Tuesday, April 17, 2012

जब व्यक्ति की बुद्धि सदैव दूसरों को यश देने वाली हो जाती है तो यह बुद्धि "यशोदा" बन जाती है, और व्यक्ति का मन दूसरों की निन्दा से रहित हो जाता है तो यह मन "नन्द" बन जाता है, तब इन्द्रियों के समूह "गोकुल" रूपी शरीर में आनन्द रूप में भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हो जाते हैं
चिन्ता उन्हीं की होती है जिनके पास ठीक चिन्तन नहीं है। शरीर की आवश्यकता पूरी करने के लिए पुरूषार्थ करना हाथ-पैर चलाना, काम करना, इसकी मनाही नहीं है। लेकिन इसके पीछे अन्धी दौड़ लगाकर अपनी चिन्तनशक्ति नष्ट कर देना यह बहुत हानिकारक है।
निश्चिन्त जीवन कैसे हो ?
निश्चिन्त जीवन तब होता है जब तुम ठीक उद्यम करते हो। चिन्तित जीवन तब होता है जब तुम गलत उद्यम करते हो। लोगों के पास है वह तुमको मिले इसमें तुम ...स्वतन्त्र नहीं हो। तुम्हारा यह शरीर अकेला जी नहीं सकता। वह कइयों पर आधारित रहता है। तुम्हारे पास जो है वह दूसरों तक पहुँचाने में स्वतन्त्र हो। तुम दूसरे का ले लेने में स्वतंत्र नहीं हो लेकिन दूसरों को अपना बाँट देने में स्वतंत्र हो। मजे की बात यह है कि जो अपना बाँटता है वह दूसरों का बहुत सारा ले सकता है। जो अपना नहीं देता और दूसरों का लेना चाहता है उसको ज्यादा चिन्ता रहती है।
जो खुद बड़ा होता है, वह दूसरे को भी बड़ा ही बनाता है । जो दूसरे को छोटा बनाता है, वह खुद छोटा होता है । जो वास्तवमेँ बड़ा होता है, उसको छोटा बनने मेँ लज्जा भी नहीँ आती । क्षत्रियोँ के समुदाय मेँ, अठारह अक्षौहिणी सेना मेँ भगवान घोड़े हाँकनेवाले बने । अर्जुन ने कहा कि दोनोँ सेनाओँ के बीच मेँ मेरा रथ खड़ा करो तो भगवान शिष्य की तरह अर्जुन की आज्ञा का पालन करते हैँ । ऐसे ही पाण्डवोँ ने यज्ञ किया तो उसमेँ सबसे पहले भगवान श्रीकृष्ण का पूजन किया । परंतु उस यज्ञ मेँ ब्राह्मणोँ की जूठी पत्तलेँ उठाने का काम भी भगवान ने किया । छोटा काम करने मेँ भगवान को लज्जा नहीँ आती । जो खुद छोटा होता है, उसी को लज्जा आती है और भय लगता है कि कोई मेरे को छोटा न समझ ले, कोई मेरा अपमान न कर दे ।

Sunday, April 15, 2012

पारिवारिक मोह और आसक्ति से अपने को दूर रखो। अपने मन में यह दृढ़ संकल्प करके साधनापथ पर आगे बढ़ो कि यह मेरा दुर्लभ शरीर न स्त्री-बच्चों के लिए है, न दुकान-मकान के लिए है और न ही ऐसी अन्य तुच्छ चीजों के संग्रह करने के लिए है। यह दुर्लभ शरीर आत्म ज्ञान प्राप्त करने के लिए है। मजाल है कि अन्य लोग इसके समय और सामर्थ्य को चूस लें और मैं अपने परम लक्ष्य आत्म-साक्षात्कार से वंचित रह जाऊँ? बाहर के नाते-रिश्तों को, बाहर के सांसारिक व्यवहार को उतना ही महत्त्व दो जहाँ तक कि वे साधना के मार्ग में विघ्न न बनें। साधना मेरा प्रमुख कर्त्तव्य है, बाकी सब कार्य गौण हैं – इस दृढ़ भावना के साथ अपने पथ पर बढ़ते जाओ।

