Thursday, March 22, 2012

विपत्तियों के पहाड़, दुःखों के समुद्र हमें दुःखी बनाने में समर्थ नहीं हैं, क्योंकि सर्वसमर्थ हमारा आत्मा हमारा परम हितैषी है । केवल हम उसे अपना मानें, समर्थ मानें, प्रीतिपूर्वक सुमिरें । अचेतन अवस्था में भी वह हमारा साथ नहीं छोड़ता । मृत्यु भी हमारे और ईश्वर के अमर संबंध को नहीं तोड़ सकती । हाय राम ! ऐसे पिया को छोड़कर किस-किसकी शरण लोगे ? किस-किसके आगे गिड़गिड़ाओगे ? हरि शरणम्... प्रभु शरणम्... । ॐ... ॐ... ॐ... ईश्वर को पाये बिना दुनिया की कोई भी विद्या पा ली तो अंत में घुटने टेकने ही पड़ते हैं ।

No comments:

Post a Comment