हवाको भीतर-बाहर करनेका क्या धन्धा शुरु कर रखा है? तो यही कहेंगे कि भाई! यह धन्धा नहीं है,इसके बिना हम जी ही नहीं सकते।ऐसे ही शरणागत भक्त भजन के बिना रह नहीं सकता।जिसको सब कुछ अर्पित कर दिया,उसके विस्मरण में परम... व्याकुलता,महान् छटपटाहट होने लगती है।
जिसने हमें सब कुछ दिया है,उसने अपने को गुप्त रखा है,अर्थात् ’मैं देता हूँ’,यह प्रकाशित नहीं किया।इतना ही नहीं.उसने अपनेको इतना छिपाया है किजिसे देता है,उसे वह मिली हुई वस्तु अपनीही मालूम होती है,किसी और की नहीं।भला,जिसमें इतनी आत्मीयता है इतना सौहार्द है,क्या हमने कभी एकबार भी वस्तुओं से विमुख होकर उनकी ओर देखा?जिसकी ओ...र हम एकबार भी नहीं देख सके,वह सर्वदा हमारी ओर देखता है।
जिसने हमें सब कुछ दिया है,उसने अपने को गुप्त रखा है,अर्थात् ’मैं देता हूँ’,यह प्रकाशित नहीं किया।इतना ही नहीं.उसने अपनेको इतना छिपाया है किजिसे देता है,उसे वह मिली हुई वस्तु अपनीही मालूम होती है,किसी और की नहीं।भला,जिसमें इतनी आत्मीयता है इतना सौहार्द है,क्या हमने कभी एकबार भी वस्तुओं से विमुख होकर उनकी ओर देखा?जिसकी ओ...र हम एकबार भी नहीं देख सके,वह सर्वदा हमारी ओर देखता है।
शरणागति एक ही बार होती है और सदा के लिये होती है। एक बार ’हे गुरुदेव ! मैं आपका हूँ’ ऐसा कहने के बाद फिर और क्या कहना शेष रह गया? एक बार अपने-आपको दे दिया तो फिर दुबारा क्या देना शेष रह गया?

Monday, June 21, 2010

मोह के कारण ही तुम सांसारिक भोग-सुखोंको चाहते हो और सांसारिक दु:खोंको भयानक मानकर उनसे भागना चाहते हो।विस्वास करो,जो सुख भगवान् का विस्मरण कराकर भगवान् की ओर अरुचि उत्पन्न कर दे,उसके समान कोई भी हमारा शत्रु नहीं है।और जो दु:ख विषयोंसे हटाकर भगवान् की ओर लगा दे,उसके समान हमारा कोई मित्र नहीं है।
भगवान् हमें गोद में लेने के लिये तैयार खड़े हैं,केवल हमें थोड़ा-सा ऊँचा हाथ करना है अथार्त् भगवान् के सम्मुख होना है।हमें भगवान् की कृपा की तरफ देखना है और ’हे मेरे नाथ! हे मेरे नाथ!!’ कहकर भगवान् को पुकारना है।पुकारनेमात्र से भगवान कल्याण कर देते हैं।
यह नियम है कि जिसके मन की बात पूरी होती है,वह उससे प्रेम करने लगता है जिसने उसके मन की बात पूरी की।अत: आस्तिक को अपनी बात पूरी न होने में विशेष कृपा का अनुभव इस कारण होता है कि अब मेरे प्यारे ने अपने मन की बात की है,अत: वे मुझसे अवश्य प्रेम करेंगे।प्रेमास्पद का प्रेम ही तो प्रेमी का सर्वस्व है।इस दृष्टि से आस्तिक किसी ...भी अवस्था में क्षुब्ध नहीं होता।
जो होता है भगवान् की मर्जी से ही होता है। भगवान् की इच्छा में ही अपनी इच्छा मिला दो - भगवान् इससे प्रसन्न हो जाते हैं। आफत मिट जाती है और आनन्दमय जीवन हो जाता है।

अपने को ही सुधार.....

