Monday, April 2, 2012

एकाग्रताः सफलता की कुंजी....

मनोवैज्ञानिकों का विज्ञान अगर मेज को कुर्सी दिखाने में सफल हो सकता है तो योगियों का विज्ञान जड़ में छुपे हुए चेतन को प्रकट करने में सफल क्यों नहीं हो सकता? वास्तव में जड़ जैसी कोई चीज नहीं है। जो जड़ दिखता है वह सब चेतन का विवर्त ही है। चेतन की घन सुषुप्ति को हम जड़ कहते हैं, क्षीण सुषुप्ति को वृक्ष आदि कहते हैं। वही चेतन अनेक प्रकार के स्वप्नों में, कल्पना में जब होता है तब उसी को जीव कहते हैं और वही जब अपने स्वरूप में जागता है तब शिवस्वरूप हो जाता है।
रामायण का विद्वान हो चाहे भागवत का विद्वान हो, कथाकार हो चाहे श्रोता हो, वकील हो चाहे न्यायाधीश हो लेकिन जब गूढ़ विषय का या गूढ़ बात का रहस्य खोजना हो तब वे लोग शांत और स्थिर हो जाते हैं। स्थिर होने का उनका जितना अभ्यास होता है उतना वे उस विषय में अधिक कुशल होते हैं।
यहाँ शंकराचार्य जी की बात हमें शब्दशः स्वीकार्य है कि मन और इन्द्रियों की एकाग्रता ही परम तप है। उनका जब सब धर्मों से महान है।
जो लोग भक्ति के मार्ग पर हैं और एकाग्रता की ओर ध्यान नहीं देते वे बेचारे रोते हैं किः "कुछ नहीं हुआ.... पच्चीस साल से भक्ति करते हैं लेकिन लड़का हमारा कहा नहीं मानता।"
जो लोग योग की ओर चले हैं लेकिन योग के द्वारा एकाग्रता का जो तरीका जानना चाहिए वह नहीं जाना तो महीना-दो-महीना योग करके कहेंगे कि योग में कुछ नहीं है, हमने करके देख लिया।
एकाग्रता कैसे प्राप्त होती है इस विषय का ज्ञान जब तक नहीं है तब तक अदभुत सामर्थ्य, हमारे अदभुत खजाने जो सुषुप्त हैं, छुपे हुए हैं, उनसे हम लोग वंचित रह जाते हैं। एकाग्रता हुई तो तपी का तप सिद्ध हो जायेगा, जपी का जप सफल हो जायेगा, योगी का योग सिद्ध हो जायेगा, सत्ताधीश सत्ता में सफल हो जायेगा, दुकानदार दुकानदारी में सफल हो जायेगा।

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