Sunday, May 2, 2010

यह दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है....

यह दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ,
कोई दिन में तारे दिखाए तो क्या है ,
यह महलो यह तख्तो यह ताजो की दुनिया,
यह दोलत के भूखे रिवाजो की दुनिया ,
हकीकत के दुश्मन समाजो की दुनिया,
यह दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ,
हर एक जिस्म के साथ ही मौत चलती ,
यह बढती जवानी अभी देख उड़लती ,
जहा है ख़ुशी वही आहे निकलती ,
यह दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ,
हर एक दिल है घायल हर एक रूह प्यासी ,
निगाहों में उलझन है भीतर उदासी ,
हर एक जोश के साथ है बदहवासी ,
यह दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ,
यहाँ तो खिलौना है इंसान की हस्ती ,
यह बस्ती है मुर्दा परस्तो की बस्ती,
यहाँ पर तो जीवन से है मौत सस्ती ,
यह दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ,
यहाँ सब भटकते है बदकार बनकर,
यहाँ जिस्म सजते है बाजार बनकर ,
यहाँ प्यार होता है व्यापर बनकर,
यह दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ,
यह दुनिया जहा आदमी कुछ नहीं है ,
वफ़ा कुछ नहीं दोस्ती कुछ नहीं है ,
यहाँ सत्य की कदर भी कुछ नहीं है ,
यह दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ,
समझ है तो दुनिया के पीछे न भागो ,
जो भी मद हो छोडो अपने में जागो ,
कुछ अपना न मानो

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