उदारता पदार्थों की भी होती है और विचारों की भी होती है। किसी ने कुछ कह दिया, अपमान कर दिया तो बात को पकड़ मत रखिये। जो बीत गई सो बीत गई। उससे छुटकारा नहीं पाएँगे तो अपने को ही दुःखी होना पड़ेगा। जगत को सुधारने का ठेका हमने-आपने नहीं लिया है। अपने को ही सुधारने के लिए हमारा आपका जन्म हुआ है। माँ के पेट से जन्म लिया, गुरू के चरणों में गया और पूरा सुधर गया ऐसा नहीं होता। जीवन के अनुभवों से गुजरते-गुजरते आदमी सुधरता है, पारंगत होता है और संसार-सागर से पार हो जाता है। व्यक्ति में अगर कोई दोष न रहे तो उसे अभी निर्विकल्प समाधि लग जाय और वह ब्रह्मलीन हो जाय।

Sunday, June 20, 2010

आत्म-साक्षात्कारी सदगुरुदेव और ईश्वर में तनिक भी भेद नहीं है। दोनों एक, अभिन्न और अद्वैत हैं।गुरुदेव का सान्निध्य साधक के लिए एक सलामत नौका है जो अंधकार के उस पार निर्भयता के किनारे पहुँचाती है। जो साधक अपने साधनापथ में ईमानदारी से और सच्चे हृदय से प्रयत्न करता है और ईश्वर साक्षात्कार के लिए तड़पता है उस योग्य शिष्य पर गुरुदेव की कृपा उतरती है।

जो पतित सूर्य का प्रकाश पाता है, जल जिसकी प्यास बुझाता है, वायु जिसे श्वास लेने देती है, पृथ्वी जिसे आश्रय देती है, आप उसे प्यार नहीं दे सकते?

झूठे झगड़ेको छोड़कर साधनमें लग जाओ-जी-जानसे लग जाओ। मनुष्य-जीवन बहुत थोड़े दिनों का है देर न करो। याद रक्खो-देर में कहीं मानव जीवनका अवसान हो गया तो पीछे बहुत पछताना पड़ेगा।

प्राणिमात्र में परमात्मा को निहारने का अभ्यास करके शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण करना यह शील है। यह महा धन है। स्वर्ग की संपत्ति मिल जाय, स्वर्ग में रहने को मिल जाय लेकिन वहाँ ईर्ष्या है, पुण्यक्षीणता है, भय है। जिसको जीवन में शील होता है उसको ईर्ष्या, पुण्यक्षीणता या भय नहीं होता। शील आभूषणों का भी आभूषण है।
उदारता पदार्थों की भी होती है और विचारों की भी होती है। किसी ने कुछ कह दिया, अपमान कर दिया तो बात को पकड़ मत रखिये। जो बीत गई सो बीत गई। उससे छुटकारा नहीं पाएँगे तो अपने को ही दुःखी होना पड़ेगा। जगत को सुधारने का ठेका हमने-आपने नहीं लिया है। अपने को ही सुधारने के लिए हमारा आपका जन्म हुआ है। माँ के पेट से जन्म लिया, गुरू के चरणों में गया और पूरा सुधर गया ऐसा नहीं होता। जीवन के अनुभवों से गुजरते-गुजरते आदमी सुधरता है, पारंगत होता है और संसार-सागर से पार हो जाता है। व्यक्ति में अगर कोई दोष न रहे तो उसे अभी निर्विकल्प समाधि लग जाय और वह ब्रह्मलीन हो जाय।
निर्दोषता की अभिव्यक्ति तभी सुरक्षित रह सकती है,जब किसी के प्रति वैर-भाव की गन्ध तक न रहे।यह तभी सम्भव है जब किसी के प्रति भी दोषी भाव न रहे,अर्थात् अपने प्रति होने वाली बुराई का कारण भी अपने को ही मान लिया जाय।जिन्हें दोषी मान लिया है,यदि किसी कारण उन्हें निर्दोष माननेमें असमर्थता प्रतीत हो,तो उन्हें अनजान बालककी भाँति क्षमा कर दिया जाय।
अपने से सुखियों को देखकर आप प्रसन्न हो जायं।अपने से दुखियों को देख कर आप करुणित हो जायं।जिस हृदय में करुणा निवास करती है उस हृदयमें भोग की रुचि नहीं रहती।और जिस चित्त में प्रसन्नता निवास करती है,उसमें काम की उत्पति नहीं होती।आप हो जायेंगे भोग की वासना से रहित और काम से रहित।यह भौतिक जीवन की पराकाष्टा हो गई।
आप अपने तन,मन,धन सबकी सार्थकता प्रभु की प्रसन्नता में ही समझेंगे,प्रभुकी प्रसन्नता के लिये उनकी त्याग में तनिक भी संकोच नहीं करेंगे तो प्रभु को विवश होकर आपकी खुशामद करनी होगी। ऎसी बात होने पर भी आपको तो प्रभु की ही प्रसन्नता में प्रसन्न रहना चाहिये, उनसे अपनी खुशामद कराने की इच्छा रखना भी एक प्रकार का स्वर्थ ही है।
हे नाथ ! हे परमेश्वर ! हे देवेन्द्र ! हे दयालु! हे अच्युत ! मैं आपसे एक वर चाहता हूँ, वह यह है की प्रभो! जन्म-जन्मान्तरमें मेरी आपमें सुदृढ़, भक्ति बनी रहे
ज्ञानी गुरू की शरण में रहते हुए उनकी ज्ञानरूपी खटाई को पचाकर अपने अज्ञान के नशे को उतारना, यही मनुष्य-देह की सबसे श्रेष्ठ उपलब्धि है। यही परम कल्याण है। यही परम शांति, परमानंद एवं परम पद की प्राप्ति है।

Tuesday, June 15, 2010

परमात्मा मिलना उतना कठिन नहीं है जितना कि पावन सत्संग का मिलना कठिन है। यदि सत्संग के द्वारा परमात्मा की महिमा का पता न हो तो सम्भव है कि परमात्मा मिल जाय फिर भी उनकी पहचान न हो, उनके वास्तविक आनन्द से वंचिर रह जाओ। सच पूछो तो परमात्मा मिला हुआ ही है। उससे बिछुड़ना असम्भव है। फिर भी पावन सत्संग के अभाव में उस मिले हुए मालिक को कहीं दूर समझ रहे हो।
मेंहदी हरी दिखती है लेकिन उसमें लाली छुपी है। ऐसे यह देह नश्वर है लेकिन उसमें शाश्वत चेतना छपी है। उस चेतना का जो दीदार कर लेता है उसने सब कुछ कर लिया। उसका जो अनादर कर देता है, मानो उसने अपने जीवन का अनादर कर लिया। अपने आपका वह दुश्मन हो गया।
संसार में माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी के सम्बन्ध की तरह गुरु-शिष्य का सम्बन्ध भी एक सम्बन्ध ही है लेकिन अन्य सब सम्बन्ध बन्धन बढ़ाने वाले हैं जबकि गुरु-शिष्य का सम्बन्ध सम बन्धनों से मुक्ति दिलाता है। यह सम्बन्ध एक ऐसा सम्बन्ध है जो सब बन्धनों से छुड़ाकर अन्त में आप भी हट जाता है और जीव को अपने शिवस्वरूप का अनुभव करा देता है।
गुरुकृपा, ईश्वरकृपा और शास्त्रकृपा तो अमाप है। किसी के ऊपर कम ज्यादा नहीं है। कृपा हजम करने वाले की योग्यता कम ज्यादा है। योग्यता लाने का पुरुषार्थ करना है, ईश्वर पाने का नहीं।
भगवान्‌ का भक्त होने का तात्पर्य है-’मैं भगवान्‌ का ही हूँ’ इस प्रकार अपनी अहंताको बदल देना।भगवान्‌ में मन लगाने का तात्पर्य है-भगवान्‌ को अपना मानना।भगवान्‌ का पूजन करने का तात्पर्य-सब कार्य पूजाभावसे करना।भगवान्‌ को नमस्कार करने का तात्पर्य है-अपने-आपको भगवान्‌ के समर्पित करना।
जब तक 'तू' और 'तेरा' जिन्दे रहेंगे तब तक परमात्मा तेरे लिये मरा हुआ है। 'तू' और 'तेरा' जब मरेंगे तब परमात्मा तेरे जीवन में सम्पूर्ण कलाओं के साथ जन्म लेंगे। यही आखिरी मंजिल है। विश्व भर में भटकने के बाद विश्रांति के लिए अपने घर ही लौटना पड़ता है। उसी प्रकार जीवन की सब भटकान के बाद इसी सत्य में जागना पड़ेगा, तभी निर्मल, शाश्वत सुख उपलब्ध होगा।
भगवान् परम आश्रय हैं,चाहे सारा संसार तुम्हें भूल जाय,चाहे घर-परिवारके सभी तुमसे मुख मोड़ लें,चाहे तुम सर्वथा निराश्रय हो जाओ,एक बार हृदयसे उनके परम आश्रयत्वपर विश्वास करके मन-ही-मन उनका स्मरण करो। देखोगे,तुम्हें कितना शीघ्र और कितना मधुर और निश्चित आश्रय मिलता है।