किसी भी अनुकूलता की आस मत करो। संसारी तुच्छ विषयों की माँग मत करो। विषयों की माँग कोई भी हो, तुम्हें दीन बना देगी। विषयों की दीनतावालों को भगवान नहीं मिलते।
साधक को सबसे पहले 'मैं भगवान का हूँ' इस प्रकार अपने अहंता को बदल देना चाहिए। कारण कि बिना अहंता के बदले साधन सुगमता से नहीं होता और अहंता के बदलने पर साधन सुगमता से, स्वाभाविक ही होने लगता है।

विवाह हो जाने पर कन्या अपनी अहंता को बदल देती है कि 'मैं तो ससुराल की ही हूँ' और पिता के कुल का सम्बन्ध बिल्कुल छूट जाता है।

ऐसे ही साधक को अपनी अहंता बदल देनी चाहिए कि 'मैं भगवान का हूँ और भगवान मेरे हैं, मैं संसार का नहीं हूँ और संसार मेरा नहीं है।'

अहंता के बदलने पर ममता भी अपने आप बदल जाती है।...... पूज्यपाद श्रीबापूजी
सुख का दृश्य भी आयेगा और जायेगा तो दुःख का दृश्य भी आयेगा और जायेगा। पर्दे को क्या? कई फिल्में और उनके दृश्य आये और चले गये, पर्दा अपनी महिमा में स्थित है। तुम तो छाती ठोककर कहोः ‘अनुकूलता या प्रतिकूलता, सुख या दुःख जिसे आना हो आये और जाय। मुझे क्या...?’ किसी भी दृश्य को सच्चा मत मानो। तुम दृष्टा बनकर देखते रहो, अपनी महिमा में मस्त रहो।
पारिवारिक मोह और आसक्ति से अपने को दूर रखो। अपने मन में यह दृढ़ संकल्प करके साधनापथ पर आगे बढ़ो कि यह मेरा दुर्लभ शरीर न स्त्री-बच्चों के लिए है, न दुकान-मकान के लिए है और न ही ऐसी अन्य तुच्छ चीजों के संग्रह करने के लिए है। यह दुर्लभ शरीर आत्म ज्ञान प्राप्त करने के लिए है। मजाल है कि अन्य लोग इसके समय और सामर्थ्य को चूस लें और मैं अपने परम लक्ष्य आत्म-साक्षात्कार से वंचित रह जाऊँ? बाहर के नाते-रि...श्तों को, बाहर के सांसारिक व्यवहार को उतना ही महत्त्व दो जहाँ तक कि वे साधना के मार्ग में विघ्न न बनें। साधना मेरा प्रमुख कर्त्तव्य है, बाकी सब कार्य गौण हैं – इस दृढ़ भावना के साथ अपने पथ पर बढ़ते जाओ।

किसी भी अनुकूलता की आस मत करो। संसारी तुच्छ विषयों की माँग मत करो। विषयों की माँग कोई भी हो, तुम्हें दीन बना देगी। विषयों की दीनतावालों को भगवान नहीं मिलते।
श्री दादा गुरुवाणी - १६ अप्रैल २०१२

विकार कब तक?

आसक्ति (मोह), काम, क्रोध आदि विकार क्या हैं? जांच कर देखोगे तो वे कुछ नहीं हैं| राग और द्वेष की अग्नि जलाती है| वे सब तब तक हैं, जब तक तुमने वास्तविकता को नहीं पहचाना है| जब वास्तविकता को पहचानोगे, जब सब में चेतन का चमत्कार देखोगे, तब कुछ नहीं रहेगा, सभी विकार हट जाएंगे| जिसे अपना बेटा समझते हो और इसलिए उनसे मोह रखते हो, जब वे चले जाएंगे, तब उनमें भी चेतन का चमत्कार समझोगे| तुम यह शरीर नहीं हो, न बुझने वाली ज्योति हो|

*** तीसरी कृपा है सतगुरु की| सतगुरु कृपा से अज्ञान के तीनों परदे दूर होते हैं और मन निर्मल होता है|
स्वय दिखना चाहिए ! उस दर्शन से - वह दर्शन ही जीवन कि और ले जाने का मार्ग बन जाता है ! और तब जीवन पाने के लिए क्या करू ? यह नहीं पूछना पड़ता है ! जैसे ही यह दर्शन होता है कि मैं मृत हूँ ...मेरा अब तक का होना .....मेरा अब तक का व्यक्तित्व ......यह सब मृत्यु ही है, ...और साथ ही साथ उसके भी दर्शन होने लगते है जो कि मृत्यु नहीं है !

