यह
सत्य है कच्चे कान के लोग दुष्ट निन्दकों के वाग्जाल में फँस जाते हैं।
जिस व्यक्ति ने अपने जीवन में आत्मशांति देने वाला, परमात्मा से जोड़ने वाला
कोई काम नहीं किया है, उसकी बात सच्ची मानने का कोई कारण ही नहीं है।
तदुपरान्त मनुष्य को यह भी विचार करना चाहिए कि जिसकी वाणी और व्यवहार से
हमें जीवन-विकास की प्रेरणा मिलती है, उसका यदि कोई अनादर करना चाहे तो हम
उस महापुरुष की निन्दा कैसे सुन लेंगे? व कैसे मान लेंगे?
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