किसी दूसरेके दु:ख को अपना दु:ख बना लो और उसके दु:ख को हरण करनेके लिये अपने आपको मिटा दो।इससे तुम मिटोगे नहीं।जहाँ अपने आपको मिटाने जाओगे वहीं तुमको बनानेवाला एक ऐसा आयोजन बन जायगा जो सदाके लिये तुमको बना देगा और ऊँचा बना देगा।
ये विरक्त हैं,ये त्यागी हैं,ये विद्वान हैं,इनको भगवान्‌ मिलेंगे हमारेको नहीं-यह धारणा बिलकुल गलत है।अगर आप भगवान्‌ के लिये व्याकुल हो जाओ,उनके बिना न रह सको,तो बड़े-बड़े पण्डित और बड़े-बड़े विरक्त तो रोते रहेंगे,पहले आपको भगवान्‌ मिलेंगे।
इच्छाएँ हमारी बेवकूफी से पैदा होती हैं और आवश्यकताँ सृष्टिकर्त्ता के संकल्प से पैदा होती हैं। शरीर बना कि उसकी आवश्यकताएँ खड़ी हुईं। सृष्टिकर्त्ता का संकल्प है कि तुम मनुष्य जन्म पाकर मुक्त हो जाओ। अगर तुम अपने को सृष्टिकर्त्ता के संकल्प से जोड़ दो तो तुम्हारी मुक्ति आसानी से हो जाएगी। तुम अपनी नई इच्छाएँ बनाकर चिन्ता करके अपने को कोसते हो तो तुम कर्म के भागी बन जाते हो।
चाहे जितने दार्शनिक ग्रन्थ पढ़ लो, समस्त विश्व का प्रवास करके व्याख्यान दो, हजारों वर्षों तक हिमालय की गुफा में रहो, वर्षों तक प्राणायाम करो, जीवनपर्यन्त शीर्षासन करो, फिर भी गुरुदेव की कृपा के बिना मोक्ष नहीं मिल सकता। गुरुदेव के चरणकमलों का आश्रय लेने से जो आनन्द का अनुभव होता है उसकी तुलना में त्रिलोकी का सुख कुछ भी नहीं है।
ज्ञान होने पर नयापन कुछ नही दीखता अथार्थ फल अज्ञान था ,अब ज्ञान हो गया -ऐसा नही दीखता ज्ञान होने पर ऐसा अनुभव होता है की ज्ञान तो सदा से ही था ,केवल उधर मेरे दृष्ठि नही थी यदि पहले अज्ञान था ,अब ज्ञान हो गया -ऐसा माने तो ज्ञान में सदिपना आ जायेगा ,जबकि ज्ञान सादी नही अनादी है जो सादी होता है ,वह सान्त होता है और जो अनादी होता है वो अनंत होता है हरिओम
ऐसे स्वप्न जैसे जीवन में लोग बेकार का तनाव खिंचाव करके अपनी शक्ति बरबाद कर देते हैं। जब दुःख आ जाय तो याद रखोः वह खबर देता है कि संसार का यही हाल है। जब सुख आ जाय तब समझना कि टिकने वाला नहीं। यह पक्का समझ लिया तो सुख जाते समय दुःख नहीं देगा।
दूसरे कर्म तो कर्ता अपने तरफ से करता है, तब फल होता है भगवान का नाम कर्ता के बल से नहीं भगवान के बल से उद्धार करता है इसलिए नाम जपते बड़ा बड़ा सत्संग करने वाले, बड़े बड़े सिद्ध पुरुष भी भगवान का नाम लेते और लवाते है नाम जपत मंगल दिश दसही मरते समय भी भगवान का नाम ले और ॐ ॐकरे तो "प्राण कालेपी "- मरते समय भी कोई मेरा नाम लेता है तो उसकी दुर्गति से रक्षा होती हैं
