Thursday, April 15, 2010

"आप जानते हैं रस किसे कहते हैं? जिससे कभी तृप्ति न हो,जिसको कभी निवृति और जिसकी कभी तृप्ति न हो।वह रस प्रियता में, प्रियता आत्मीयता में,आत्मीयता विश्वास में और विश्वास श्रद्धा में और श्रद्धा आस्था में निहित है।इस दृष्टि से हम सब अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार अपनी-अपनी परिस्थिति के अनुसार किसीमें आस्था करें,पर वह एक हो।एकमें आस्था होने से प्रभुमें आस्था हो जाती है।

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