Thursday, April 5, 2012

हर समय, हर स्थान में जिस का अस्तित्व है उस सत्य स्वरूप चिद्घन चैत्यन्य परमात्मा का नाम हरि है..जिस के स्मरण से दुख, शोक, पाप हर जाते है उस परमात्मा का नाम हरि है..
श्री दादा गुरुवाणी - ५ अप्रैल २०१२

जीवन का उद्देश्य

मनुष्य शरीर, जाती, वर्ग, आश्रम, धर्म आदि से अपनी एकता करके, उनका अभिमान करने लगता है, उन्हें अपना समझता है ओर उनके अनुसार स्वयं को कई बंधनों में बांध कर राग द्वेष करने लगता है, तभी उनका मन अशुद्ध रहेता है| अतः साधक को यही विश्वास ओर निश्चय करना चाहिए कि मैं शरीर नहीं हूं| मुझे मनुष्य शरीर भगवान की कृपा से साधना के लिए मिला है| यह निश्चय करके शरीर में सुख की भावना नहीं रखनी चाहिए| जो प्राप्त हो, उसका शुद्ध उपयोग करना चाहिए|

*** विषय विकारों को थोड़ा करके न जानो| सौ मण दूध में यदि एक बूंद विष की डालोगे तो सौ मण ही व्यर्थ जायेगा| विषय विकारों को सांप के विष से भी अधिक भयानक समझो|

Tuesday, April 3, 2012

गलत ढंग से चित्त का निर्माण हो जाता है तो वह बन्धन व दुःख का कारण बन जायगा। जैसे, चित्त का निर्माण हो गया कि मैं अमुक जाति का हूँ, यह मेरा नाम है, मैं स्त्री हूँ या पुरूष हूँ।

इस प्रकार के चित्त का निर्माण हो गया तो उसके लिए आदर के दो शब्द जीवन बन जाते हैं और अनादर के दो शब्द मौत बन जाते हैं। झूठे संस्कारों से चित्त का निर्माण हो गया।

क्योंकि जो कुछ नाम-रूप हैं, सुख-दुःख हैं, अनुकूलता-प्रतिकूलता हैं वे सब माया में खिलवाड़ मात्र हैं। मायामात्रं इदं द्वैतम्। यह सारा प्रपंच जो दिख रहा है वह सब माया मात्र है।

देखिये सुनिये गुनिये मन माँहि।
मोहमूल परमारथ नाँही।।........ पूज्यपाद श्रीबापूजी
दोस्त कभी भी आपका साथ छोड़ सकता है, भाई कभी भी आपसे मुंह मोड़ सकता हैं, इसिलएः-
1- हमेशा अपनी क्षमता, सामर्थ्य और बाजुओं पर भरोसा करें।
2- सफल लोगों से प्रेरणा लेकर कार्य करें।
3- छोटो को देखकर जींएं।
4- बड़ों से सीखकर आगें बढ़ें।
5- चुनौतियों का डटकर सामना करें।
6- संकट के लिए तैयार रहें और सुख के लिए निरन्तर प्रयत्न करते रहें।
इसका सुखद परिणाम यह मिलेगा कि जीवन में कभी भी आपको दुःखी व निराश नहीं होना पड़ेगा।
मोह किस को बोलते? विपरीत ज्ञान को मोह बोलते.

है तो सत-चित-आनंद स्वरूप लेकिन मान रहे अपने को शरीर …मान रहे अपने को अमुक जातीवाला, अमुक कर्म वाला, अमुक बंधन वाला…मान मान के फसते इस को बोलते मोह ..
सदगुरु ही जगत में तुम्हारे सच्चे मित्र हैं। मित्र बनाओ तो उन्हें ही बनाओ, भाई-माता-पिता बनाओ तो उन्हें ही बनाओ। गुरुभक्ति तुम्हें जड़ता से चैतन्यता की ओर ले जायेगी। जगत के अन्य नाते-रिश्ते तुम्हें संसार में फँसायेंगे, भटकायेंगे, दुःखों में पटकेंगे, स्वरूप से दूर ले जायेंगे। गुरु तुम्हें जड़ता से, दुःखों से, चिन्ताओं से मुक्त करेंगे। तुम्हें अपने आत्मस्वरूप में ले जायेंगे।

