Thursday, April 5, 2012

श्री दादा गुरुवाणी - ५ अप्रैल २०१२

जीवन का उद्देश्य

मनुष्य शरीर, जाती, वर्ग, आश्रम, धर्म आदि से अपनी एकता करके, उनका अभिमान करने लगता है, उन्हें अपना समझता है ओर उनके अनुसार स्वयं को कई बंधनों में बांध कर राग द्वेष करने लगता है, तभी उनका मन अशुद्ध रहेता है| अतः साधक को यही विश्वास ओर निश्चय करना चाहिए कि मैं शरीर नहीं हूं| मुझे मनुष्य शरीर भगवान की कृपा से साधना के लिए मिला है| यह निश्चय करके शरीर में सुख की भावना नहीं रखनी चाहिए| जो प्राप्त हो, उसका शुद्ध उपयोग करना चाहिए|

*** विषय विकारों को थोड़ा करके न जानो| सौ मण दूध में यदि एक बूंद विष की डालोगे तो सौ मण ही व्यर्थ जायेगा| विषय विकारों को सांप के विष से भी अधिक भयानक समझो|

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