Monday, April 2, 2012

वह जो अपने पैरों पर नहीं खड़ा है, वह किसके पैरों पर खड़ा हो सकता है ? बुद्ध ने कहा है : अपने दीपक स्वयं बनो ! अपनी शरण स्वयं बनो ! स्वशरण के अतिरिक्त और कोई सम्यक गति नहीं है ! यही मैं कहता हूँ !
साधना, जीवन का, कोई खंड अंश नहीं है ! वह तो समग्र जीवन है ! उठना, बैठना, बोलना, हँसना ....सभी में उसे होना है ! तभी वह सार्थक और सहज होती है !

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