Monday, April 2, 2012

धार्मिक आदमी वह नहीं है,जो ईश्‍वर को खोजता है,बल्कि धार्मिक आदमी वह है,जिसे खोजने के लिए ईश्‍वर को मजबूर होना पडे। सिर्फ मंदिर जाने से कोई धार्मिक नहीं हो जाता,धार्मिक तो वह है,जो जहां बैठ जाए,वह जगह मंदिर बन जाए। जहां भी जाए,वहीं मंदिर की सुगंध आने लगे। जहां खडा हो जाए,वह भूमि पवित्र हो जाए। जहां देख ले,वहां प्रार्थना की हवा छा जाए।

एकाग्रताः सफलता की कुंजी....

मनोवैज्ञानिकों का विज्ञान अगर मेज को कुर्सी दिखाने में सफल हो सकता है तो योगियों का विज्ञान जड़ में छुपे हुए चेतन को प्रकट करने में सफल क्यों नहीं हो सकता? वास्तव में जड़ जैसी कोई चीज नहीं है। जो जड़ दिखता है वह सब चेतन का विवर्त ही है। चेतन की घन सुषुप्ति को हम जड़ कहते हैं, क्षीण सुषुप्ति को वृक्ष आदि कहते हैं। वही चेतन अनेक प्रकार के स्वप्नों में, कल्पना में जब होता है तब उसी को जीव कहते हैं और वही जब अपने स्वरूप में जागता है तब शिवस्वरूप हो जाता है।
रामायण का विद्वान हो चाहे भागवत का विद्वान हो, कथाकार हो चाहे श्रोता हो, वकील हो चाहे न्यायाधीश हो लेकिन जब गूढ़ विषय का या गूढ़ बात का रहस्य खोजना हो तब वे लोग शांत और स्थिर हो जाते हैं। स्थिर होने का उनका जितना अभ्यास होता है उतना वे उस विषय में अधिक कुशल होते हैं।
यहाँ शंकराचार्य जी की बात हमें शब्दशः स्वीकार्य है कि मन और इन्द्रियों की एकाग्रता ही परम तप है। उनका जब सब धर्मों से महान है।
जो लोग भक्ति के मार्ग पर हैं और एकाग्रता की ओर ध्यान नहीं देते वे बेचारे रोते हैं किः "कुछ नहीं हुआ.... पच्चीस साल से भक्ति करते हैं लेकिन लड़का हमारा कहा नहीं मानता।"
जो लोग योग की ओर चले हैं लेकिन योग के द्वारा एकाग्रता का जो तरीका जानना चाहिए वह नहीं जाना तो महीना-दो-महीना योग करके कहेंगे कि योग में कुछ नहीं है, हमने करके देख लिया।
एकाग्रता कैसे प्राप्त होती है इस विषय का ज्ञान जब तक नहीं है तब तक अदभुत सामर्थ्य, हमारे अदभुत खजाने जो सुषुप्त हैं, छुपे हुए हैं, उनसे हम लोग वंचित रह जाते हैं। एकाग्रता हुई तो तपी का तप सिद्ध हो जायेगा, जपी का जप सफल हो जायेगा, योगी का योग सिद्ध हो जायेगा, सत्ताधीश सत्ता में सफल हो जायेगा, दुकानदार दुकानदारी में सफल हो जायेगा।
वह जो अपने पैरों पर नहीं खड़ा है, वह किसके पैरों पर खड़ा हो सकता है ? बुद्ध ने कहा है : अपने दीपक स्वयं बनो ! अपनी शरण स्वयं बनो ! स्वशरण के अतिरिक्त और कोई सम्यक गति नहीं है ! यही मैं कहता हूँ !
साधना, जीवन का, कोई खंड अंश नहीं है ! वह तो समग्र जीवन है ! उठना, बैठना, बोलना, हँसना ....सभी में उसे होना है ! तभी वह सार्थक और सहज होती है !