दृढ़तापूर्वक
निश्चय करो कि तुम्हारी जो विशाल काया है, जिसे तुम नाम और रुप से ‘मैं’
करके सँभाल रहे हो उस काया का, अपने देह का अध्यास आज तोड़ना है । साधना के
आखिरी शिखर पर पँहुचने के लिए यह आखिरी अड़चन है । इस देह की ममता से पार
होना पड़ेगा । जब तक यह देह की ममता रहेगी तब तक किये हुए कर्म तुम्हारे लिए
बंधन बने रहेंगे । जब तक देह में आसक्ति बनी रहेगी तब तक विकार तुम्हारा
पीछा न छोड़ेगा । चाहे तुम लाख उपाय कर लो लेकिन जब तक देहाध्यास बना रहेगा
तब तक प्रभु के गीत नहीं गूँज पायेंगे । जब तक तुम अपने को देह मानते रहोगे
तब तक ब्रह्म-साक्षात्कार न हो पायेगा । तुम अपने को हड्डी, मांस, त्वचा,
रक्त, मलमूत्र, विष्टा का थैला मानते रहोगे तब तक दुर्भाग्य से पिण्ड न
छूटेगा । बड़े से बड़ा दुर्भाग्य है जन्म लेना और मरना । हजार हजार सुविधाओं
के बीच कोई जन्म ले, फर्क क्या पड़ता है? दु:ख झेलने ही पड़ते हैं उस बेचारे
को ।
हृदयपूर्वक ईमानदारी से प्रभु को प्रार्थना करो कि:
‘हे प्रभु ! हे दया के सागर ! तेरे द्वार पर आये हैं । तेरे पास कोई कमी नहीं । तू हमें बल दे, तू हमें हिम्मत दे कि तेरे मार्ग पर कदम रखे हैं तो पँहुचकर ही रहें । हे मेरे प्रभु ! देह की ममता को तोड़कर तेरे साथ अपने दिल को जोड़ लें |’
हृदयपूर्वक ईमानदारी से प्रभु को प्रार्थना करो कि:
‘हे प्रभु ! हे दया के सागर ! तेरे द्वार पर आये हैं । तेरे पास कोई कमी नहीं । तू हमें बल दे, तू हमें हिम्मत दे कि तेरे मार्ग पर कदम रखे हैं तो पँहुचकर ही रहें । हे मेरे प्रभु ! देह की ममता को तोड़कर तेरे साथ अपने दिल को जोड़ लें |’

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