वे लोग अपने हृदय में गोविन्द से भी बढ़कर स्थान अपने गुरू को देते थे। गोविन्द ने जीव करके पैदा किया लेकिन गुरू ने जीव में से ब्रह्म करके सदा के लिए मुक्त कर दिया। माँ-बाप देह में जन्म देते हैं लेकिन गुरू उस देह में रहे हुए विदेही का साक्षात्कार कराके परब्रह्म परमात्मा में प्रतिष्ठित कराते हैं, अपने आत्मा की जागृति कराते हैं।
हम जो सत्कार्य करते हैं उससे हमें कुछ मिले – यह जरूरी नहीं है। किसी भी सत्कार्य का उद्देश्य हमारी आदतों को अच्छी बनाना है। हमारी आदते अच्छी बनें, स्वभाव शुद्ध, मधुर हो और उद्देश्य शुद्ध आत्मसुख पाने का हो। जीवन निर्मल बने इस उद्देश्य से ही सत्कार्य करने चाहिए।
इच्छाएँ हमारी बेवकूफी से पैदा होती हैं और आवश्यकताँ सृष्टिकर्त्ता के संकल्प से पैदा होती हैं। शरीर बना कि उसकी आवश्यकताएँ खड़ी हुईं। सृष्टिकर्त्ता का संकल्प है कि तुम मनुष्य जन्म पाकर मुक्त हो जाओ। अगर तुम अपने को सृष्टिकर्त्ता के संकल्प से जोड़ दो तो तुम्हारी मुक्ति आसानी से हो जाएगी। तुम अपनी नई इच्छाएँ बनाकर चिन्ता ...करके अपने को कोसते हो तो तुम कर्म के भागी बन जाते हो।See More
हे आत्मारामी ब्रह्मवेत्ता गुरू ! हमारा हृदय खुला है। आप और आपका ज्ञान हमारे हृदय में प्रविष्ट हो। आपका हम आवाहन करते हैं, आपको बुलाते हैं, आपके ज्ञान को हम निमंत्रण देते हैं। हमारे हृदय में जिज्ञासा, ज्ञान और शान्ति का प्रागट्य हो। आपकी कृपा का सिञ्चन हो। हमारा हृदय उत्सक है। आप जैसे ब्रह्मवेत्ता के वचन हमारे हृदय में टिके।
ऐसा कोई भगवान का प्यारा साधक है ही नहीं जिसके जीवन में विघ्न-बाधाएँ नहीं हैं। .....और जिसके जीवन में विघ्न-बाधाएँ नहीं है तो वह साधक किस बात का ? विघ्न-बाधाएँ होना तुम्हारे साधकपने की निशानी है, संसार से निराले मार्ग पर जाने वालों की निशानी है।
भूतकाल जो गुजर गया उसके लिये उदास मत हो। भविष्य की चिन्ता मत करो। जो बीत गया उसे भुला दो। जो आता है उसे हँसते हुए गुजारो। जो आयेगा उसके लिए विमोहित न हो। आज के दिन मजे में रहो। आज का दिन ईश्वर के लिए। आज खुश रहो। आज निर्भय रहो। यह पक्का कर दो। 'आज रोकड़ा.... काले उधार।' इसी प्रकार आज निर्भय....। आज नहीं डरते। कल तो आयेगी नहीं। जब कल नहीं आयेगी तो परसों कहाँ से आयेगी ? जब आयेगी तो आज होकर ही आयेगी।
जो धन से सुख चाहते हैं, वैभव से सुख चाहते है, वे लोग साधना परिश्रम करके, साधना और परिश्रम के बल पर रहते हैं लेकिन जो भगवान के बल पर भी भगवान को पाना चाहते हैं, भगवान की कृपा से ही भगवान को पाना चाहते हैं, ऐसे भक्त अनन्य भक्त हैं।
