Sunday, April 18, 2010
सन्त संदेश--प्राण प्यारे के प्रिय साधको! सभी साधक साध्य के होकर रहें,उन्हीं की महिमा को अपनाकर सभी के लिये उपयोगी हो जाएँ,यह माँग जीवन की माँग है।अनुपयोगी वही रहता है जिसे अपने लिये किसी से कुछ चाहिए।अपना करके सृष्टि में कुछ नहीं है।’अपने’ अपने में अवश्य हैं।अपने में अपनी प्रियता स्वत: होती है,की नहीं जाती।केवल प्रेमास्पद के अस्तित्व और महत्व को अपनाना है।अकिंचन-शरणानन्द
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment