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स्वय दिखना चाहिए ! उस दर्शन से - वह दर्शन ही जीवन कि और ले जाने का मार्ग बन जाता है ! और तब जीवन पाने के लिए क्या करू ? यह नहीं पूछना पड़ता है ! जैसे ही यह दर्शन होता है कि मैं मृत हूँ ...मेरा अब तक का होना .....मेरा अब तक का व्यक्तित्व ......यह सब मृत्यु ही है, ...और साथ ही साथ उसके भी दर्शन होने लगते है जो कि मृत्यु नहीं है !
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