करने की, मानने की और जानने की शक्ति को अगर रूचि के अनुसार लगाते हैं तो करने का अंत नहीं होगा, मानने का अंत नहीं होगा, जानने का अंत नहीं होगा। इन तीनों योग्यताओं को आप अगर यथायोग्य जगह पर लगा देंगे तो आपका जीवन सफल हो जायगा।
'उत्तम-से-उत्तम भूषण क्या है ? शील। उत्तम तीर्थ क्या है ? अपना निर्मल मन ही परम तीर्थ है। इस जगत में त्यागने योग्य क्या है ? कनक और कान्ता (सुवर्ण और स्त्री)। हमेशा सुनने योग्य क्या है ? सदगुरू और वेद के वचन।'
अगर शीलरूपी भूषण हमारे पास नहीं है तो बाहर के वस्त्रालंकार, कोट-पैन्ट-टाई आदि सब फाँसी जैसे काम करते हैं। चित्त में आत्म-प्रसाद है, भीतर प्रसन्नता है तो वह शील से, सदगुणों से। परहित के लिए किया हुआ थोड़ा सा संकल्प, परोपकारार्थ किया हुआ थोड़ा-सा काम हृदय में शान्ति, आनन्द और साहस ले आता है।
गुरुदेव का सान्निध्य साधक के लिए एक सलामत नौका है जो अंधकार के उस पार निर्भयता के किनारे पहुँचाती है। जो साधक अपने साधनापथ में ईमानदारी से और सच्चे हृदय से प्रयत्न करता है और ईश्वर साक्षात्कार के लिए तड़पता है उस योग्य शिष्य पर गुरुदेव की कृपा उतरती है।आजकल शिष्य ऐश-आराम का जीवन जीते हुए और गुरु की आज्ञा का पालन किये बिना उनकी कृपा की आकांक्षा रखते है
जिस बालक को माँ ने अपना माना है,वह छोरा दौड़कर गोद में चढ़ जाय तो माँ हँसेगी और जानकर ऊँ-ऊँ-ऊँ करके रोता है तो माँ हँसती है कि देखोठगाई करता है मेरे से।छोरे की वह कौन-सी क्रिया है,जिससे माँ को प्रसन्नता नहीं होती है।ऐसे ही हम भगवान् के बनकर जो भी करें,हमारी हर क्रिया भगवान् का भजन हो जायेगी।कुछ भी काम करो भगवान् खुश होत...... रहते हैं।यह मेरा बालक खेल रहा है।कैसी मस्ती है
भयंकर से भयंकर परिस्थिति आ जाय,तब भी कह दो-"आओ मेरे प्यारे!आओ,आओ,आओ।तुम कोई और नहीं हो।मैं तुम्हें जानता हूँ।तुमने मेरे लिये आवश्यक समझा होगा कि मैं दु:ख के वेश में आऊँ,इसलिये तुम दु:ख के वेश में आये हो।स्वागतम्!वैलकम्! आओ आओ चले आओ!" आप देखेंगे कि वह प्रतिकूलता आपके लिये इतनी उपयोगी सिद्ध होगी कि जिस पर अनेकों अनुकूलत...ायें निछावर की जा सकती है।
जिस प्रकार वस्त्र शरीर से भिन्न हैं, वैसे ही आत्मा शरीर से भिन्न हैं, आकाश की तरह सबमें व्यापक हैं। शरीर को जो इन्द्रियाँ मिली हुई हैं, उनके द्वारा शुभ कर्म करने चाहिए। सदैव शुभ देखना, सुनना एवं बोलना चाहिए।
जोअस्तित्व है उस अस्तित्व का ज्ञान नहीं है इससे हमारा भय जगहें बदल लेता है लेकिन निर्मूल नहीं होता। संसारी लोग सिखा सिखा कर क्या सिखायेंगे ? वे अज्ञानी संसार का बन्धन ही पक्का करायेंगे। जिस फ्रेम में दादा जकड़े गये, पिता जकड़े गये, उसी फ्रेम में पुत्र को भी फिट करेंगे। बन्धन से छुड़ा तो ...नहीं सकेंगे।आत्मतत्त्व नहीं जानने के कारण ही हमको सुख-दुःख की चोट लगती है।See More
