ख होकर नीच योनियों में जाओगे।
तुम ईमानदारी से सभी का मंगल चाहो, सभी का हित चाहो और फिर अपना। समाज का मंगल चाहना – यह संसार की सेवा हो गयी। ईश्वर को प्रेम करना – यह ईश्वर की सेवा हो गयी और अपने आत्मा में आकर बैठना, अपनी सेवा हो गयी। बस, तीन सेवाएँ करनी हैं और क्या है ! अपने-आपमें बैठना है, तो मंत्रोच्चारण करते हुए निःसंकल्प हों – ૐ ૐ परमात्मने नमः। ૐૐ आनंदस्वरूपाय नमः। ૐ....ૐ..... ૐ.... माने जो सारी सृष्टियों का पालनहार, कर्ता-धर्ता है और अंतर्यामी होकर विराज रहा है।
जो ईश्वर को भोगता है वह लघु साधना में जाता है लेकिन जो ईश्वर को भोगते हुए जानता है, ʹवह ईश्वर गुरु हैʹ - ऐसा जानकर स्वयं भी गुरु बन जाता है और लघुता से पार हो जाता है।
तुम ईमानदारी से सभी का मंगल चाहो, सभी का हित चाहो और फिर अपना। समाज का मंगल चाहना – यह संसार की सेवा हो गयी। ईश्वर को प्रेम करना – यह ईश्वर की सेवा हो गयी और अपने आत्मा में आकर बैठना, अपनी सेवा हो गयी। बस, तीन सेवाएँ करनी हैं और क्या है ! अपने-आपमें बैठना है, तो मंत्रोच्चारण करते हुए निःसंकल्प हों – ૐ ૐ परमात्मने नमः। ૐૐ आनंदस्वरूपाय नमः। ૐ....ૐ..... ૐ.... माने जो सारी सृष्टियों का पालनहार, कर्ता-धर्ता है और अंतर्यामी होकर विराज रहा है।
जो ईश्वर को भोगता है वह लघु साधना में जाता है लेकिन जो ईश्वर को भोगते हुए जानता है, ʹवह ईश्वर गुरु हैʹ - ऐसा जानकर स्वयं भी गुरु बन जाता है और लघुता से पार हो जाता है।

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