Monday, April 19, 2010

दोष को देखना है,अपने में उसकी स्थापना नहीं करना है,अपितु दोष देखने के पश्चात् तुरन्त निर्दोषता की स्थापना कर अचिन्त हो जाना है और दोष को पुन: न दोहराने का दृढ़ संकल्प करना है। उसके पश्चात् कोई कहे कि तुम दोषी हो,तो प्रसन्नचित्त होकर कह दो कि अब नहीं हूँ,पहले था।अर्थात भूतकाल के दोषों को वर्तमान में मत देखो।

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