शरीर को मैं कहकर बड़े-बड़े महाराजे भी भिखारियों की नाँई संसार से चले गये, परंतु जिसने अपने आत्मा के मैं को धारण कर लिया वह सारे ब्रह्माण्डों का सम्राट बन गया। उसने अक्षय राज्य, निष्कंटक राज्य पा लिया।
जैसे सोना जब खान के अन्दर था तब भी सोना था, अब उसमें से आभूषण बने तो भी वह सोना ही है और जब आभूषण नष्ट हो जायेंगे तब भी वह सोना ही रहेगा, वैसे ही केवल आनंदस्वरूप परब्रह्म ही सत्य है।चाहे शरीर रहे अथवा न रहे, जगत रहे अथवा न रहे, परंतु आत्मतत्त्व तो सदा एक-का-एक, ज्यों का त्यों है।
ओ तूफान ! उठ ! जोर-शोर से आँधी और पानी की वर्षा कर दे ओ आनन्द के महासागर ! पृथ्वी और आकाश को तोड़ दे ओ मानव ! गहरे से गहरा गोता लगा जिससे विचार एवं चिन्ताएँ छिन्न-भिन्न हो जायें आओ, अपने हृदय से द्वैत की भावना को चुन-चुनकर बाहर निकाल दें, जिससे आनन्द का महासागर प्रत्यक्ष लहराने लगे - जीवन रसायन
जीवन में ऐसे कर्म किये जायें कि एक यज्ञ बन जाय। दिन में ऐसे कर्म करो कि रात को आराम से नींद आये। आठ मास में ऐसे कर्म करो कि वर्षा के चार मास निश्चिन्तता से जी सकें। जीवन में ऐसे कर्म करो कि जीवन की शाम होने से पहले जीवनदाता से मुलाकात हो जाय।
जिसके स्पर्शमात्र से बिच्छू के काटने जैसी पीड़ा होती है, ऐसे पौधे कोगुरुजी के बैठने की जगह से मैंने दूर किया तो गुरुजी ने मुझे अच्छी तरहसे फटकारा। फटकार में करुणा तो थी ही, साथ-ही-साथ ज्ञान भी था। मुझे अभी...तक वह याद है।
भजन के द्वारा हम भगवान्‌ को खरीद लेंगे-ऐसा भाव मत रखना।भगवान्‌ तो अपनी कृपा से ही पधारते हैं।
हे नाथ! आप मिलें चाहे उम्रभर न मिलें, दर्शन दें चाहे न दें, पर हम तो आपके ही हैं ।

जो पतित सूर्य का प्रकाश पाता है, जल जिसकी प्यास बुझाता है, वायु जिसे श्वास लेने देती है, पृथ्वी जिसे आश्रय देती है, आप उसे प्यार नहीं दे सकते

जहाँ भगवान् के भक्तजन हों, वह जगह पवित्र हो जाती है, वहाँ की वायु पवित्र हो जाती है
यदि रोग को भी ईश्वर का दिया मानो तो प्रारब्ध-भोग भी हो जाता है और कष्ट तप का फल देता है इससे ईश्वर-कृपा की प्राप्ति होती है व्याकुल मत हो 'कैप्सूल' और 'इन्जेक्शन' आधीन मत हो
झूठे झगड़ेको छोड़कर साधनमें लग जाओ-जी-जानसे लग जाओ। मनुष्य-जीवन बहुत थोड़े दिनों का है देर न करो। याद रक्खो-देर में कहीं मानव जीवनका अवसान हो गया तो पीछे बहुत पछताना पड़ेगा।