मनुष्य के सामने दो ही बातें हैं - या तो वह अपनी सभी कामनाएँ पूरी कर ले अथवा उनका त्याग कर दे ! वह कामनाओंको पूरी तो कर सकता ही नहीं, फिर उनको छोड़नेमें किस बातका भय! जो हम कर सकते हैं, उसको तो करते नहीं और जो हम नहीं कर सकते, उसको करना चाहते हैं - इसी प्रमाद से दुःख पा रहे हैं !
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