शास्त्रों
में आता है कि संत की निन्दा, विरोध या अन्य किसी त्रुटि के बदले में संत
क्रोध कर दें, शाप दे दें तो इतना अनिष्ट नहीं होता जितना अनिष्ट संतों की
खामोशी व सहनशीलता के कारण होता है। सच्चे संतों की बुराई का फल तो भोगना
ही पड़ता है। संत तो दयालु और उदार होते हैं। वे तो क्षमा कर देते हैं,
परंतु प्रकृति कभी नहीं छोड़ती। इतिहास उठाकर देखें तो पता चलेगा कि सच्चे
संतों व महापुरुषों के निन्दकों को कैसे-कैसे भीषण कष्टों को सहते हुए
बेमौत मरना पड़ा है और पता नहीं किन-किन नरकों को सड़ना पड़ा है। अतएव समझदारी
इसी में है कि हम संतों की प्रशंसा करके या उनके आदर्शों को अपनाकर लाभ न
ले सकें तो उनकी निन्दा करके पुण्य व शांति भी नष्ट नहीं करें।
पराशर मुनि ने राजा जनक को कहा हैः
कृतानि यानि कर्माणि दैवतैर्मुनिभस्तथा।
न चरेत् तानि धर्मात्मा श्रुत्वा चापि न कुत्सयेत्॥
'देवताओं और मुनियों द्वारा जो अनुचित कर्म दिये गये हों, धर्मात्मा पुरुष
उनका अनुकरण न करे और उन कर्मों को सुनकर भी उन देवता आदि की निन्दा न
करे।'
महा. शांतिपर्व (291/17)
'देवताओं और मुनियों द्वारा जो अनुचित कर्म दिये गये हों, धर्मात्मा पुरुष उनका अनुकरण न करे और उन कर्मों को सुनकर भी उन देवता आदि की निन्दा न करे।'
महा. शांतिपर्व (291/17)

No comments:
Post a Comment