Tuesday, April 13, 2010
जैसे छोटा बच्चा केवल माँका ही दूध पीता है,जल-अन्न आदि कुछ नहीं लेता;अगर वह रोगी हो जाय तो माँको दवा लेनी पड़ती है।इस प्रकार केवल परमात्मतत्वको जाननेकी उत्कण्ठावाले साधक सन्त-महात्माओंकी कृपा के आश्रित रहते हैं,अपना कुछ भी अभिमान नहीं रखते।सन्त-महात्मा जो कुछ कहें-उसीके अनुसार जीवन बनाना है,ऐसा जिनका भाव हो जाता है,उन साधकोंके उद्धारके लिये सन्तोंको उद्योग करना पड़ता है।
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