Monday, April 12, 2010

हम जानकर उद्दोगपूर्वक छिप-छिपकर पाप करते हैं।पापजन्य रुपये-पैसे,सुख-आराम मिलनेपर खुशी मनाते हैं कि हम निहाल हो गये!मौज हो गयी!इनके दोषों की तरफ हमारी दोषदृष्टि जाती ही नहीं,जिससे हम फँस जाते हैं,चौरासी लाख योनियों में जाते हैं,दु:ख भोगते हैं,कराहते हैं,चिल्लाते हैं,पुकारते हैं।फिर भी उधर ही जाने का मन करता है!क्या करें... नाथ!आप ही हमें अपनी तरफ खींच लें।

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