Tuesday, April 13, 2010
’हे नाथ! मेरे कर्मोंका आप कितना खयाल रखते हैं कि मैंने न जाने किस-किस जन्ममें,किस-किस परिस्थितिमें परवश होकर क्या-क्या कर्म किये हैं,उन सम्पूर्ण कर्मोंसे सर्वथा रहित करनेके लिये आप कितना विचित्र विधान करते हैं! मैं तो आपके विधानको किञ्चिन्मात्र भी समझ नहीं सकता।इसलिये हे नाथ! मैं उसमें अपनी बुद्धि क्यों लगाऊँ?मेरेको तो केवल आपकी तरफ ही देखना है।
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